
ईरान शांति वार्ता के बीच सोने में सुधार, लेकिन साप्ताहिक गिरावट दूसरे हफ्ते भी जारी
भू-राजनीतिक राहत और केंद्रीय बैंकों की सख्त मौद्रिक नीति के मिले-जुले संकेतों के बीच सोने-चांदी में शुक्रवार को तेजी आई, लेकिन साप्ताहिक नुकसान बरकरार रहा।
वैश्विक बाजारों में शुक्रवार को सोने और चांदी की कीमतों ने लगातार पांच सत्रों की गिरावट के बाद जोरदार वापसी की, हालांकि साप्ताहिक आधार पर दोनों धातुएं दूसरे हफ्ते भी नुकसान में रहीं। हाजिर सोना 4,207 डॉलर प्रति औंस के आसपास स्थिर रहा, जबकि अमेरिकी वायदा बाजार में अगस्त डिलीवरी का अनुबंध 3.03 प्रतिशत उछलकर 4,238.8 डॉलर पर बंद हुआ। चांदी में करीब 5 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई और यह 67 डॉलर प्रति औंस के पार पहुंच गई। यह उछाल ऐसे समय आया जब पूरे सप्ताह कीमती धातुओं पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंकाओं का दबाव बना रहा, जिससे सोना और चांदी दोनों अपनी मार्च के बाद की सबसे लंबी गिरावट की लकीर को छूने की कगार पर थे।
इस उतार-चढ़ाव के पीछे भू-राजनीतिक घटनाक्रम और केंद्रीय बैंकों की नीतियों का मिलाजुला असर रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान कि ईरान के साथ शांति समझौता जल्द हो सकता है, ने कच्चे तेल की कीमतों को नीचे धकेला और निवेशकों की सुरक्षित-निवेश की मांग को कम किया, लेकिन शुक्रवार को सोने में आई तेजी दर्शाती है कि बाजार अभी भी इस समझौते की पुष्टि का इंतजार कर रहे हैं। दूसरी ओर, यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी) ने तीन साल में पहली बार ब्याज दरें बढ़ाईं, जिससे यूरो में उतार-चढ़ाव रहा और वह 1.158 डॉलर के आसपास बंद हुआ। डॉलर सूचकांक स्थिर रहा, जबकि जापानी येन 160 प्रति डॉलर के संवेदनशील स्तर पर बना रहा, जहां टोक्यो का हस्तक्षेप संभव है। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में अप्रैल में संकुचन के बावजूद पाउंड पर खास असर नहीं हुआ, क्योंकि निवेशकों का ध्यान ईरान वार्ता पर टिका था।
भारत जैसे प्रमुख स्वर्ण उपभोक्ता देशों के लिए यह वैश्विक रुझान दोहरे संकेत लेकर आया है। एक ओर अंतरराष्ट्रीय कीमतों में साप्ताहिक गिरावट आयात लागत को कम कर सकती है, वहीं डॉलर की मजबूती और रुपये पर दबाव घरेलू बाजार में सोने की कीमतों को ऊंचा रख सकता है। भारतीय बाजार में सोने की मांग परंपरागत रूप से कीमतों में गिरावट पर बढ़ती है, लेकिन शादी-त्योहारों के सीजन में निवेशक और उपभोक्ता दोनों वैश्विक रुख पर नजर रखते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि मुद्रास्फीति की रफ्तार ही सोने की दिशा तय करेगी—यदि आने वाले महीनों में कीमतों का दबाव और बढ़ा तो 4,000 डॉलर का स्तर भी टूट सकता है।
आगे की राह अनिश्चितताओं से भरी है। ईरान के साथ संभावित समझौता यदि मूर्त रूप लेता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति बहाल होती है, तो भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम घटने से सोने पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं फेडरल रिजर्व सहित प्रमुख केंद्रीय बैंकों की ब्याज दर नीति मुद्रास्फीति के आंकड़ों पर टिकी रहेगी। बाजार की नजर अब आगामी मुद्रास्फीति रिपोर्टों और केंद्रीय बैंकों के संकेतों पर है, जो तय करेंगे कि सोना अपनी खोई चमक वापस पाता है या गिरावट का सिलसिला आगे बढ़ता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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शुक्रवार को सोने की कीमतें स्थिर रहीं, तेल की गिरावट और ईरान-अमेरिका शांति समझौते की उम्मीदों से समर्थन मिला। हालांकि, यह कीमती धातु लगातार दूसरे साप्ताहिक नुकसान की ओर बढ़ रही है, क्योंकि बाजार ईसीबी और फेड से आगे दर वृद्धि की उम्मीद कर रहे हैं। डॉलर भी स्थिर हो गया क्योंकि व्यापारी मध्य पूर्व युद्धविराम की संभावनाओं का आकलन कर रहे थे।
शुक्रवार को सोने के वायदा तेजी से बढ़कर बंद हुए, इस संकेत के चलते कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने का समझौता निकट हो सकता है। फिर भी, साप्ताहिक आधार पर धातु में गिरावट दर्ज की गई, क्योंकि बाजार का ध्यान अमेरिकी ब्याज दरों के दृष्टिकोण पर रहा, जो बिना प्रतिफल वाले सोने के आकर्षण को कम करता है।
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