
लवीव में भर्ती केंद्र पर हमला: यूक्रेन की सैन्य लामबंदी का संकट गहराया
लवीव में सैन्य भर्ती वाहन पर भीड़ के हमले ने यूक्रेन में जबरन भर्ती के प्रति बढ़ते जनाक्रोश और सरकार की आंतरिक चुनौतियों को उजागर किया है।
पश्चिमी यूक्रेन के लवीव शहर में 8 जुलाई की रात करीब 200 लोगों की भीड़ ने सैन्य भर्ती केंद्र (टीसीके) के एक वाहन को घेरकर पलट दिया और सैनिकों पर हमला किया। यह घटना तब शुरू हुई जब भर्तीकर्मियों ने एक ऐसे व्यक्ति को रोका जो पहले से सेना में शामिल होने के लिए चिह्नित था, लेकिन रिपोर्ट नहीं किया था। स्थानीय अभियोजन कार्यालय के अनुसार, झड़प में दो सैनिक घायल हुए और एक 23 वर्षीय सैनिक को गिरफ़्तार कर लिया गया, जो स्वयं फरवरी से अपनी यूनिट छोड़ चुका था। बाद में सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो सामने आए जिनमें कुछ प्रदर्शनकारियों को सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगते और “स्लावा टीसीके” के नारे लगाने के लिए मजबूर किया गया।
यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने इस हमले को “बहुत बुरी स्थिति” बताते हुए कहा कि वर्दीधारियों के प्रति लोगों का रवैया बेहद नकारात्मक हो गया है। उन्होंने आंतरिक और रक्षा मंत्रालयों को जांच और सुधारों के निर्देश दिए। रक्षा मंत्री माइखाइलो फ़ेदोरोव ने स्वीकार किया कि जबरन भर्ती के मामलों ने समाज में नाराज़गी पैदा की है और वेतन वृद्धि तथा अनुबंध सेवा के बाद अस्थायी छूट जैसे कदमों से सेना को आकर्षक बनाने की योजना बताई। वहीं, राष्ट्रपति कार्यालय के प्रमुख किरिल बुदानोव ने चेतावनी दी कि अपनी ही सेना के जवानों पर हमला करने वाले यह भूल सकते हैं कि कल दुश्मन सेना उनके साथ ऐसा ही व्यवहार करेगी।
रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़ाख़ारोवा ने इस घटना को यूक्रेन के आंतरिक विघटन के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया और कहा कि ज़ेलेंस्की ने नाटो शिखर सम्मेलन से पहले परमाणु हथियारों की संभावित प्राप्ति का मुद्दा उठाकर गठबंधन पर दबाव बनाने का असफल प्रयास किया। मॉस्को के अनुसार, नाटो नेताओं ने इस मांग को नज़रअंदाज़ कर दिया और ज़ेलेंस्की को मुख्य सत्र के बजाय केवल रक्षा उद्योग मंच पर संक्षिप्त भाषण का अवसर मिला। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी दोहराया कि पश्चिमी देशों की बातचीत की पेशकश पर अब विश्वास नहीं किया जा सकता, क्योंकि 2014 से लेकर 2022 के इस्तांबुल वार्ता तक सभी पूर्व समझौतों को पश्चिमी हस्तक्षेप से विफल किया गया।
यह टकराव यूक्रेन में “बसीकरण” कही जाने वाली विवादास्पद भर्ती पद्धति की परिणति है, जिसके तहत सड़कों, दुकानों और कार्यस्थलों से पुरुषों को उठाकर सीधे प्रशिक्षण या मोर्चे पर भेज दिया जाता है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2022 से अब तक लगभग 2 लाख सैनिक पलायन कर चुके हैं और 20 लाख से अधिक व्यक्ति भर्ती से बचने के लिए वांछित हैं, जिनमें से आधे से अधिक विदेश में होने का अनुमान है। इस जनशक्ति संकट का सीधा प्रभाव युद्ध की अवधि और तीव्रता पर पड़ता है, जिससे वैश्विक ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं में अस्थिरता बनी रहती है—एक ऐसा कारक जो दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर भारत के लिए आयात लागत और मुद्रास्फीति के जोखिम पैदा करता है। फ़िलहाल, लवीव प्रकरण की आंतरिक जांच जारी है और रक्षा मंत्रालय ने भर्ती प्रक्रिया में सुधार का वादा किया है, लेकिन युद्धविराम या कूटनीतिक समाधान की कोई ठोस समय-सीमा नहीं है।
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.30 | critical |
|---|---|---|
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | −0.80 | critical |
| रूसी और सीआईएस प्रेस | −0.70 | critical |
Continental Europe reads the attack as a sign of deep social division, criticizing both the violence and the mobilization methods.
It presents the incident as a symptom of a systemic crisis, balancing condemnation of violence with criticism of recruitment policies, creating a narrative of critical equidistance.
It omits the context of Russian propaganda exploiting the incident, and does not mention the nuclear blackmail accusations raised by Moscow.
Official Iran accuses Zelensky of nuclear blackmail and admits the crisis of trust, painting Ukraine as a failed and dangerous state.
It links a local mobilization incident to a presumed strategic nuclear threat, amplifying the Russian narrative and creating a picture of existential danger.
It omits any criticism of Russia or its invasion, and does not report the reasons for the protest from the Ukrainian protesters' perspective.
State Russia denounces Ukrainian repression, highlighting forced apologies and the protester's arrest as evidence of an authoritarian regime.
It emphasizes the punitive and humiliating aspects of the Ukrainian response, using specific details (forced apologies, 60 days in custody) to build an image of state brutality.
It omits the context of Ukrainian martial law and the legitimacy of wartime mobilization, and does not mention civilian casualties caused by the Russian invasion.
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