
ईरान की दो-टूक चेतावनी: लेबनान पर इज़रायली हमला अमेरिका के साथ अंतरिम शांति समझौते का उल्लंघन होगा
तेहरान ने स्विट्ज़रलैंड में शुक्रवार को होने वाले समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर से पहले लेबनान में किसी भी इज़रायली सैन्य कार्रवाई को संधि भंग मानने की कड़ी चेतावनी दी है।
ईरान ने मंगलवार को अमेरिका के साथ हुए अंतरिम शांति समझौते की व्याख्या करते हुए एक स्पष्ट लाल रेखा खींच दी: अब से लेबनान पर कोई भी इज़रायली हमला या उसकी सेना की निरंतर उपस्थिति इस सहमति का सीधा उल्लंघन होगी। विदेश मंत्री अब्बास अराक़ची ने तेहरान में विदेशी राजनयिकों के समक्ष यह बात रखी, जिससे एक दिन पहले ही लेबनानी राष्ट्रपति जोसेफ औन और संसद अध्यक्ष नबीह बेरी को फ़ोन पर अवगत कराया गया था। अराक़ची ने समझौते के पक्षों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया: एक ओर अमेरिका और इज़रायल, दूसरी ओर ईरान और हिज़्बुल्लाह। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि लेबनान में युद्ध की पूर्ण समाप्ति इस संधि का अभिन्न अंग है और इसके कार्यान्वयन की ज़िम्मेदारी अमेरिका पर होगी।
तेहरान का यह रुख़ एक व्यापक कूटनीतिक ढाँचे का हिस्सा है, जिसमें सोमवार को हुई वार्ता के बाद अंतरिम समझौता प्रभावी हो चुका है और अब शुक्रवार को स्विट्ज़रलैंड में औपचारिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होने हैं। इसी दिन से अगले चरण की बातचीत भी शुरू होगी, जिसका लक्ष्य 60 दिनों के भीतर एक व्यापक अंतिम संधि तक पहुँचना है। ईरानी उप विदेश मंत्री तख़्त-ए-रावांची के अनुसार, इस दूसरे चरण में यूरेनियम संवर्धन, मौजूदा भंडार और ईरान की परमाणु ज़रूरतों के साथ-साथ प्रतिबंधों में राहत जैसे जटिल मुद्दों पर बातचीत होगी।
लेबनानी पक्ष ने इस अंतरिम सहमति का स्वागत किया है और बेरूत का मानना है कि उसकी स्थिरता और सुरक्षा किसी भी गंभीर क्षेत्रीय शांति प्रयास का अविभाज्य हिस्सा है। हालाँकि, यरूशलम से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन इज़रायली मीडिया में इस समझौते को लेकर संशय बना हुआ है। अमेरिकी अधिकारियों ने भी ईरान की अनुपालन इच्छा पर सवाल उठाए हैं, जबकि पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि तेहरान ने कभी परमाणु हथियार न बनाने पर सहमति दे दी है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस दस्तावेज़ को "बहुत सामान्य" बताया, जो वाशिंगटन के भीतर ही मतभेदों का संकेत है।
विश्लेषकों का मानना है कि ईरान का यह कड़ा रुख़ लेबनान को एक रणनीतिक बफ़र के रूप में सुरक्षित रखने की कोशिश है, ताकि इज़रायल के साथ व्यापक टकराव को रोका जा सके और हिज़्बुल्लाह के साथ अपनी क्षेत्रीय साझेदारी को बनाए रखा जा सके। दक्षिण एशिया के लिए इस समझौते के मायने अप्रत्यक्ष हैं: यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है, तो ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाएँ स्थिर होंगी और तेल की कीमतों पर दबाव घटेगा, जिसका भारत जैसे बड़े आयातक देशों को लाभ मिल सकता है।
आगामी 60 दिन निर्णायक होंगे। शुक्रवार को स्विट्ज़रलैंड में होने वाली बैठक में यदि लेबनान पर इज़रायली कार्रवाई को लेकर कोई ठोस गारंटी नहीं मिली, तो अंतरिम समझौता कमज़ोर पड़ सकता है। दूसरी ओर, परमाणु मुद्दों पर प्रगति ही इस पूरी प्रक्रिया की असली कसौटी होगी। ईरान ने युद्ध की समाप्ति को पहला चरण बनाकर यह संकेत दिया है कि क्षेत्रीय सुरक्षा और परमाणु समझौता अब एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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The Israeli press frames the Iranian warning as a rhetorical move tied to a vague interim understanding with Washington. Reports highlight U.S. skepticism about Tehran's willingness to comply and describe the memorandum as a general, non-binding document. The focus remains on the nuclear talks and the potential for Iran to exploit the deal.
Iranian media present the foreign minister's statement as a firm condition: any Israeli aggression in Lebanon violates the memorandum with the United States. The narrative emphasizes Iran's commitment to ending the war and holds Washington responsible for restraining Israel. The deal is portrayed as a diplomatic victory that prioritizes peace in Lebanon.