
जर्मनी में अफ़डी का सियासी उभार: चुनावी ताकत और सुरक्षा नीति पर तनाव
जर्मनी के पूर्वी राज्यों में सितंबर चुनाव से पहले अफ़डी की बढ़त, संघीय सरकार की गोपनीय सूचना रोकने की धमकी और आर्थिक नीति पर विरोधाभासों ने राजनीतिक माहौल गरमाया है।
जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (अफ़डी) ने एरफ़र्ट में अपने संघीय अधिवेशन में सह-नेतृत्व को पुनः चुनते हुए शासन के लिए तैयार होने का दावा किया। एलिस वाइडेल को 81.3 प्रतिशत और टीनो क्रुपाल्ला को लगभग 70 प्रतिशत मतों से दोबारा अध्यक्ष चुना गया, जबकि स्टीफ़न म्योलर—जिन्हें पार्टी के कट्टरपंथी नेता ब्योर्न होके का करीबी माना जाता है—उपाध्यक्ष बने। यह अधिवेशन ऐसे समय हुआ जब सितंबर में होने वाले साक्सन-एनहाल्ट और मैक्लेनबुर्ग-वोर्पोमर्न के राज्य चुनावों में अफ़डी पूर्ण बहुमत पाने की स्थिति में है, और राष्ट्रीय स्तर पर उसकी लोकप्रियता 29 प्रतिशत तक पहुंच गई है। अधिवेशन के बाहर करीब 31,000 प्रदर्शनकारियों ने सड़कें जाम कीं और कुछ हिंसक झड़पें हुईं, जिनमें दक्षिणपंथी मीडिया पोर्टल अपोलो न्यूज़ के तीन पत्रकारों पर हमला शामिल था। प्रदर्शन आयोजकों ने इस हमले को यह कहकर सही ठहराया कि ‘फासीवादी पत्रकार परिचय पत्र के साथ भी फासीवादी ही रहते हैं’।
अफ़डी नेतृत्व ने अपने भाषणों में जर्मनी को आर्थिक पतन की ओर बढ़ता देश बताया। वाइडेल ने कहा कि देर-सबेर राज्य स्तर पर और फिर संघीय स्तर पर सरकार बनाएंगे, और ‘सख्त खर्च में कटौती’ करेंगे—विशेषकर प्रवासियों को मिलने वाले सामाजिक लाभों में। उन्होंने यूक्रेन को दी जा रही सहायता को ‘सौ अरब यूरो का उपहार’ करार दिया। क्रुपाल्ला ने मौजूदा केंद्र सरकार पर ‘झूठे वादों’ का आरोप लगाया और दावा किया कि अफ़डी ही मज़दूरों के हितों की रक्षक है। पार्टी की यह कथनी ऐसे माहौल में गूंजी जब वित्त मंत्री लार्स क्लिंगबाइल का बजट प्रस्ताव 2027 के लिए 118.7 अरब यूरो की शुद्ध उधारी का अनुमान लगा रहा है, और ब्याज भुगतान 2030 तक 80.7 अरब यूरो पहुंचने की आशंका है।
संघीय रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस (सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी) ने चेतावनी दी कि यदि अफ़डी किसी राज्य में सरकार बनाती है तो उसे गोपनीय सूचना देने से रोका जा सकता है। उन्होंने इसका कारण पार्टी के रूसी राष्ट्रपति पुतिन के प्रति नज़दीकी और अवैध रूसी धन प्राप्त करने की आशंकाओं को बताया। जर्मनी की आंतरिक खुफिया सेवा (बीएफ़वी) ने अफ़डी की कई राज्य इकाइयों को ‘सत्यापित दक्षिणपंथी चरमपंथी’ श्रेणी में रखा है, फिर भी पार्टी की चुनावी अपील कम नहीं हुई है। पिस्टोरियस ने सैनिकों से आह्वान किया कि वे लोकतंत्र के हित में अपने मत का प्रयोग सोच-समझकर करें। इस बयान ने जर्मनी के संघीय ढांचे के कामकाज पर सवाल खड़े किए हैं—विशेषकर उन सेन्य अड्डों पर जो इन राज्यों में स्थित हैं।
अधिवेशन का समय प्रतीकात्मक रहा: ठीक 4 जुलाई 1926 को वाइमर में नाज़ी पार्टी का राइख़्सपार्टाइटाग हुआ था। हालांकि अफ़डी प्रवक्ताओं ने इसे संयोग बताया। आलोचकों और प्रदर्शनकारियों ने इसे जानबूझकर चुनी गई तारीख़ करार दिया। आर्थिक मोर्चे पर, सरकारी बजट में बढ़ती उधारी और रक्षा ख़र्च ने अफ़डी को आलोचना का मौका दिया है, जबकि विपक्षी फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी (एफ़डीपी) ने भी ‘बचत का साहस’ न दिखाने के लिए सरकार की निंदा की है। अब सितंबर के राज्य चुनावों के नतीजे तय करेंगे कि अफ़डी सत्ता के कितने करीब पहुंचती है और संघीय सरकार अपनी सुरक्षा नीतियों को किस रूप में लागू करती है।
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.80 | critical |
|---|---|---|
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | −0.70 | critical |
| चीनी प्रेस | −0.30 | critical |
The AfD tries to whitewash its image but remains a far-right party with neo-Nazi ties and an ethno-nationalist agenda.
The constant juxtaposition of electoral promises with judicial facts (Höcke's conviction) makes the moderate turn implausible.
The AfD's policy proposals that might appeal to voters beyond immigration are omitted, focusing solely on extremism.
The AfD congress falls on the centenary of a Nazi rally, a provocation that shows the continuity of the far-right.
The temporal coincidence is presented as proof of ideological continuity, appealing to historical memory to delegitimize the party.
It omits that the date choice might be coincidental or not officially acknowledged by the AfD.
The German government may withhold classified information from states won by the AfD, reflecting national security concerns.
The news is framed as a necessary security measure, emphasizing ties to Moscow to justify distrust of the party.
It omits that the AfD's popularity also stems from genuine voter discontent with mainstream parties.
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