
अमेरिका-ईरान युद्धविराम से सोने में जबरदस्त उछाल, तेल कीमतों में राहत; भारत पर क्या असर
अमेरिका और ईरान के बीच प्रारंभिक शांति समझौते की घोषणा से वैश्विक बाजारों में सोना 3.6% चढ़ा और कच्चे तेल में भारी गिरावट आई, जिससे मुद्रास्फीति की चिंता कम हुई है।
सोमवार को वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए सबसे बड़ी खबर अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रारंभिक शांति समझौते की घोषणा रही, जिसने न केवल पश्चिम एशिया में तनाव कम किया बल्कि सोने और तेल की कीमतों को विपरीत दिशाओं में धकेल दिया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बताया कि दोनों देशों ने खाड़ी युद्ध समाप्त करने के लिए एक सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत तीस दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोला जाएगा और अमेरिकी नाकेबंदी हटाई जाएगी। इस घोषणा के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज हुई, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति के दबाव में राहत की उम्मीद जगी। न्यूयॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज के कॉमेक्स मंडल पर अगस्त डिलीवरी वाला सोना 2.7% उछलकर 4,351.6 डॉलर प्रति औंस पर बंद हुआ, जबकि चांदी में 3.2% की बढ़त के साथ 70.18 डॉलर प्रति औंस का भाव रहा। यह तेजी इसलिए भी अहम है क्योंकि संघर्ष शुरू होने के बाद से सोना लगभग 17% टूट चुका था और पिछले सप्ताह नवंबर के बाद के सबसे निचले स्तर को छू गया था।
मंगलवार को बाजारों ने थोड़ा स्थिर रुख अपनाया, क्योंकि निवेशक समझौते के बारीक विवरणों का इंतजार करने लगे। हाजिर सोना 0.2% की मामूली बढ़त के साथ 4,315.87 डॉलर प्रति औंस पर पहुंचा, जबकि अमेरिकी वायदा अनुबंध 0.3% फिसलकर 4,337.10 डॉलर पर आ गए। विश्लेषक एडवर्ड मेयर के अनुसार, ईरान से जुड़ी खबरों के चलते बीते गुरुवार देर रात से सोने में अच्छी तेजी देखी जा रही है और यह उत्साह-जनित रैली अगले कुछ दिनों तक जारी रह सकती है, जो शुक्रवार को जिनेवा में होने वाले औपचारिक हस्ताक्षर समारोह पर अपने चरम पर पहुंचेगी। हालांकि, दोनों पक्षों ने स्पष्ट किया है कि स्थायी युद्धविराम पर अभी बातचीत होनी बाकी है, इसलिए बाजार में सतर्कता बनी हुई है।
तेल की कीमतों में गिरावट का असर व्यापक आर्थिक परिदृश्य पर पड़ा है। बॉन्ड यील्ड और डॉलर इंडेक्स में नरमी आई, जिससे सोने जैसी बिना प्रतिफल वाली परिसंपत्तियों का आकर्षण बढ़ा। लेकिन इस सप्ताह अमेरिकी फेडरल रिजर्व सहित कई प्रमुख केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीति बैठकें होनी हैं, जो सोने की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। मिराए एसेट शेयरखान के करेंसी और कमोडिटीज प्रमुख प्रवीण सिंह का मानना है कि निकट अवधि में सोना और ऊपर जा सकता है, लेकिन फेड की बैठक पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी। यदि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती के संकेत देते हैं, तो सोने को अतिरिक्त समर्थन मिल सकता है।
भारत और दक्षिण एशिया के लिए ये घटनाक्रम मिश्रित संकेत लेकर आए हैं। दुनिया के दूसरे सबसे बड़े सोना उपभोक्ता भारत में कीमतों में तेजी से आभूषण मांग प्रभावित हो सकती है और आयात बिल बढ़ सकता है, लेकिन कच्चे तेल में गिरावट चालू खाता घाटे और घरेलू मुद्रास्फीति के लिए बड़ी राहत है। होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने से एशिया की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला स्थिर होगी, जिसका लाभ पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल जैसे तेल आयातक देशों को भी मिलेगा। साथ ही, खाड़ी क्षेत्र में शांति बहाल होने से वहां कार्यरत लाखों दक्षिण एशियाई प्रवासी श्रमिकों की आय और प्रेषण धनराशि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है।
फिलहाल बाजार उत्साह की लहर पर सवार है, लेकिन स्थायी शांति समझौते की बारीकियां सामने आने तक सोने की दिशा अनिश्चित बनी रह सकती है। यदि भू-राजनीतिक जोखिम पूरी तरह समाप्त होता है, तो सोने की सुरक्षित-निवेश मांग घट सकती है, वहीं दूसरी ओर केंद्रीय बैंकों की नरम नीतियां कीमतों को सहारा दे सकती हैं। निवेशकों के लिए आने वाले दिन अहम होंगे, जब जिनेवा समारोह और फेड के फैसले मिलकर सोने की अगली चाल तय करेंगे।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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अमेरिका-ईरान युद्धविराम समझौते ने सोने में जबरदस्त तेजी और तेल की कीमतों में भारी गिरावट को जन्म दिया है, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति की चिंताएँ कम हुई हैं। बाजार अब केंद्रीय बैंकों के आगामी निर्णयों पर नज़र रख रहे हैं, इस उम्मीद के साथ कि सस्ती ऊर्जा और कम भू-राजनीतिक जोखिम ब्याज दरों में बढ़ोतरी को नरम करेंगे।
अमेरिका-ईरान समझौते के पूर्ण विवरण की प्रतीक्षा में निवेशकों के साथ, प्रारंभिक उछाल के बाद सोने की कीमतें स्थिर हो गईं। हालांकि आशावाद है कि यह समझौता मुद्रास्फीति और ब्याज दर के दबाव को कम कर सकता है, लेकिन हस्ताक्षर समारोह और ठोस शर्तों के सार्वजनिक होने तक सावधानी हावी है।
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