
एक नर्स के आँसू, एक मशीन की खामोशी: देखभाल का वैश्विक संकट
स्वीडन के एक अस्पताल से लेकर बांग्लादेश के उपजिला स्वास्थ्य केंद्रों तक, स्वास्थ्यकर्मियों और हाशिए के समूहों की अनसुनी आवाज़ें एक साझा हकीकत बयान कर रही हैं।
माल्मो के सूस कार्डियक वार्ड में एक शाम, शिफ्ट बदलते वक्त एक नर्स की आँखें भर आईं। उसने अपने सहकर्मी से कहा कि वह दिनभर में मरीज़ों की ज़रूरतें पूरी नहीं कर पाई, और अब रात की शिफ्ट वाली नर्स को अतिरिक्त काम सौंपने का अपराधबोध उसे रुला रहा था। यह सुनकर रात की नर्स भी रोने लगी। यह कोई अकेला वाकया नहीं था; उसी वार्ड में पिछले छह महीनों में 14 नर्सें इस्तीफ़ा दे चुकी थीं, और गर्मियों के लिए 90 शिफ्टें खाली पड़ी थीं।
स्वीडन, जिसे अक्सर एक आदर्श कल्याणकारी राज्य माना जाता है, वहाँ की सेहत व्यवस्था खामोशी से बिखर रही है। ब्लेकिंगे की एक अंडरशॉफ़्टर ने 40 साल के अनुभव के बाद लिखा, 'हम जल्द ही और बर्दाश्त नहीं कर पाएँगे।' स्कॉने क्षेत्र के दस बड़े यूनियन प्रतिनिधियों ने एक साझा बयान में कहा कि वर्तमान नीतियाँ 'तेज़ और आसान समाधान' पर केंद्रित हैं, जिससे बच्चे, बुज़ुर्ग और गंभीर रोगी पीछे छूट रहे हैं। उन्होंने माँग की कि देखभाल का मूल्यांकन मरीज़ों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके स्वास्थ्य परिणामों और कर्मचारियों की ख़ुशहाली से हो।
इसी दर्द की गूँज बांग्लादेश के ग्रामीण इलाकों में सुनाई देती है, जहाँ 310 उपजिला स्वास्थ्य केंद्रों में 485 एक्स-रे मशीनें और 252 अस्पतालों में 395 अल्ट्रासाउंड मशीनें बेकार पड़ी हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने संसद में यह आँकड़े रखे, लेकिन मशीनों की मरम्मत का टेंडर भी सालों से लंबित है। नतीजा यह कि गरीब मरीज़ महँगे निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों की ओर धकेल दिए जाते हैं, और सही समय पर जाँच न होने से इलाज अधूरा रह जाता है। प्रति लाख जन्म पर 4,353 माताओं की मृत्यु दर इसी उपेक्षा की एक परत है।
देखभाल का यह संकट सिर्फ़ स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित नहीं है; यह पहचान और सम्मान की लड़ाई में भी दिखता है। ब्राज़ील में 2025 में लैंगिक पहचान और यौन अभिविन्यास के आधार पर भेदभाव के नए मुकदमे लगभग तिगुने हो गए—83 से बढ़कर 221। राष्ट्रीय न्याय परिषद (CNJ) के अनुसार, यह वृद्धि न्यायिक प्रणाली में इन मामलों की बढ़ती मौजूदगी और भेदभाव के ख़िलाफ़ नीतियों की अहमियत को रेखांकित करती है। मेक्सिको में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (CNDH) ने जेलों में LGBT+ क़ैदियों के प्रति हिंसा, अस्वीकृति और अनुचित अलगाव को रोकने के लिए प्रोटोकॉल लागू करने की तत्काल अपील की है।
ये सब कहानियाँ एक ही सूत्र में बँधी हैं: ऐसे शरीर और जीवन जिन्हें व्यवस्थाएँ या तो अनदेखा कर देती हैं या कुचल देती हैं। स्वीडन में सेंटरक्विन्नोर्ना जैसे संगठन माँग कर रहे हैं कि 'देखभाल करने वाली महिलाओं को हीरो कहने के बजाय समाज की रीढ़ माना जाए।' कालमार में विपक्षी नेता हने लिंडक्विस्ट ने चेतावनी दी कि 'अगर हमें समस्या का आकार ही नहीं पता, तो समाधान कैसे करेंगे?'—यह सवाल ढाका के टूटे एक्स-रे कमरे से लेकर माल्मो की रोती नर्स तक, सब पर लागू होता है। बांग्लादेश के एक उपजिला अस्पताल में, सालों से बंद पड़ी अल्ट्रासाउंड मशीन पर धूल जमी है; उसकी खामोशी उन हज़ारों आवाज़ों का प्रतीक है जो सुनने वालों की तलाश में हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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स्वीडन के हृदय वार्डों में स्वास्थ्यकर्मी चेतावनी दे रहे हैं: असहनीय कार्यभार, प्रति नर्स बहुत अधिक मरीज़ और रद्द छुट्टियाँ कर्मचारियों को आँसुओं तक ले जा रही हैं। वर्षों की चेतावनियों के बावजूद, स्टाफ़ की कमी बनी हुई है और वादा किए गए सुदृढ़ीकरण कभी नहीं आते। देखभाल प्रणाली टूटने की कगार पर है और इसे संभालने वाले थके और हताश हैं।
हृदय वार्ड का संकट उस प्रणाली की गहरी असमानताओं को उजागर करता है जो देखभाल कार्य को कम आंकती है, जो भारी मात्रा में महिलाओं द्वारा किया जाता है। जिस तरह LGBTQIAPN+ लोगों के खिलाफ भेदभाव की निंदा की जा रही है, उसी तरह स्वास्थ्यकर्मियों के शोषण का सामना अधिकार और गरिमा के मामले के रूप में किया जाना चाहिए। राज्य का कर्तव्य है कि वह सभ्य कार्य स्थितियों की गारंटी दे और दूसरों की देखभाल करने वालों की मूक पीड़ा को रोके।
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