
युद्धविराम के बीच नेतन्याहू का दावा: लेबनान के ईसाई गांव इजरायल में विलय चाहते हैं
नेतन्याहू ने दावा किया कि दक्षिण लेबनान के कुछ ईसाई गांवों ने हिजबुल्लाह से सुरक्षा हेतु इजरायल में विलय का अनुरोध किया, जिसे लेबनानी सूत्र आंतरिक दबाव मानते हैं।
इजरायली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी चैनल फ़ॉक्स न्यूज़ को दिए साक्षात्कार में दावा किया कि दक्षिण लेबनान के कुछ ईसाई गांवों ने हिजबुल्लाह के ‘कट्टरपंथियों’ से सुरक्षा की मांग करते हुए इजरायल में विलय का अनुरोध किया है। नेतन्याहू ने यह भी कहा कि मध्य पूर्व में ईसाइयों की रक्षा इजरायल कर रहा है और इसी सिलसिले में उन्होंने घोषणा की कि इजरायली सेनाएं लेबनान में बनी रहेंगी।
लेबनानी राजनीतिक सूत्रों ने अल-जदीद न्यूज़ को बताया कि नेतन्याहू के ये नकारात्मक बयान वाशिंगटन में हस्ताक्षरित त्रिपक्षीय ढांचे (इजरायल-लेबनान-अमेरिका) से उपजे आंतरिक दबाव का परिणाम हैं, और इजरायली नेतृत्व यह दिखाने से बचना चाहता है कि वह पीछे हटने को मजबूर है। इससे पहले, दक्षिण लेबनान की सीमावर्ती ईसाई बस्तियों ने एक संयुक्त बयान में ऐसे किसी भी अनुरोध को ‘मनगढ़ंत’ बताकर खारिज कर दिया था और लेबनानी राज्य के प्रति अपनी वफादारी दोहराई थी, जैसा कि स्काई न्यूज़ अरबिया ने रिपोर्ट किया।
दरअसल, 26 जून को अमेरिकी मध्यस्थता में इजरायल और लेबनान के बीच एक शांति समझौते पर दस्तखत हुए थे, जिसके तहत इजरायली रक्षा बलों और हिजबुल्लाह के बीच युद्धविराम लागू हुआ। हालांकि, हिजबुल्लाह प्रमुख नईम कासिम ने इसे अपमानजनक और संप्रभुता का त्याग बताया। अमेरिकी केंद्रीय कमान (CENTCOM) के कमांडर ने इजरायली वापसी में तेजी लाने के लिए मध्यस्थता प्रक्रिया में प्रवेश किया है, जिसके बदले लेबनानी सेना के लिए अमेरिकी निगरानी में सुरक्षा व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जाएंगी। एक लेबनानी-अमेरिकी-इजरायली सुरक्षा समिति के गठन की प्रतीक्षा है।
नेतन्याहू ने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका का इजरायल से बड़ा कोई सहयोगी नहीं है और ट्रंप प्रशासन ने हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायली कार्रवाइयों में हस्तक्षेप नहीं किया। इधर, इजरायली सेना ने दक्षिण लेबनान में हमले जारी रखे और गैलिली क्षेत्रीय परिषद ने निवासियों को विस्फोटों की चेतावनी दी। इस बीच, क्षेत्रीय कूटनीति के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप तुर्की में नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान सीरियाई राष्ट्रपति अल-शरा से मिलने वाले हैं, जो वृहद मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन के पुनर्निर्धारण का संकेत है।
लेबनानी सेना ने भी आंतरिक सुरक्षा को लेकर सक्रियता दिखाई है: हर्मेल में मादक पदार्थों और हथियारों की बड़ी खेप पकड़ी गई। हालांकि, इजरायली सेना की मौजूदगी और नेतन्याहू के बयानों से यह स्पष्ट है कि पूर्ण वापसी जल्द नहीं होगी। अब सबकी निगाहें प्रस्तावित त्रिपक्षीय सुरक्षा समिति के गठन और अमेरिकी मध्यस्थता की दिशा पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि युद्धविराम स्थायी शांति में बदलता है या तनाव बरकरार रहता है।
| रूसी और सीआईएस प्रेस | 0.00 | neutral |
|---|---|---|
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.10 | neutral |
| अरब खाड़ी प्रेस | −0.70 | critical |
| अरब लेवांत-मगरिब प्रेस | −0.80 | critical |
Israel projects its narrative of protecting Christians as a given, without counterpoint.
The news is presented as an official statement, without independent verification, normalizing the Israeli claim.
It omits the context of Israeli attacks on those villages and Lebanese criticism, present in Arab media.
Europe frames Netanyahu's statement within the context of the conflict and US mediation, maintaining critical distance.
It balances Netanyahu's quote with references to diplomatic efforts and the war context, without openly endorsing or rejecting his version.
It does not delve into the Lebanese reaction or the contradictions between Netanyahu's claims and attacks on Christian villages.
The Gulf exposes the Israeli claim by countering it with facts of attacks on Christian villages, denouncing hypocrisy.
It uses contrast: Netanyahu says he protects Christians, but evidence of Israeli attacks shows the opposite, delegitimizing his claim.
It omits the Israeli perspective and the possibility that some locals might actually seek annexation.
Lebanon judges Netanyahu's statements as a domestic political maneuver to hide pressure from the trilateral agreement.
It attributes the statements to internal political motives, citing anonymous sources revealing Netanyahu's stress, turning the news into a psycho-political analysis.
It does not give voice to the alleged Christian villages that supposedly sought annexation, nor examines the possibility that some communities actually seek protection.
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