
फ्रांस में मृत्यु सहायता कानून पारित: असाध्य रोगियों को मिलेगा सम्मानजनक अंत का अधिकार
नेशनल असेंबली ने 291-241 मतों से विधेयक को अंतिम मंजूरी दी, अब संवैधानिक परिषद की समीक्षा के बाद ही कानून लागू होगा।
फ्रांस की नेशनल असेंबली ने बुधवार को ऐतिहासिक 'मृत्यु सहायता' विधेयक को 291 के मुकाबले 241 मतों से पारित कर दिया। यह कानून असाध्य और जानलेवा बीमारी से ग्रस्त वयस्कों को, जो लगातार असहनीय शारीरिक या मानसिक पीड़ा झेल रहे हों, चिकित्सकीय निगरानी में घातक दवा लेने की अनुमति देता है। पात्रता के लिए रोगी का फ्रांसीसी नागरिक या स्थायी निवासी होना, रोग का अग्रिम या अंतिम चरण में होना और स्वतंत्र व सचेत सहमति देने में सक्षम होना अनिवार्य है। केवल मनोवैज्ञानिक पीड़ा या अल्जाइमर जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों को इस दायरे से बाहर रखा गया है।
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इसे 2022 के चुनावी वादे की पूर्ति बताते हुए 'गंभीर, विनम्र और लोकतंत्र के प्रति पूर्ण सम्मान' के साथ उठाया गया कदम करार दिया। वामपंथी और मैक्रों समर्थक सांसदों ने बड़े पैमाने पर विधेयक का समर्थन किया, जबकि दक्षिणपंथी और धुर-दक्षिणपंथी दलों ने इसका विरोध किया। कैथोलिक चर्च और कुछ चिकित्सा संगठनों ने इसे कमजोर वर्गों पर दबाव बनाने वाला बताया, वहीं 'गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार' जैसे संगठनों ने इसे असहनीय पीड़ा से मुक्ति का साधन माना। जनमत सर्वेक्षणों में 84 प्रतिशत तक फ्रांसीसी नागरिकों ने इस कानून का समर्थन किया है।
यह विधेयक तीन बार सीनेट द्वारा खारिज किए जाने के बाद संवैधानिक प्रावधान के तहत निचले सदन में अंतिम रूप से पारित हुआ। सीनेट के रूढ़िवादी बहुमत ने इसे मानवीय गरिमा और सामाजिक अनुबंध के विपरीत बताया था। फ्रांस अब नीदरलैंड, बेल्जियम, स्पेन और स्विट्जरलैंड जैसे सीमित देशों की सूची में शामिल हो गया है, जहां किसी न किसी रूप में मृत्यु सहायता को कानूनी मान्यता प्राप्त है। हालांकि, फ्रांसीसी मॉडल में 'इच्छामृत्यु' और 'सहायता प्राप्त आत्महत्या' शब्दों से परहेज करते हुए 'मरने में सहायता' शब्दावली अपनाई गई है, ताकि ऐतिहासिक विवादों और आत्महत्या रोकथाम के प्रयासों से इसे अलग रखा जा सके।
प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने विधेयक के कुछ प्रावधानों—विशेषकर दो दिन की अनिवार्य चिंतन अवधि, कानूनी संरक्षण वाले रोगियों की सहमति और स्वास्थ्य संस्थानों की भूमिका—को संवैधानिक परिषद के समक्ष भेजने की घोषणा की है। परिषद की समीक्षा में लगभग एक माह लग सकता है, जिसके बाद ही राष्ट्रपति इसे अधिनियमित कर सकेंगे और आवेदन नियमावली तैयार होगी। इस बीच, ब्रिटेन और इटली जैसे देशों में भी इसी तरह के विधेयकों पर बहस जारी है, जिससे यूरोप में जीवन के अंतिम अधिकार को लेकर कानूनी और नैतिक विमर्श के और तेज होने के संकेत हैं।
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | +0.10 | neutral |
|---|---|---|
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.60 | critical |
| उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस | 0.00 | neutral |
कोलंबियाई मनोवैज्ञानिक ने सम्मानपूर्वक मरने के अपने अधिकार के लिए संघर्ष किया, और उनका मामला नियमन की कमी को उजागर करता है।
व्यक्तिगत कथा और न्यायिक प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करके, बहस को मानवीय बनाया जाता है और कानूनी बदलाव के लिए दबाव डाला जाता है।
मानसिक पीड़ा के लिए इच्छामृत्यु पर यूरोपीय बहस और यूके में आत्महत्या के मामले पर चर्चा नहीं की गई है।
फ्रांसीसी जीवन-अंत कानून संतुलन के रूप में प्रच्छन्न एक हत्या का लाइसेंस है।
अलार्मिस्ट पाठक टिप्पणियों का उपयोग करके, लोकप्रिय अस्वीकृति की छाप बनाई जाती है और कोलंबियाई मामले को फ्रांस के लिए चेतावनी के रूप में प्रक्षेपित किया जाता है।
कैटालिना गिराल्डो के विशिष्ट मामले और उनकी कानूनी लड़ाई को छोड़ दिया गया है, जिससे मानसिक पीड़ा के लिए इच्छामृत्यु के अनुरोध के साथ सीधा टकराव से बचा जाता है।
यूके में एक नाइजीरियाई महिला की मौत अनुपचारित मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के दुखद परिणामों को उजागर करती है।
कोरोनर की जांच को तथ्यात्मक रूप से रिपोर्ट करके, कहानी को कानूनी या नैतिक के बजाय सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
इच्छामृत्यु की कानूनी संभावना और कोलंबियाई बहस का उल्लेख नहीं किया गया है, जिससे आत्महत्या को एकमात्र परिणाम के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
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