
अमेरिकी सैन्य प्रतिबद्धता में कटौती के बीच नाटो में यूरोपीय सहयोगियों की बढ़ती भूमिका
अमेरिका ने नाटो संकट मॉडल में अपनी सेनाएं घटाईं, लेकिन रूते ने आश्वासन दिया कि यह दूरी नहीं; यूरोपीय देशों ने रक्षा निवेश में 20% वृद्धि कर खाई को भरना शुरू कर दिया है।
उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के भीतर शक्ति संतुलन का एक नया अध्याय तब खुला जब अमेरिका ने अपने सहयोगियों को सूचित किया कि वह संकट की स्थिति में गठबंधन को उपलब्ध कराई जाने वाली सैन्य क्षमताओं – जिन्हें ‘नाटो बल मॉडल’ के तहत आरक्षित रखा जाता है – में कटौती कर रहा है। इस कदम को लेकर यूरोपीय राजधानियों में बेचैनी की लहर दौड़ गई, लेकिन महासचिव मार्क रूते ने ब्रसेल्स में रक्षा मंत्रियों की बैठक की पूर्व संध्या पर स्पष्ट किया कि यह अमेरिका का पीछे हटना नहीं, बल्कि एक ‘पुनर्संतुलन’ है। उन्होंने कहा कि वाशिंगटन अब भी संधि के अनुच्छेद पाँच के प्रति प्रतिबद्ध है, लेकिन अपेक्षा करता है कि यूरोपीय देश अपनी पारंपरिक रक्षा की ‘प्राथमिक जिम्मेदारी’ स्वयं उठाएँ। यह रुख डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के उस लगातार दबाव का विस्तार है जिसमें यूरोपीय सहयोगियों से सैन्य खर्च बढ़ाने और सुरक्षा निर्भरता घटाने का आग्रह किया जाता रहा है।
रूते के आश्वासन के समानांतर, आँकड़े यूरोपीय पक्ष की ओर से एक ठोस प्रतिक्रिया की तस्वीर पेश करते हैं। यूरोपीय सहयोगियों और कनाडा ने एक ही वर्ष में अपने मूल रक्षा निवेश में 90 अरब डॉलर से अधिक की वृद्धि की, जो लगभग 20 प्रतिशत की छलांग है। रूते ने इस प्रयास को ‘आश्चर्यजनक’ बताते हुए कहा कि 2026 के लिए और वृद्धि की योजना पहले ही बन चुकी है। उन्होंने सभी सदस्यों से 2035 तक सकल घरेलू उत्पाद के 5 प्रतिशत की रक्षा व्यय सीमा तक पहुँचने के लिए ‘स्पष्ट, ठोस और विश्वसनीय योजनाएँ’ प्रस्तुत करने की अपेक्षा भी जताई। इसका अर्थ यह है कि अमेरिकी कटौती से जो क्षमता अंतराल पैदा हुए हैं, उन्हें भरने का काम यूरोपीय देशों ने न केवल शुरू कर दिया है, बल्कि इसे दीर्घकालिक संरचनात्मक बदलाव में बदलने की तैयारी भी दिख रही है।
विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों से इस घटनाक्रम को देखने का नजरिया एकरूप नहीं है। इसराइली मीडिया ने इसे ‘अभूतपूर्व रणनीतिक बदलाव’ और ‘अस्वस्थ निर्भरता’ का अंत करार देते हुए अमेरिकी लड़ाकू विमानों, हवाई ईंधन भरने वाले बेड़े और नौसैनिक उपस्थिति में भारी कटौती का जिक्र किया, जो एक खतरनाक परित्याग का संकेत देता है। इसके विपरीत, रूसी मीडिया ने रूते के बयानों को तटस्थता से प्रस्तुत किया और यूरोपीय निवेश वृद्धि पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि ईरानी आउटलेट्स ने यूरोपीय सहयोगियों द्वारा बढ़ाए गए योगदान को रेखांकित किया। भारतीय मीडिया ने इस पूरे प्रकरण को अमेरिका के ‘दूर नहीं जाने’ के रूते के संदेश के इर्द-गिर्द रखा, जो एक संतुलित लेकिन सतर्क दृष्टिकोण को दर्शाता है। यह बहुआयामी वैश्विक प्रतिक्रिया बताती है कि नाटो का आंतरिक पुनर्संतुलन केवल एक क्षेत्रीय मामला नहीं रह गया है, बल्कि इसके भू-राजनीतिक संकेत दूर तक पढ़े जा रहे हैं।
आगे की राह में नाटो की विश्वसनीयता इस बात पर टिकी होगी कि यूरोपीय राष्ट्र कितनी तेजी और गहराई से इस क्षमता हस्तांतरण को अमल में लाते हैं। यदि यूरोप सचमुच अपनी पारंपरिक रक्षा का प्राथमिक भार उठाने लगता है, तो इससे अमेरिकी सैन्य संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए मुक्त हो सकता है – एक ऐसा परिदृश्य जो भारत जैसे देशों के लिए रणनीतिक अवसर और चुनौतियाँ दोनों पैदा करेगा। भारत पहले ही यूरोपीय शक्तियों के साथ रक्षा सहयोग को गहरा कर रहा है, और एक आत्मनिर्भर यूरोपीय स्तंभ नई दिल्ली को विविध साझेदारी विकल्प दे सकता है। हालाँकि, यदि यूरोपीय क्षमता निर्माण में देरी हुई या राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर पड़ी, तो नाटो की सामूहिक सुरक्षा गारंटी में दरार की आशंका वैश्विक अस्थिरता को जन्म दे सकती है, जिसका दक्षिण एशिया पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा। फिलहाल, रूते का जोर इस बात पर है कि ‘समस्या के रूप में चित्रित किया जाना वास्तविकता नहीं है’, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब यूरोपीय राजधानियाँ अपने बजटीय वादों को जमीनी सैन्य तैयारी में बदलेंगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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Rutte urges Europe to deliver credible plans to hit the 5% GDP defence spending target by 2035, framing the US reduction not as a withdrawal but as a necessary push for European self-reliance. He also highlights Trump's very positive role in the Ukraine peace process, clarifying that essential military aid will continue but Europe must bear the burden.
The United States is abandoning Europe and gutting NATO defence with an unprecedented cut: a third of fighter jets, aerial refuelling systems, bombers, and naval presence are being drastically reduced. Washington is forcing European allies to shed their total dependence and fend for themselves, marking a dangerous strategic shift.
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