
इसरायल-फलस्तीन युद्ध से गहरी हुई वैश्विक यहूदी समुदाय की दरारें
अमेरिका में यहूदी प्रदर्शनकारियों ने इज़रायली मंत्री को युद्ध अपराधी कहा, जबकि इज़रायल का आतंरिक सर्वेक्षण दर्शाता है कि ध्रुवीकरण सबसे बड़ा ख़तरा बन गया है और यूरोप में यहूदी-विरोध बढ़ा है।
अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में वार्षिक इज़रायल दिवस परेड इस बार एक नए तरह के तनाव का गवाह बनी जब प्रगतिशील यहूदी समुदाय के सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने इज़रायल के वित्त मंत्री बेज़ालेल स्मोट्रिच को ‘युद्ध अपराधी’ और ‘शर्म करो’ के नारों से घेर लिया। मीडिया इंडोनेशिया की रिपोर्टों के अनुसार, गाज़ा में नरसंहार के विरोध में सड़कों पर उतरे इन अमेरिकी यहूदियों ने स्मोट्रिच को स्पष्ट संदेश दिया कि इज़रायल की दक्षिणपंथी सरकार की नीतियों से उनका गहरा मतभेद है। स्मोट्रिच ने इन आवाज़ों को दरकिनार करते हुए वैश्विक यहूदी समुदाय की एकता का पारंपरिक दावा दोहराया, मगर यह दृश्य इस सच्चाई को उजागर कर रहा था कि प्रवासी यहूदियों और इज़रायली दक्षिणपंथ के बीच बढ़ती खाई अब सार्वजनिक मंचों तक पहुँच चुकी है।
इधर, खुद इज़रायल के भीतर भी गहरे आतंरिक तनाव हैं। जेरूसलम पोस्ट द्वारा उद्धृत यहूदी जन नीति संस्थान की नई रिपोर्ट बताती है कि 55 प्रतिशत इज़रायली ध्रुवीकरण और गृह युद्ध के ख़तरे को देश के अस्तित्व के लिए सबसे गंभीर संकट मानते हैं, जो ईरान के परमाणु बम (23%) और फलस्तीनी संघर्ष (18%) से कहीं आगे है। इसी आंतरिक दरार को और गहरा कर रहा है हरेदी (अति-रूढ़िवादी) युवकों की सैन्य सेवा से छूट का मसला। उप विदेश मंत्री शैरन हास्केल ने युद्धकाल में डेकेयर सब्सिडी विस्तार जैसे मसौदा-भर्ती विधेयकों को सेवा कर रहे सैनिकों की पीठ में छुरा भोंकने जैसा बताया है। इससे स्पष्ट है कि धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक खेमों के बीच सामाजिक अनुबंध बुरी तरह चरमरा रहा है।
इस ध्रुवीकरण का एक और पहलू इज़रायल के अरब नागरिकों की राजनीतिक दशा है। हारेत्ज़ की रिपोर्ट के अनुसार, चरम दक्षिणपंथी ताक़तों के उभार और अरब बस्तियों में बढ़ते अपराध व असुरक्षा के बीच मतदाता अपना भविष्य तय करने की दुविधा में हैं। अगर अरब दल एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ते तो मतदान प्रतिशत गिरने का ख़तरा है, जिससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व कमज़ोर होगा। यह भीतरी बिखराव बताता है कि इज़रायली समाज की चुनौतियाँ केवल बाहरी शत्रुओं तक सीमित नहीं हैं।
यहूदी पहचान का संकट यूरोप में भी परिलक्षित हो रहा है। स्वीडन के बैरोमेटर्न अख़बार के अनुसार, 2020 से 2025 के बीच वहाँ यहूदी-विरोधी दृष्टिकोण रखने वालों और उदासीन रहने वालों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि हुई है। विशेषज्ञ इस बदलाव को इज़रायल-हमास युद्ध से जोड़कर देखते हैं, हालाँकि फिसलन कब शुरू हुई यह स्पष्ट नहीं है। अमेरिकी यहूदियों का सड़कों पर उतरना, इज़रायल का आतंरिक ध्रुवीकरण और यूरोप का बढ़ता यहूदी-विरोध—ये तीनों आयाम एक ही जटिल सच्चाई की ओर इशारा करते हैं कि इज़रायल-फलस्तीन संघर्ष अब वैश्विक यहूदी एकता और सुरक्षा की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती दे रहा है। भारत जैसे देशों के लिए, जिनके इज़रायल और फलस्तीन दोनों से गहरे संबंध हैं, यह बदलता सामाजिक परिदृश्य कूटनीतिक समझ और संतुलन की नई माँगें खड़ी करता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ज्यूइश पीपल पॉलिसी इंस्टीट्यूट की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 55% इज़राइली आंतरिक ध्रुवीकरण और गृहयुद्ध के जोखिम को देश के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा ख़तरा मानते हैं। अति-रूढ़िवादी सैन्य सेवा से बचने वालों को सब्सिडी देने वाले क़ानून, अरब-यहूदी तनाव और बख़्तरबंद कोर में महिलाओं की भागीदारी पर मतभेद राष्ट्रीय एकता को बाहरी दुश्मन से कहीं अधिक कमज़ोर कर रहे हैं।
न्यूयॉर्क में वार्षिक इज़राइल डे परेड में, इज़राइल के दक्षिणपंथी मंत्रियों और सांसदों का सामना 'युद्ध अपराधी' के नारों से हुआ, जो गाज़ा में नरसंहार की निंदा कर रहे प्रगतिशील यहूदी समुदायों से आए। यह दरार केवल इज़राइली समाज को नहीं, बल्कि यहूदी प्रवासियों को भी बांट रही है, जहाँ बढ़ती आवाज़ें यहूदी राज्य की नीतियों से खुले तौर पर अलग हो रही हैं।
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