
17 किलोमीटर लंबी रील, 136 किलो का ‘ताबूत’ और शीशों का जाल: क्रिस्टोफर नोलन की ‘द ओडिसी’ के पीछे की अदृश्य दुनिया
दुनिया के महज 41 सिनेमाघरों में दिखेगी नोलन की असली 70mm दृष्टि, बाकी दर्शकों को मिलेगा फसल का एक हिस्सा।
मेलबर्न के IMAX थियेटर के प्रोजेक्शन रूम में एक 240 किलो की रील घूम रही है। 17 किलोमीटर लंबी यह पट्टी कोई साधारण फिल्म नहीं, बल्कि क्रिस्टोफर नोलन की ‘द ओडिसी’ का 70mm IMAX प्रिंट है—दक्षिणी गोलार्ध का इकलौता। तकनीकी प्रबंधक डैन ड्रोबिक के लिए यह ‘एक अनमोल वस्तु’ है, जिसे छूने से पहले हर सावधानी बरती जाती है। इसी रील के भीतर होमर की वह दुनिया कैद है जिसे नोलन ने बिना किसी हरी स्क्रीन के, छह देशों की असली ज़मीन पर उतारा है।
इस रील तक पहुँचने की राह आसान नहीं थी। IMAX कैमरे इतने भारी और शोरगुल वाले होते हैं कि संवाद रिकॉर्ड करना लगभग असंभव था। नोलन की टीम ने एक ध्वनिरोधी आवरण बनाया जिसे ‘ब्लिंप’ कहा गया—आकार में एक ताबूत जैसा, वज़न 136 किलो से अधिक, जिसे छह लोग उठाते थे। लेकिन इस विशालकाय डिब्बे ने अभिनेताओं की आँखों की रेखा पूरी तरह तोड़ दी। तब सेट पर शीशों का एक जाल बिछाया गया: एक अभिनेता अपने सामने लगे शीशे में देखता, जो दूसरी ओर लगे दूसरे शीशे का प्रतिबिंब दिखाता, और इस तरह दोनों एक-दूसरे की आँखों में देख पाते। ऐन हैथवे ने इसे ‘सचमुच सरलता से भरा’ बताया।
यह तकनीकी जिद सिर्फ एक निर्देशक की सनक नहीं है। मैट डेमन ने फिल्मांकन के दौरान कहा था कि शायद यह उनके लिए इस तरह की आखिरी फिल्म हो, क्योंकि स्टूडियो अब इतने संसाधन व्यावहारिक प्रभावों और लोकेशन शूटिंग पर नहीं लगाएँगे। नोलन ने इस निराशावाद को खारिज करते हुए जवाब दिया कि सिनेमा लगातार खुद को बदल रहा है और नई पीढ़ी के फिल्मकार इसे अपना रहे हैं। उन्होंने जेन-ज़ी निर्देशकों करी बार्कर और केन पार्सन्स का उदाहरण दिया, जिनकी कम बजट की फिल्में दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच रही हैं।
दर्शक भी इस खिंचाव से अछूते नहीं हैं। जापान से लंदन तक का सफर करके BFI में नोलन-अनुमोदित सीट पाने वाले एडम ये हों, या वाशिंगटन डीसी के कालेब हिल्टन जिन्होंने टिकट के लिए तीन डिवाइसें झोंक दीं—दुनिया भर में लोग ‘द ओडिसी’ के असली 70mm अनुभव के लिए समुद्र पार कर रहे हैं। ईबे पर एक टिकट की औसत कीमत 165 डॉलर रही, और लॉस एंजेलिस में ओपनिंग नाइट की एक सीट 600 डॉलर में बिकी। भारत में उत्साह कम नहीं है, लेकिन यहाँ एक भी 1570 थियेटर न होने के कारण दर्शकों को फसल का एक हिस्सा ही मिलेगा—डिजिटल IMAX स्क्रीन पर नोलन का पूरा फ्रेम काटकर दिखाया जाएगा।
आइसलैंड के काले रेत वाले तटों पर जब ओडिसियस अंडरवर्ल्ड की ओर बढ़ता है, तब कैमरे के सामने कोई डिजिटल पर्दा नहीं, बल्कि धरती की अपनी भाप छोड़ती दरारें हैं। यही वह बनावट है जिसे नोलन ने तारकोवस्की की ‘आंद्रेई रुबलेव’ और कुरोसावा की ‘रान’ देखकर तलाशा था—हवा में फड़फड़ाते झंडे, समुद्र की नमकीन साँसें, और एक ऐसा सिनेमा जो देखे जाने से ज़्यादा जिए जाने की माँग करता है।
| अरब खाड़ी प्रेस | +1.00 | aligned |
|---|---|---|
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | −0.40 | critical |
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | +0.20 | neutral |
दुबई नोलन की तकनीकी विजय का जश्न मनाता है, फिल्म को सिनेमा में एक वैश्विक मील का पत्थर बताता है।
लेख एक स्थानीय उपलब्धि को वैश्विक सफलता के रूप में प्रस्तुत करके सार्वभौमिक बनाता है, अन्यत्र तकनीकी सीमाओं को अनदेखा करता है।
लेख यह छोड़ देता है कि भारत और इटली सहित कई बाजार फिल्म को उसके इच्छित 70mm IMAX प्रारूप में नहीं दिखा सकते, जो सार्वभौमिक विजय की कथा को कमजोर करता है।
भारतीय प्रशंसक छूटे अवसर पर शोक व्यक्त करते हैं, इस बात पर जोर देते हुए कि उच्च टिकट कीमतों के बावजूद, वे नोलन की पूरी दृष्टि तक नहीं पहुंच सकते।
लेख तकनीकी कमियों और उच्च लागतों पर ध्यान केंद्रित करके बहिष्कार को उजागर करता है, पीड़ितता और छूटे अनुभव की कथा बनाता है।
लेख यह छोड़ देता है कि फिल्म की तकनीकी उपलब्धि डिजिटल IMAX में भी अभूतपूर्व है, और दुनिया भर के कई दर्शक इसे उच्च गुणवत्ता में अनुभव करेंगे।
इतालवी सिनेमाघर नोलन की दृष्टि को न्याय नहीं दे सकते, फिर भी फिल्म की भव्यता का जश्न मनाया जाता है, जिससे स्थानीय सीमा और वैश्विक उपलब्धि के बीच तनाव पैदा होता है।
ब्लॉक एक दोहरे रजिस्टर का उपयोग करता है: एक लेख तकनीकी सीमाओं की आलोचनात्मक व्याख्या करता है, दूसरा फिल्म के पैमाने को बढ़ावा देता है, दोनों पक्षों को बिना विरोधाभास सुलझाए प्रस्तुत करता है।
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