
जर्मनी में औद्योगिक नौकरियों का संकट, ईरान में आर्थिक विडंबना: वैश्विक विनिर्माण क्षेत्र को सबक
जर्मनी मासिक 15,000 उद्योग नौकरियां खो रहा है जबकि ईरान का ऑटो उद्योग मूल्य नियंत्रण से जूझ रहा है; दोनों अर्थव्यवस्थाएं संरचनात्मक सुधारों की गुहार लगा रही हैं।
दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी में औद्योगिक संकट गहराता जा रहा है, जहां अब हर महीने औसतन 15,000 नौकरियां खत्म हो रही हैं, जो पिछले वर्ष के 10,000 के आंकड़े से कहीं अधिक है। संस्थान फर आर्बेइट्समार्क्ट- उंड बेरुफ्सफोर्शुंग (आईएबी) के अनुसार यह गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही। फॉक्सवैगन, बॉश और जेडएफ जैसी दिग्गज कंपनियां ही नहीं, बल्कि छोटे-मझोले उद्योग भी अपने कर्मचारियों की संख्या घटा रहे हैं। निवेश का रुख विदेशी ठिकानों की ओर मुड़ गया है: फॉक्सवैगन की सस्ती इलेक्ट्रिक कारें अब स्पेन में बन रही हैं, जबकि बीएमडब्ल्यू ने हंगरी में अपना नया कारखाना स्थापित किया है। यह रुझान यूरोप के केंद्र में विनिर्माण क्षेत्र की संरचनात्मक कमजोरी को उजागर करता है।
दूसरी ओर, ईरान का ऑटोमोबाइल उद्योग वर्षों से एक उलटी आर्थिक वास्तविकता में जी रहा है। बाजार के बुनियादी सिद्धांतों से परे, सरकारी मूल्य निर्धारण ने उत्पादन लागत और बिक्री मूल्य के बीच एक असंभव समीकरण खड़ा कर दिया है। बहमन 1403 (फरवरी 2025) में ईरान खोद्रो के निजीकरण ने एक नई उम्मीद जगाई कि सरकारी दखल से मुक्त होकर यह क्षेत्र सुधार की राह पकड़ेगा, लेकिन व्यापक अर्थव्यवस्था की बीमारियां इस एक कदम से दूर नहीं होने वालीं।
ईरान की गहराती आर्थिक मुश्किलों का सबसे मार्मिक प्रमाण बच्चों के श्रम और शोषण में वृद्धि है। ईरान चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा प्रकाशित शामख (क्रय प्रबंधक सूचकांक) लगातार 50 के स्वस्थता स्तर से नीचे बना हुआ है, जो उत्पादन, नए ऑर्डर और रोजगार में संकुचन का संकेत है। यह सूचक दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों और निवेशकों के लिए आर्थिक सेहत का अग्रिम संकेतक माना जाता है, और इसका लगातार नीचे रहना बताता है कि ईरान की मुश्किलें केवल प्रतिबंधों से नहीं, बल्कि गहरे संरचनात्मक दोषों से उपजी हैं।
ऐसे में चैंबर ऑफ कॉमर्स, उद्योग, खान और कृषि जैसी संस्थाओं की भूमिका विकास का साझेदार बनने की है। यह निकाय केवल अधिकारों की पैरवी तक सीमित न रहकर कारोबारी माहौल सुधारने, नियमों में स्थिरता, पारदर्शिता और उत्पादन की बाधाएं दूर करने पर केंद्रित हो सकते हैं। जर्मनी में भी, यूनियन और एसपीडी ग्रीष्म अवकाश से पहले अपनी बड़ी सुधार योजना पेश करने वाली हैं, जो इस बात का संकेत है कि विकसित अर्थव्यवस्थाएं भी संरचनात्मक बदलाव की अनिवार्यता से अछूती नहीं हैं।
दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए ये घटनाक्रम एक चेतावनी और अवसर दोनों हैं। जहां जर्मनी से पलायन करता निवेश कुशल श्रम और स्थिर नीतियों वाले नए ठिकानों की तलाश में है, वहीं ईरान का अनुभव बताता है कि बाहरी झटकों से अधिक घातक आंतरिक कुप्रबंधन होता है। भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अपनी विनिर्माण क्षमता बढ़ाने के लिए सुधारों को गति देनी होगी, ताकि वे जर्मन संकट से उपजे अवसरों का लाभ उठा सकें और ईरान जैसे संरचनात्मक जाल में न फंसें।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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जर्मन मंदी गहरा रही है: हर महीने 15,000 औद्योगिक नौकरियां खत्म हो रही हैं, जो पिछले साल के 10,000 से अधिक है। गठबंधन सरकार गिरावट को रोकने के लिए गर्मी की छुट्टियों से पहले सुधार पैकेज को अंतिम रूप देने में जुटी है।
ईरान से, जर्मन औद्योगिक संकट को अलगाव और थोड़े संदेह के साथ देखा जाता है, यह कहते हुए कि सबसे मजबूत पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएं भी संरचनात्मक कमजोरियां दिखाती हैं। तर्क दिया जाता है कि वैश्विक उथल-पुथल सभी को प्रभावित करती है, लेकिन तेहरान को अपने आंतरिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए।
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