
युद्धविराम से ईरानियों को राहत पर उत्सव नहीं: ‘99% लोग जीवित रहने की जंग में’, खाड़ी में आर्थिक सुधार की आस
अमेरिका-ईरान अंतरिम शांति समझौते ने बमबारी रोक दी, लेकिन ईरानी नागरिक बेहतर भविष्य की उम्मीद छोड़ चुके हैं; वहीं दुबई जैसे खाड़ी शहरों में नौकरी गंवाने वाले प्रवासियों को राहत मिली है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने जब अमेरिका के साथ अंतरिम युद्धविराम समझौते को ‘जीत’ करार दिया, तब तेहरान की सड़कों पर जश्न का कोई माहौल नहीं था। तीन महीने से अधिक चली अमेरिकी और इज़रायली हवाई बमबारी, बंदरगाहों की नाकेबंदी और वर्षों के आर्थिक प्रतिबंधों ने आम ईरानियों को इतना तोड़ दिया है कि वे ‘जीवित रहने की जद्दोजहद’ में लगे हैं। रॉयटर्स और अन्य मीडिया से बात करने वाले अधिकांश लोगों ने कहा कि उन्हें निकट भविष्य में हालात सुधरने की कोई उम्मीद नहीं। हर खर्च पर कड़ी निगरानी जारी है, और सरकार के समर्थक-विरोधी दोनों ही मानते हैं कि यह शांति फिलहाल कागज़ी है।
इसके विपरीत, खाड़ी क्षेत्र में इस समझौते ने आर्थिक सुधार की उम्मीद जगा दी है। दुबई के आतिथ्य उद्योग में काम करने वाले सनीश जैसे प्रवासी कर्मचारियों का वेतन युद्ध के दौरान घटाकर मात्र 800 दिरहम प्रति माह कर दिया गया था, और सैकड़ों लोगों की नौकरियां चली गईं। पर्यटन पर निर्भर अमीराती अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगा था। अब युद्धविराम से वहां राहत की लहर है—लोगों को उम्मीद है कि कारोबार पटरी पर लौटेगा और कटौतियां वापस ली जाएंगी। यह क्षेत्रीय विभाजन दर्शाता है कि युद्ध का आर्थिक दर्द सीमाओं से परे फैला, लेकिन शांति का लाभ भी असमान रूप से बंट रहा है।
ईरान के भीतर, बमबारी से मिली राहत वास्तविक है—37 वर्षीय सोमायेह जैसे नागरिक अब बिना विस्फोटों की आवाज़ के सो सकने की बात कहते हैं—लेकिन यह राहत जल्द ही अनिश्चितता में बदल जाती है। कई लोगों को डर है कि युद्धविराम टिकेगा नहीं, अर्थव्यवस्था पुनर्जीवित नहीं होगी, और सरकार इस मौके का इस्तेमाल विरोधियों पर और कड़ा शिकंजा कसने में करेगी। इस्फ़हान की यास्मीन जैसी युवा आवाज़ें हफ़पोस्ट इटालिया को बताती हैं कि ‘यह समझौता शासन को बचाने वाला है, जनता को नहीं।’ उनका मानना है कि पश्चिमी देशों के लिए ईरान में लोकतंत्र कभी लक्ष्य नहीं रहा, इसलिए जनता को अपनी लड़ाई अकेले लड़नी होगी। कुछ विश्लेषक आर्थिक गुस्से को नए विरोध प्रदर्शनों की वजह मान रहे हैं, जबकि अन्य को जनवरी 2025 जैसे खूनी दमन की पुनरावृत्ति की आशंका है।
यह अंतरिम समझौता पश्चिम एशिया में तनाव कम करने का एक सीमित प्रयास है, लेकिन इसकी नाज़ुकता दक्षिण एशिया के लिए भी मायने रखती है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए खाड़ी क्षेत्र और ईरान दोनों पर निर्भर हैं, स्थिरता चाहते हैं। युद्ध के दौरान तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और समुद्री मार्गों की सुरक्षा चिंताएं बढ़ी थीं। शांति से अल्पकालिक राहत मिली है, लेकिन ईरानी समाज की गहरी निराशा और शासन की दमनकारी प्रवृत्ति भविष्य में विस्फोटक स्थिति पैदा कर सकती है। फिलहाल, ईरान की जनता ‘99% जीवित रहने की मोड’ में है, और जश्न का कोई कारण नहीं दिखता।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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शांति समझौता यूएई के उन निवासियों को राहत और सतर्क उम्मीद देता है जिन्हें युद्ध के दौरान वेतन कटौती और नौकरी छूटने का सामना करना पड़ा। शत्रुता की समाप्ति को आर्थिक सुधार के अवसर के रूप में देखा जा रहा है, खासकर पर्यटन और आतिथ्य क्षेत्र में। जबकि ईरान में स्थिति कठिन बनी हुई है, खाड़ी का दृष्टिकोण क्षेत्रीय स्थिरता और आजीविका के तत्काल लाभों पर केंद्रित है।
ईरानी बमबारी रुकने का स्वागत करते हैं लेकिन इस बात को लेकर गहराई से संशय में हैं कि युद्धविराम से उनका जीवन बेहतर होगा। युद्ध ने वर्षों के प्रतिबंधों और दमन को और बढ़ा दिया है, और कई लोगों को डर है कि शासन और मजबूत होकर उभरेगा। राहत इस अनिश्चितता से कम हो जाती है कि क्या अर्थव्यवस्था उबर पाएगी और क्या सरकार इस समझौते का इस्तेमाल घरेलू नियंत्रण कसने के लिए करेगी।
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