
वैश्विक प्रजनन दर में ऐतिहासिक गिरावट, पर उभरते विरोधाभास नई चिंता जगाते हैं
दुनिया भर में प्रजनन दर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँच रही है, लेकिन भारत में कम महिला श्रम भागीदारी और युवाओं में कंडोम के घटते इस्तेमाल जैसे अंतर्विरोध सार्वजनिक स्वास्थ्य और नीति के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर रहे हैं।
दुनिया की आबादी का शिखर अब 2080 के आसपास आने का अनुमान है—संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में अपने पूर्वानुमान को संशोधित कर यह ऐतिहासिक मोड़ स्वीकार किया है। इसके पीछे विकासशील देशों में जन्म दर का अप्रत्याशित रूप से तेज़ गिरना है। फिलीपींस, जो कभी 4.1 बच्चे प्रति महिला की दर रखता था, 2025 में महज़ 1.7 पर आ गिरा—महज तीन दशकों में लगभग 60 प्रतिशत की गिरावट। भारत में भी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के ताज़ा आँकड़े कुल प्रजनन दर 2.0 और नमूना पंजीकरण प्रणाली के अनुसार 1.9 बता रहे हैं, जो 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है। यह गिरावट एक ओर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को जनसंख्या दबाव से राहत दे रही है, वहीं समृद्ध देशों में यह श्रम शक्ति की कमी और वृद्ध होती आबादी का संकट गहरा रही है।
लेकिन यह केवल संख्याओं का खेल नहीं है। भारत का मामला एक गहरे विरोधाभास को उजागर करता है: प्रजनन दर तो गिर रही है, पर महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी उस अनुपात में नहीं बढ़ी है। परंपरागत अर्थशास्त्र मानता था कि जब अधिक महिलाएँ घर से बाहर काम करने लगती हैं, तब प्रजनन दर घटती है। भारत में यह संबंध उल्टा है—कम प्रजनन दर के बावजूद अधिकांश महिलाएँ औपचारिक अर्थव्यवस्था से बाहर हैं। विशेषज्ञ इसे सामाजिक मानदंडों, शिक्षा और विवाह की उम्र में बदलाव से जोड़ते हैं, लेकिन यह स्थिति आर्थिक स्वायत्तता के बिना जनसांख्यिकीय बदलाव की सीमाओं को रेखांकित करती है।
दूसरी ओर, लैटिन अमेरिका से आती चेतावनियाँ बताती हैं कि गर्भनिरोधक का परिदृश्य भी उलझा हुआ है। अर्जेंटीना जैसे देशों में किशोरों और युवाओं के बीच कंडोम का इस्तेमाल लगातार घट रहा है, जबकि यौन संचारित संक्रमणों के मामले बढ़ रहे हैं। माता-पिता की पीढ़ी को यह एहसास हो रहा है कि उनके बच्चे डिजिटल जीवन में इतने डूबे हैं कि बटुए की जगह मोबाइल लेकर चलते हैं, और सुरक्षा की आदत छूट रही है। यह प्रवृत्ति दिखाती है कि गर्भधारण दर भले ही कम हो, लेकिन यौन स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही के अपने अलग ख़तरे हैं।
डिजिटल जीवन और घटती प्रजनन दर का रिश्ता अब वैश्विक बहस का हिस्सा बन गया है। जर्मनी के विश्लेषक सीधे शब्दों में कह रहे हैं: जहाँ आईफोन पहुँचा, वहाँ कम बच्चे पैदा हुए। स्क्रीन पर बिताए जाने वाले घंटे न केवल आमने-सामने के सामाजिक संपर्क को कम कर रहे हैं, बल्कि आर्थिक अनिश्चितता और शहरीकरण के साथ मिलकर परिवार बनाने की इच्छा और संभावना दोनों को प्रभावित कर रहे हैं। फिलीपींस में तेज़ शहरीकरण, ऊँची शिक्षा और विवाह में देरी इसी डिजिटल बदलाव के समानांतर चल रहे हैं।
आगे की राह के लिए सबसे अहम सबक प्रजनन स्वायत्तता और पुरुषों की भागीदारी से जुड़ा है। भारत में एनएफएचएस-6 के आँकड़े बताते हैं कि 20-24 आयु वर्ग की 20 प्रतिशत से अधिक महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले हो गया, जो प्रजनन विकल्पों पर उनकी पकड़ को कमज़ोर करता है। गर्भनिरोधक का बोझ अब भी असमान रूप से महिलाओं पर है, जबकि पुरुष-केंद्रित विकल्पों को अपनाने की गति धीमी है। यदि नीतियाँ केवल जनसंख्या संख्या पर केंद्रित रहीं और यौन स्वास्थ्य शिक्षा, साझा ज़िम्मेदारी तथा आर्थिक अवसरों की अनदेखी करती रहीं, तो यह जनसांख्यिकीय बदलाव स्वास्थ्य और समानता के संकट में बदल सकता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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वैश्विक जन्म दर में गिरावट के बावजूद, एक खतरनाक विरोधाभास उभर रहा है: कम किशोर और युवा कंडोम का उपयोग कर रहे हैं, जिससे यौन संचारित रोगों में वृद्धि हो रही है, जबकि गर्भधारण घट रहे हैं। विशेषज्ञ सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भयावह परिणामों की चेतावनी देते हैं, सुरक्षा की झूठी भावना और जागरूकता की कमी की ओर इशारा करते हैं।
भारत की प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे गिर गई है, फिर भी महिला कार्यबल भागीदारी हठपूर्वक कम बनी हुई है, जो एक जनसांख्यिकीय विरोधाभास पैदा करती है। आंकड़े दिखाते हैं कि गर्भनिरोधक का बोझ अभी भी भारी रूप से महिलाओं पर पड़ता है, जो प्रजनन एजेंसी और प्रजनन दर में गिरावट तथा महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के बीच अंतर पर सवाल उठाता है।
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