
केंद्रीय बैंकों का सोने की ओर झुकाव: डॉलर पर भरोसा घटा, स्वर्ण भंडार की वापसी तेज
वैश्विक सर्वेक्षण में 45% रिज़र्व प्रबंधकों ने अगले वर्ष अपने स्वर्ण भंडार बढ़ाने की बात कही, वहीं बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों के चलते कई देश अपना सोना लंदन-न्यूयॉर्क से स्वदेश ला रहे हैं।
वैश्विक केंद्रीय बैंकों के बीच सोने के प्रति आकर्षण एक नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। विश्व स्वर्ण परिषद (WGC) के ताज़ा वार्षिक सर्वेक्षण के अनुसार, 89 प्रतिशत रिज़र्व प्रबंधकों का मानना है कि अगले 12 महीनों में वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंकों का स्वर्ण भंडार और बढ़ेगा। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि 45 प्रतिशत प्रबंधकों ने कहा कि उनकी अपनी संस्था भी इस अवधि में सोने की खरीद करेगी—यह सर्वेक्षण के इतिहास में अब तक का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। साथ ही, एक समानांतर प्रवृत्ति यह भी उभर रही है कि केंद्रीय बैंक अपने स्वर्ण भंडार को पारंपरिक भंडारण केंद्रों लंदन और न्यूयॉर्क से हटाकर अपने देशों में ला रहे हैं। WGC के अनुसार, पिछले वर्ष 9 प्रतिशत बैंकों ने घरेलू भंडारण बढ़ाया, जबकि इससे पिछले साल यह दर मात्र 5 प्रतिशत थी। विदेशी भंडारण में विविधता लाने वाले बैंकों की संख्या भी 2 प्रतिशत से बढ़कर 10 प्रतिशत हो गई।
यह दोहरा रुझान—सोने की खरीद बढ़ाना और उसे स्वदेश लाना—गहराते भू-राजनीतिक तनावों और डॉलर की विश्वसनीयता पर उठते सवालों का सीधा परिणाम है। सर्वेक्षण फरवरी से मई के बीच किया गया, ऐसे समय में जब मध्य पूर्व में संघर्ष तेज़ हुआ, तेल की कीमतें चढ़ीं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर दबाव बना। कई केंद्रीय बैंकों, विशेषकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने, पश्चिमी प्रतिबंधों और परिसंपत्ति फ्रीज़ की घटनाओं से सबक लेते हुए अपने भंडार पर नियंत्रण बढ़ाने का निर्णय लिया है। न्यूयॉर्क फेड और बैंक ऑफ इंग्लैंड की तिजोरियों में अरबों डॉलर का सोना जमा है, लेकिन अब देश इसे अपनी सीमाओं के भीतर सुरक्षित रखना चाहते हैं ताकि किसी भी भू-राजनीतिक संकट में उस तक पहुंच बाधित न हो।
सर्वेक्षण में शामिल 74 केंद्रीय बैंकों में से 54 प्रतिशत ने अपने मौजूदा स्वर्ण भंडार को स्थिर रखने की बात कही, जबकि केवल 1 प्रतिशत ने कमी का अनुमान लगाया। यह आंकड़े बताते हैं कि सोना अब केवल एक परंपरागत सुरक्षित परिसंपत्ति नहीं, बल्कि रणनीतिक संकटकालीन उपकरण के रूप में देखा जा रहा है। डॉलर पर दबाव स्पष्ट है—केंद्रीय बैंक डॉलर-आधारित परिसंपत्तियों का विकल्प तलाश रहे हैं। खाड़ी देशों और एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में भी यह सोच पकड़ बना रही है। भारत जैसे देश, जो पहले से ही बड़े स्वर्ण उपभोक्ता हैं, के लिए यह वैश्विक लहर महत्वपूर्ण है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने भी हाल के वर्षों में अपने स्वर्ण भंडार में इज़ाफा किया है और यह प्रवृत्ति जारी रह सकती है।
आगे की राह देखें तो विशेषज्ञों का मानना है कि सोने की मांग में यह तेज़ी बनी रहेगी। डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने वाले कारक—जैसे बहुध्रुवीय भू-राजनीति, व्यापार तनाव और डिजिटल मुद्राओं का उदय—सोने की चमक को और बढ़ा सकते हैं। हालांकि, सोने की कीमतों में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है, लेकिन केंद्रीय बैंकों की दीर्घकालिक खरीदारी बाज़ार को एक मज़बूत आधार देगी। यह बदलाव अंतरराष्ट्रीय मुद्रा प्रणाली के लिए एक शांत लेकिन गहरी पुनर्संरचना का संकेत है, जिसमें सोना एक बार फिर केंद्रीय भूमिका निभाने को तैयार है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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विश्व स्वर्ण परिषद के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि केंद्रीय बैंक अपने स्वर्ण भंडार को बढ़ाना जारी रखने की योजना बना रहे हैं। 89 प्रतिशत रिज़र्व प्रबंधकों को वैश्विक स्वर्ण होल्डिंग्स में और वृद्धि की उम्मीद है, और 45 प्रतिशत अपनी संस्था के भंडार को बढ़ाने का इरादा रखते हैं। रिपोर्टिंग तथ्यात्मक और संतुलित बनी हुई है।
केंद्रीय बैंक बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण न्यूयॉर्क और लंदन की तिजोरियों से अपने स्वर्ण भंडार को वापस अपने देशों में ला रहे हैं। विश्व स्वर्ण परिषद के अनुसार, पिछले वर्ष 9 प्रतिशत संस्थानों ने घरेलू भंडारण बढ़ाया है, और 10 प्रतिशत ने अपने विदेशी डिपॉजिटरी में विविधता लाई है। यह बदलाव पारंपरिक पश्चिमी वित्तीय केंद्रों में विश्वास की कमी को दर्शाता है।
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