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स्वास्थ्य और विज्ञानमंगलवार, 16 जून 2026

बच्चों में मोटापे और मधुमेह की लहर, नई दवाओं और स्क्रीनिंग से जगी उम्मीद

इंडोनेशिया में बच्चों के बीच जीवनशैली रोगों की चेतावनी के बीच वैश्विक स्तर पर सेमाग्लूटाइड जैसी दवाओं को मोटापे की पहली पंक्ति के इलाज का दर्जा मिला है।

दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर वैश्विक स्वास्थ्य मंचों तक, बच्चों और युवाओं में गैर-संचारी रोगों की चुपचाप बढ़ती लहर ने विशेषज्ञों को सचेत कर दिया है। इंडोनेशियाई बाल रोग विशेषज्ञ संघ (आईडीएआई) ने हाल ही में आगाह किया कि मोटापा, उच्च रक्तचाप और टाइप-2 मधुमेह जैसी ‘नई जीवनशैली बीमारियां’ अब किशोरों और बच्चों में भी तेज़ी से पांव पसार रही हैं। आईडीएआई प्रमुख डॉ. पिप्रिम बसाराह यानुआरसो के अनुसार, खान-पान की बदलती आदतें और शारीरिक गतिविधियों में आई भारी कमी इस बदलाव के मुख्य चालक हैं। यह चिंता सिर्फ इंडोनेशिया तक सीमित नहीं है; भारत में भी बच्चों में मोटापे और टाइप-2 डायबिटीज़ के मामले पिछले एक दशक में चिंताजनक रूप से बढ़े हैं, जो दक्षिण एशिया की बदलती जीवनशैली और पोषण संक्रमण की ओर इशारा करता है।

इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी कॉलेज ऑफ़ फ़िज़िशियंस (एसीपी) की एक ऐतिहासिक नई गाइडलाइन ने मोटापे के औषधीय उपचार की दिशा बदल दी है। ‘एनल्स ऑफ़ इंटरनल मेडिसिन’ में प्रकाशित इस दस्तावेज़ के अनुसार, सेमाग्लूटाइड और टिरज़ेपाटाइड जैसी जीएलपी-1 एगोनिस्ट दवाएं—जिन्हें आमतौर पर ‘वज़न घटाने वाली कलम’ कहा जाता है—अब मोटापे के इलाज में पहली पसंद बन गई हैं। दो दशक पहले, महज़ पांच प्रतिशत वज़न घटाने को सफलता माना जाता था, लेकिन अब ये दवाएं दस में से नौ मरीज़ों में इस लक्ष्य को पार करा रही हैं। यह सिफ़ारिश केवल वज़न घटाने तक सीमित नहीं है; शोध बताते हैं कि ये दवाएं हृदय रोग जोखिम घटाने, गुर्दे और यकृत की रक्षा करने, सूजन कम करने और यहां तक कि नशे की लत छुड़ाने में भी मददगार साबित हो रही हैं। यह एक क्लासिक ‘ड्रग रीपोज़िशनिंग’ का मामला है, जहां एक ही अणु कई बीमारियों पर असर दिखाता है।

इस वैश्विक प्रगति के समानांतर, इंडोनेशिया में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली सक्रिय रूप से जांच का दायरा बढ़ा रही है। बांतुल ज़िले का स्वास्थ्य विभाग इस वर्ष 4.6 लाख नागरिकों को मुफ़्त स्वास्थ्य जांच कार्यक्रम (सीकेजी) के तहत लाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है, जिसमें अब तक लगभग एक लाख लोगों की स्क्रीनिंग हो चुकी है। स्थानीय अधिकारी सामुदायिक आयोजनों के ज़रिये इसकी पहुंच बढ़ा रहे हैं। लेकिन आईडीएआई ने एक अहम शर्त रखी है: स्क्रीनिंग को महज़ एक ‘गिमिक’ नहीं बनना चाहिए। संस्था ने हेपेटाइटिस सी की जांच को सराहते हुए स्पष्ट किया कि जब तक पॉज़िटिव पाए गए मरीज़ों को मुफ़्त या सस्ती दवा और नियमित फ़ॉलो-अप नहीं मिलता, तब तक कार्यक्रम का वास्तविक लाभ नहीं होगा। यह चेतावनी भारत जैसे देशों के लिए भी प्रासंगिक है, जहां सरकारी स्क्रीनिंग अभियान अक्सर इलाज की कड़ी से जुड़े बिना अधूरे रह जाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि नई दवाओं और विस्तारित स्क्रीनिंग के बीच एक व्यापक रणनीति की ज़रूरत है। बच्चों में जीवनशैली रोगों की रोकथाम के लिए स्कूल स्तर पर पोषण शिक्षा, खेलकूद को बढ़ावा और जंक फ़ूड पर नियमन ज़रूरी है। साथ ही, सेमाग्लूटाइड जैसी दवाओं की ऊंची कीमत और सीमित बीमा कवरेज विकासशील देशों में एक बड़ी बाधा है। भारत में इन दवाओं के जेनेरिक संस्करण आने की संभावना से पहुंच बढ़ सकती है, लेकिन बाल चिकित्सा में इनके सुरक्षित उपयोग के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है। आने वाले वर्षों में, यदि स्क्रीनिंग को इलाज से जोड़ा जाए और नई चिकित्सा को सुलभ बनाया जाए, तो मोटापे और उससे जुड़ी बीमारियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में एक निर्णायक मोड़ आ सकता है।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 4 भाषाएँ

62%
लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa sud-est asiaticaStampa europea continentale
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allarmepragmatismo

इंडोनेशियाई बाल रोग विशेषज्ञ आधुनिक जीवनशैली से बच्चों में मोटापे और मधुमेह जैसी गैर-संचारी बीमारियों की लहर की चेतावनी दे रहे हैं। सरकार का मुफ्त स्वास्थ्य जांच कार्यक्रम लाखों लोगों तक पहुँचने का लक्ष्य रखता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जाँच के बाद ठोस इलाज होना चाहिए, न कि केवल एक प्रतीकात्मक कदम।

Stampa europea continentale/ nordica
paternalismodistacco

स्वीडन में, विशेषज्ञ और खेल नेता युवा एथलीटों में खाने के विकारों की ओर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, जहाँ प्रदर्शन का दबाव मनोवैज्ञानिक परेशानी पैदा कर सकता है। वे चुप्पी तोड़ने और समस्या का समग्र रूप से समाधान करने का आग्रह करते हैं, केवल शारीरिक प्रदर्शन के बजाय पूरे व्यक्ति को देखते हुए।

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बच्चों में मोटापे और मधुमेह की लहर, नई दवाओं और स्क्रीनिंग से जगी उम्मीद

इंडोनेशिया में बच्चों के बीच जीवनशैली रोगों की चेतावनी के बीच वैश्विक स्तर पर सेमाग्लूटाइड जैसी दवाओं को मोटापे की पहली पंक्ति के इलाज का दर्जा मिला है।

दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर वैश्विक स्वास्थ्य मंचों तक, बच्चों और युवाओं में गैर-संचारी रोगों की चुपचाप बढ़ती लहर ने विशेषज्ञों को सचेत कर दिया है। इंडोनेशियाई बाल रोग विशेषज्ञ संघ (आईडीएआई) ने हाल ही में आगाह किया कि मोटापा, उच्च रक्तचाप और टाइप-2 मधुमेह जैसी ‘नई जीवनशैली बीमारियां’ अब किशोरों और बच्चों में भी तेज़ी से पांव पसार रही हैं। आईडीएआई प्रमुख डॉ. पिप्रिम बसाराह यानुआरसो के अनुसार, खान-पान की बदलती आदतें और शारीरिक गतिविधियों में आई भारी कमी इस बदलाव के मुख्य चालक हैं। यह चिंता सिर्फ इंडोनेशिया तक सीमित नहीं है; भारत में भी बच्चों में मोटापे और टाइप-2 डायबिटीज़ के मामले पिछले एक दशक में चिंताजनक रूप से बढ़े हैं, जो दक्षिण एशिया की बदलती जीवनशैली और पोषण संक्रमण की ओर इशारा करता है।

इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी कॉलेज ऑफ़ फ़िज़िशियंस (एसीपी) की एक ऐतिहासिक नई गाइडलाइन ने मोटापे के औषधीय उपचार की दिशा बदल दी है। ‘एनल्स ऑफ़ इंटरनल मेडिसिन’ में प्रकाशित इस दस्तावेज़ के अनुसार, सेमाग्लूटाइड और टिरज़ेपाटाइड जैसी जीएलपी-1 एगोनिस्ट दवाएं—जिन्हें आमतौर पर ‘वज़न घटाने वाली कलम’ कहा जाता है—अब मोटापे के इलाज में पहली पसंद बन गई हैं। दो दशक पहले, महज़ पांच प्रतिशत वज़न घटाने को सफलता माना जाता था, लेकिन अब ये दवाएं दस में से नौ मरीज़ों में इस लक्ष्य को पार करा रही हैं। यह सिफ़ारिश केवल वज़न घटाने तक सीमित नहीं है; शोध बताते हैं कि ये दवाएं हृदय रोग जोखिम घटाने, गुर्दे और यकृत की रक्षा करने, सूजन कम करने और यहां तक कि नशे की लत छुड़ाने में भी मददगार साबित हो रही हैं। यह एक क्लासिक ‘ड्रग रीपोज़िशनिंग’ का मामला है, जहां एक ही अणु कई बीमारियों पर असर दिखाता है।

इस वैश्विक प्रगति के समानांतर, इंडोनेशिया में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली सक्रिय रूप से जांच का दायरा बढ़ा रही है। बांतुल ज़िले का स्वास्थ्य विभाग इस वर्ष 4.6 लाख नागरिकों को मुफ़्त स्वास्थ्य जांच कार्यक्रम (सीकेजी) के तहत लाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है, जिसमें अब तक लगभग एक लाख लोगों की स्क्रीनिंग हो चुकी है। स्थानीय अधिकारी सामुदायिक आयोजनों के ज़रिये इसकी पहुंच बढ़ा रहे हैं। लेकिन आईडीएआई ने एक अहम शर्त रखी है: स्क्रीनिंग को महज़ एक ‘गिमिक’ नहीं बनना चाहिए। संस्था ने हेपेटाइटिस सी की जांच को सराहते हुए स्पष्ट किया कि जब तक पॉज़िटिव पाए गए मरीज़ों को मुफ़्त या सस्ती दवा और नियमित फ़ॉलो-अप नहीं मिलता, तब तक कार्यक्रम का वास्तविक लाभ नहीं होगा। यह चेतावनी भारत जैसे देशों के लिए भी प्रासंगिक है, जहां सरकारी स्क्रीनिंग अभियान अक्सर इलाज की कड़ी से जुड़े बिना अधूरे रह जाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि नई दवाओं और विस्तारित स्क्रीनिंग के बीच एक व्यापक रणनीति की ज़रूरत है। बच्चों में जीवनशैली रोगों की रोकथाम के लिए स्कूल स्तर पर पोषण शिक्षा, खेलकूद को बढ़ावा और जंक फ़ूड पर नियमन ज़रूरी है। साथ ही, सेमाग्लूटाइड जैसी दवाओं की ऊंची कीमत और सीमित बीमा कवरेज विकासशील देशों में एक बड़ी बाधा है। भारत में इन दवाओं के जेनेरिक संस्करण आने की संभावना से पहुंच बढ़ सकती है, लेकिन बाल चिकित्सा में इनके सुरक्षित उपयोग के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है। आने वाले वर्षों में, यदि स्क्रीनिंग को इलाज से जोड़ा जाए और नई चिकित्सा को सुलभ बनाया जाए, तो मोटापे और उससे जुड़ी बीमारियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में एक निर्णायक मोड़ आ सकता है।

स्रोतों में मतभेद

स्वास्थ्य और विज्ञान · 5 स्रोत · 4 भाषाएँ

62%उच्च

स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

समर्थक25%
न्यूनत्र25%
निंदक50%

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

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लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
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इंडोनेशियाई बाल रोग विशेषज्ञ आधुनिक जीवनशैली से बच्चों में मोटापे और मधुमेह जैसी गैर-संचारी बीमारियों की लहर की चेतावनी दे रहे हैं। सरकार का मुफ्त स्वास्थ्य जांच कार्यक्रम लाखों लोगों तक पहुँचने का लक्ष्य रखता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जाँच के बाद ठोस इलाज होना चाहिए, न कि केवल एक प्रतीकात्मक कदम।

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paternalismodistacco

स्वीडन में, विशेषज्ञ और खेल नेता युवा एथलीटों में खाने के विकारों की ओर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, जहाँ प्रदर्शन का दबाव मनोवैज्ञानिक परेशानी पैदा कर सकता है। वे चुप्पी तोड़ने और समस्या का समग्र रूप से समाधान करने का आग्रह करते हैं, केवल शारीरिक प्रदर्शन के बजाय पूरे व्यक्ति को देखते हुए।

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