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मीडिया और मनोरंजनशुक्रवार, 3 जुलाई 2026

लालेज़ार की कतार से 'रगबार' तक: मनुचेहर फ़रीद का वो सफ़र जो पर्दे से परे जीवन बन गया

ईरानी नव लहर सिनेमा के एक सशक्त चेहरे ने मेलबर्न में अंतिम सांस ली, अपने पीछे छोड़ गए वो किरदार जो ताउम्र उनकी पहचान बने रहे।

तेहरान की लालेज़ार सड़क पर एक बच्चा अपने पिता के साथ खड़ा है। सामने थिएटर के बाहर लंबी कतार देख पिता टिकट खरीद लेते हैं, और पूरा परिवार अंदर जाकर कोई नाटक देखता है। यह बच्चा बाद में अपने मोहल्ले में बच्चों के साथ नाटक करने लगता है, खोर्रमशहर में थिएटर ग्रुप बनाता है, और एक दिन ईरानी सिनेमा के सबसे यादगार चेहरों में शुमार होता है। यह बच्चा था मनुचेहर फ़रीद, जो 89 वर्ष की आयु में ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में हमेशा के लिए आँखें मूंद गया।

फ़रीद का जन्म 1316 (1937) में तेहरान में हुआ था। उनकी कला-यात्रा की शुरुआत रंगमंच से हुई, जहाँ हामिद समंदरियान जैसे गुरु ने उनकी अभिव्यक्ति को एक नई दिशा दी। समंदरियान ने ही उन्हें बताया था कि उनकी आवाज़ में एक 'धुन' है और उस दौर की कृत्रिम अदाकारी की आदत से लड़ना होगा। यह सीख फ़रीद के भीतर गहरे बैठ गई। बाद में जब वे बहराम बेज़ाई की फ़िल्मों में काम करने लगे, तो उन्होंने कहा कि वे निर्देशक के लहज़े की नकल नहीं करते, बल्कि अपनी स्वाभाविक अभिव्यक्ति का ध्यान रखते हैं। उनकी पहली फ़िल्म इब्राहीम गुलिस्तान की 'ख़िश्त ओ आईना' (ईंट और आईना) थी, जिसके लिए गुलिस्तान और फ़ोरूग़ फ़र्रूख़ज़ाद ने उनका एक नाटक देखने के बाद उन्हें, जमशीद मशायेख़ी और मोहम्मद अली केशावरज़ को एक साथ चुन लिया था।

लेकिन फ़रीद की पहचान सबसे ज़्यादा 'रगबार' (मूसलाधार बारिश) के 'आग़ा रहीम' से बनी। बहराम बेज़ाई की इस फ़िल्म में उन्होंने एक कसाई का किरदार निभाया, जो पहली नज़र में नकारात्मक लग सकता था, मगर फ़रीद ख़ुद मानते थे कि फ़िल्म के दौरान यह पात्र कहानी के अध्यापक के साथ एक मानवीय सहानुभूति और आत्मीयता तक पहुँचता है। इसके बाद 'ग़रीबा ओ मेह' (अजनबी और कोहरा), 'कलाग़' (कौआ) और 'चेरीके तारा' (तारा का गीत) जैसी फ़िल्मों में बेज़ाई के साथ उनका सहयोग जारी रहा। 'चेरीके तारा' में 'मर्दे तारीख़ी' (ऐतिहासिक पुरुष) का उनका किरदार एक मिथकीय और जटिल छवि लेकर आया, जो समुद्र से निकलकर तारा पर मोहित हो जाता है। ईरानी नव लहर के दर्शकों के लिए यह भूमिका एक अमिट छाप छोड़ गई।

1979 की ईरानी क्रांति के बाद फ़रीद का जीवन एक अलग मोड़ पर पहुँच गया। बहाई होने के कारण उनके लिए ईरान में कलात्मक गतिविधियाँ जारी रखना असंभव हो गया। 'चेरीके तारा' और 'मीरासे मन जुनून' (मेरी विरासत पागलपन) की शूटिंग ख़त्म करने के बाद, 1358 (1980) में वे पहले अमेरिका और फिर ऑस्ट्रेलिया चले गए। वहाँ उन्होंने फ़िल्मी दुनिया से दूर कपड़ा उद्योग और उत्पादन जैसे काम किए। सालों बाद एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि वे प्रवास के जीवन को भी एक लंबी भूमिका की तरह देखते हैं, जो इस बार न रंगमंच पर है, न पर्दे पर, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बह रही है।

अपने अंतिम वर्षों में फ़रीद ने एक दर्द भरा स्वर भी छोड़ा। उन्होंने कहा, "तुम नहीं जानते इन लोगों ने मेरे साथ क्या किया... मेरा दिल तोड़ दिया।" यह आवाज़ उस अदाकार की थी जिसने 'रगबार' के आग़ा रहीम से लेकर 'चेरीके तारा' के ऐतिहासिक पुरुष तक, ईरानी सिनेमा के कुछ सबसे स्थायी चरित्रों को जीवन दिया। बहराम बेज़ाई के साथ एक अधूरी फ़िल्म 'अय्यारे तन्हा' का सपना भी उनके सीने में ही दफ़न रहा, जिसके लिए उन्होंने अपना शरीर तैयार किया था, मगर बाहरी दख़ल के कारण वह कभी बन न सकी। मेलबर्न में ली गई उनकी अंतिम सांस के साथ, ईरानी सिनेमा का एक ऐसा अध्याय बंद हुआ जो पर्दे की चमक से कहीं आगे, एक विस्थापित जीवन की गहरी छायाओं तक फैला हुआ था।

विचलन — कौन इसे कैसे बताता है
अक्ष: Eredità culturale vs. critica politica
45%मध्यम
3 ब्लॉक · स्थिति −0.60 से +0.50 तक
Critica atlantica e distacco europeoCelebrazione iraniana e ironia altre
IRNATLEUR
प्रेस ब्लॉकों के बीच विचलन
ईरानी और संबद्ध प्रेस+0.50aligned
अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस−0.60critical
महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस0.00neutral
ईरानी और संबद्ध प्रेस+0.50
स्वर

We Iranians honor Manuchehr Farid as a pillar of our cultural identity, a man of the sea who gave voice to the new wave.

तंत्रpersonificazione dello stato

Epic and sacred language is used, associating the artist with national and religious values, turning a cultural event into an act of resistance.

चूक

Criticism of the regime and personal controversies that could tarnish Farid's heroic image are omitted.

विजयपीड़ितभाव
अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस−0.60
स्वर

We denounce the regime's instrumental use of Farid to divert attention from its atrocities.

तंत्रescalation simmetrica

A parallel is drawn between the celebration of Farid and the regime's violence, creating a moral opposition that invalidates any positive aspect.

चूक

Farid's genuine artistic contributions and the historical context of the Iranian new wave are omitted.

चेतावनीआक्रोश
महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस0.00
स्वर

We observe the Farid case as an example of how cultural memory is constructed in authoritarian contexts.

तंत्रuniversalizzazione

An academic tone is adopted, generalizing the case to a broader category of 'memory construction', reducing political specificity.

चूक

Immediate human rights implications and criticism of the regime are omitted to maintain neutrality.

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शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

लालेज़ार की कतार से 'रगबार' तक: मनुचेहर फ़रीद का वो सफ़र जो पर्दे से परे जीवन बन गया

ईरानी नव लहर सिनेमा के एक सशक्त चेहरे ने मेलबर्न में अंतिम सांस ली, अपने पीछे छोड़ गए वो किरदार जो ताउम्र उनकी पहचान बने रहे।

तेहरान की लालेज़ार सड़क पर एक बच्चा अपने पिता के साथ खड़ा है। सामने थिएटर के बाहर लंबी कतार देख पिता टिकट खरीद लेते हैं, और पूरा परिवार अंदर जाकर कोई नाटक देखता है। यह बच्चा बाद में अपने मोहल्ले में बच्चों के साथ नाटक करने लगता है, खोर्रमशहर में थिएटर ग्रुप बनाता है, और एक दिन ईरानी सिनेमा के सबसे यादगार चेहरों में शुमार होता है। यह बच्चा था मनुचेहर फ़रीद, जो 89 वर्ष की आयु में ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में हमेशा के लिए आँखें मूंद गया।

फ़रीद का जन्म 1316 (1937) में तेहरान में हुआ था। उनकी कला-यात्रा की शुरुआत रंगमंच से हुई, जहाँ हामिद समंदरियान जैसे गुरु ने उनकी अभिव्यक्ति को एक नई दिशा दी। समंदरियान ने ही उन्हें बताया था कि उनकी आवाज़ में एक 'धुन' है और उस दौर की कृत्रिम अदाकारी की आदत से लड़ना होगा। यह सीख फ़रीद के भीतर गहरे बैठ गई। बाद में जब वे बहराम बेज़ाई की फ़िल्मों में काम करने लगे, तो उन्होंने कहा कि वे निर्देशक के लहज़े की नकल नहीं करते, बल्कि अपनी स्वाभाविक अभिव्यक्ति का ध्यान रखते हैं। उनकी पहली फ़िल्म इब्राहीम गुलिस्तान की 'ख़िश्त ओ आईना' (ईंट और आईना) थी, जिसके लिए गुलिस्तान और फ़ोरूग़ फ़र्रूख़ज़ाद ने उनका एक नाटक देखने के बाद उन्हें, जमशीद मशायेख़ी और मोहम्मद अली केशावरज़ को एक साथ चुन लिया था।

लेकिन फ़रीद की पहचान सबसे ज़्यादा 'रगबार' (मूसलाधार बारिश) के 'आग़ा रहीम' से बनी। बहराम बेज़ाई की इस फ़िल्म में उन्होंने एक कसाई का किरदार निभाया, जो पहली नज़र में नकारात्मक लग सकता था, मगर फ़रीद ख़ुद मानते थे कि फ़िल्म के दौरान यह पात्र कहानी के अध्यापक के साथ एक मानवीय सहानुभूति और आत्मीयता तक पहुँचता है। इसके बाद 'ग़रीबा ओ मेह' (अजनबी और कोहरा), 'कलाग़' (कौआ) और 'चेरीके तारा' (तारा का गीत) जैसी फ़िल्मों में बेज़ाई के साथ उनका सहयोग जारी रहा। 'चेरीके तारा' में 'मर्दे तारीख़ी' (ऐतिहासिक पुरुष) का उनका किरदार एक मिथकीय और जटिल छवि लेकर आया, जो समुद्र से निकलकर तारा पर मोहित हो जाता है। ईरानी नव लहर के दर्शकों के लिए यह भूमिका एक अमिट छाप छोड़ गई।

1979 की ईरानी क्रांति के बाद फ़रीद का जीवन एक अलग मोड़ पर पहुँच गया। बहाई होने के कारण उनके लिए ईरान में कलात्मक गतिविधियाँ जारी रखना असंभव हो गया। 'चेरीके तारा' और 'मीरासे मन जुनून' (मेरी विरासत पागलपन) की शूटिंग ख़त्म करने के बाद, 1358 (1980) में वे पहले अमेरिका और फिर ऑस्ट्रेलिया चले गए। वहाँ उन्होंने फ़िल्मी दुनिया से दूर कपड़ा उद्योग और उत्पादन जैसे काम किए। सालों बाद एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि वे प्रवास के जीवन को भी एक लंबी भूमिका की तरह देखते हैं, जो इस बार न रंगमंच पर है, न पर्दे पर, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बह रही है।

अपने अंतिम वर्षों में फ़रीद ने एक दर्द भरा स्वर भी छोड़ा। उन्होंने कहा, "तुम नहीं जानते इन लोगों ने मेरे साथ क्या किया... मेरा दिल तोड़ दिया।" यह आवाज़ उस अदाकार की थी जिसने 'रगबार' के आग़ा रहीम से लेकर 'चेरीके तारा' के ऐतिहासिक पुरुष तक, ईरानी सिनेमा के कुछ सबसे स्थायी चरित्रों को जीवन दिया। बहराम बेज़ाई के साथ एक अधूरी फ़िल्म 'अय्यारे तन्हा' का सपना भी उनके सीने में ही दफ़न रहा, जिसके लिए उन्होंने अपना शरीर तैयार किया था, मगर बाहरी दख़ल के कारण वह कभी बन न सकी। मेलबर्न में ली गई उनकी अंतिम सांस के साथ, ईरानी सिनेमा का एक ऐसा अध्याय बंद हुआ जो पर्दे की चमक से कहीं आगे, एक विस्थापित जीवन की गहरी छायाओं तक फैला हुआ था।

विचलन — कौन इसे कैसे बताता है
अक्ष: Eredità culturale vs. critica politica
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महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस0.00neutral
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We Iranians honor Manuchehr Farid as a pillar of our cultural identity, a man of the sea who gave voice to the new wave.

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Epic and sacred language is used, associating the artist with national and religious values, turning a cultural event into an act of resistance.

चूक

Criticism of the regime and personal controversies that could tarnish Farid's heroic image are omitted.

विजयपीड़ितभाव
अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस−0.60
स्वर

We denounce the regime's instrumental use of Farid to divert attention from its atrocities.

तंत्रescalation simmetrica

A parallel is drawn between the celebration of Farid and the regime's violence, creating a moral opposition that invalidates any positive aspect.

चूक

Farid's genuine artistic contributions and the historical context of the Iranian new wave are omitted.

चेतावनीआक्रोश
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