
ईरान-अमेरिका समझौता: डिजिटल हस्ताक्षर के बाद शुक्रवार को जिनेवा में औपचारिक मुहर, इज़राइल की चिंताएँ बरकरार
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम व सहयोग का मसौदा डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित हो चुका है, शुक्रवार को जिनेवा में औपचारिक समझौते की तैयारी है, जबकि इज़राइल की आपत्तियों और पुनर्निर्माण कोष को लेकर विवाद जारी है।
अमेरिका और ईरान के बीच 84 दिनों के संघर्ष को विराम देने वाला समझौता अब औपचारिक रूप लेने जा रहा है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सोमवार को पुष्टि की कि दोनों पक्षों ने एक संक्षिप्त सहमति-पत्र पर डिजिटल हस्ताक्षर कर दिए हैं, और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसके विवरण शुक्रवार से पहले सार्वजनिक कर सकते हैं। शुक्रवार को जिनेवा में होने वाले शिखर सम्मेलन में वेंस और ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद-बाघेर ग़ालिबाफ़ औपचारिक रूप से दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करेंगे। व्हाइट हाउस के अधिकारियों के अनुसार, यह समझौता सभी मोर्चों—जिसमें लेबनान भी शामिल है—पर तत्काल और स्थायी सैन्य कार्रवाई रोकने का प्रावधान करता है, हालाँकि पूर्ण विवरण अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। वेंस ने बताया कि यह दस्तावेज़ महज़ डेढ़ पेज का एक सामान्य समझौता ज्ञापन है, जिसकी बारीकियाँ भविष्य की वार्ताओं में तय होंगी।
इस ऐतिहासिक पहल पर इज़राइल की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने चेतावनी दी कि वे और ट्रंप 'हर बात पर सहमत नहीं हैं', विशेषकर लेबनान से इज़राइली सेना की सशर्त वापसी को लेकर। व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि मौजूदा समझौते में इज़राइल की वापसी की शर्त शामिल नहीं है। इसके बावजूद, वेंस ने फ़ॉक्स न्यूज़ पर दावा किया कि 'इज़राइल अंततः इस समझौते को स्वीकार कर लेगा', हालाँकि उन्होंने इस दावे का आधार नहीं बताया। वहीं, अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ईरान के परमाणु इरादों को लेकर संशय में है, जिससे समझौते की दीर्घकालिक विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगता है।
समझौते के आर्थिक पहलुओं पर भी विवाद गहराया है। मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ईरान के लिए 300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण कोष बनाने को तैयार था, जिसे राष्ट्रपति ट्रंप ने 'फ़र्ज़ी ख़बर' करार दिया। वेंस ने स्पष्ट किया कि समझौते में अमेरिकी करदाताओं का एक पैसा भी ईरान को नहीं जाएगा, लेकिन यदि ईरान अपने दायित्व पूरे करता है और प्रतिबंधों में ढील दी जाती है, तो दूसरे देश ईरान की अर्थव्यवस्था में निवेश कर सकते हैं। यह स्पष्टीकरण भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों के लिए महत्वपूर्ण है, जो ईरानी कच्चे तेल पर निर्भर रहे हैं और चाबहार बंदरगाह के विकास में रणनीतिक हित रखते हैं।
हालाँकि, ईरानी समुद्री श्रमिक संघ ने चेतावनी दी है कि 'होर्मुज़ जलडमरूमध्य कभी भी संघर्ष-पूर्व स्थिति में नहीं लौटेगा', जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में स्थायी बदलाव के संकेत मिलते हैं। यह दक्षिण एशिया के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि भारत अपनी तेल ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आयात करता है। विश्लेषकों का मानना है कि शुक्रवार के औपचारिक समझौते के बाद भी क्षेत्रीय स्थिरता की राह आसान नहीं होगी—इज़राइल की आपत्तियाँ, सीआईए का संशय और होर्मुज़ की बदली हुई वास्तविकता आने वाले महीनों में कूटनीति की असली परीक्षा लेंगे।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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अमेरिका-ईरान समझौता मध्य पूर्व के लिए एक नए युग की शुरुआत करता है। ईरान के पुनर्निर्माण के लिए अमेरिकी करदाताओं का एक भी पैसा नहीं जाएगा; तेहरान केवल अपने दायित्वों को पूरा करके 300 अरब डॉलर के कोष तक पहुँच सकता है। इस समझौते को एक कूटनीतिक जीत के रूप में पेश किया गया है।
ईरान और अमेरिका के बीच डिजिटल समझौते पर शुक्रवार को जिनेवा में औपचारिक हस्ताक्षर होंगे, लेकिन विवरण गुप्त रहेंगे। उपराष्ट्रपति वेंस का कहना है कि इज़राइल अंततः इसे स्वीकार कर लेगा, जबकि ट्रम्प ने 300 अरब डॉलर के अमेरिकी योगदान से इनकार किया है। फिर भी, इज़राइल की चिंताएँ बनी हुई हैं, सीआईए ईरान के परमाणु इरादों को लेकर संशय में है, और ईरानी समुद्री संघों ने चेतावनी दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य कभी भी युद्ध-पूर्व स्थिति में नहीं लौटेगा। समझौते का सावधानी और चिंता के साथ स्वागत किया गया है।
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