
अमेरिका-ईरान शांति रूपरेखा से डॉलर दस दिन के निचले स्तर पर, तेल कीमतों में भारी गिरावट
प्रारंभिक समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने की उम्मीद से वैश्विक बाजारों में जोखिम लेने की भूख बढ़ी और कच्चे तेल के दाम लुढ़क गए।
सोमवार को वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए सबसे बड़ी खबर अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की प्रारंभिक रूपरेखा रही, जिसने डॉलर को प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले दस दिन के निचले स्तर पर धकेल दिया और कच्चे तेल की कीमतों में पांच प्रतिशत तक की गिरावट ला दी। निवेशकों ने तुरंत सुरक्षित ठिकानों से पैसा निकालकर जोखिम भरी परिसंपत्तियों की ओर रुख किया, जिससे एशियाई शेयर बाजारों में तेजी दर्ज की गई और ब्राजील जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं मजबूत हुईं।
अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों ने रविवार को बताया कि वे एक ऐसे समझौता-ज्ञापन पर सहमत हो गए हैं जो युद्ध को समाप्त करेगा, ईरान पर अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाएगा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धमनी कहे जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल देगा। इस जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा कच्चा तेल गुजरता है, और मार्च में युद्ध शुरू होने के बाद से इसकी बंदी ने तेल बाजारों को झकझोर रखा था। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, "दुनिया के जहाजों, इंजन चालू करो। तेल को बहने दो!", जिससे बाजार की धारणा को तत्काल बल मिला। औपचारिक समझौते पर शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर होने की उम्मीद है, हालांकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत अभी बाकी है।
भौगोलिक दृष्टि से देखें तो इस घटनाक्रम का असर हर कोने में महसूस किया गया। हांगकांग और अन्य एशियाई बाजारों में निवेशकों ने राहत की सांस ली, जबकि ब्राजील में डॉलर के मुकाबले रियाल 0.35 प्रतिशत मजबूत होकर 5.04 के स्तर पर आ गया। अरब जगत की निगाहें होर्मुज की खुलती धमनी पर टिकी हैं, क्योंकि खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी स्थिर समुद्री मार्गों पर निर्भर हैं। यूरोपीय बाजारों के लिए स्विट्जरलैंड में होने वाला हस्ताक्षर समारोह कूटनीतिक विश्वास बहाली का प्रतीक बन सकता है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि जोखिम लेने की यह भूख तकनीकी अनिश्चितताओं पर भारी पड़ रही है।
हालांकि, सतर्कता अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। समझौते की बारीकियां सार्वजनिक नहीं की गई हैं, और ईरान के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य अगले दौर की वार्ता पर टिका है। ब्रेंट क्रूड का भाव 82 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया, जो युद्ध शुरू होने के बाद का सबसे निचला स्तर है, लेकिन अगर वार्ता लड़खड़ाई तो यह राहत क्षणिक साबित हो सकती है। बाजार यह भी आंक रहे हैं कि अमेरिकी नाकेबंदी हटने के बाद ईरानी तेल की वैश्विक आपूर्ति कितनी तेजी से बढ़ेगी और क्या लेबनान जैसे अन्य मोर्चों पर भी स्थायी संघर्षविराम लागू होगा।
दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए यह घटनाक्रम दोहरा महत्व रखता है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है, और होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए आने वाली आपूर्ति में किसी भी रुकावट का सीधा असर चालू खाता घाटे और महंगाई पर पड़ता है। तेल की कीमतों में गिरावट से आयात बिल घटेगा और पेट्रोल-डीजल के दाम नरम पड़ सकते हैं, जो आम उपभोक्ता और उद्योग दोनों के लिए राहत लेकर आएगा। अगर शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर के बाद परमाणु मुद्दे पर भी प्रगति होती है, तो यह पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की दिशा में एक बड़ा कदम होगा, जिससे ऊर्जा बाजारों में दीर्घकालिक स्थिरता लौट सकती है और भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को नीतिगत निश्चितता का लाभ मिलेगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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वाशिंगटन और तेहरान के बीच शांति रूपरेखा पर सहमति के बाद डॉलर दस दिन के निचले स्तर पर आ गया, जिससे तेल की कीमतें गिर गईं और जोखिम भरी संपत्तियों की मांग बढ़ गई। समझौता ज्ञापन पर शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर होने हैं, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम जैसे अनसुलझे मुद्दों को लेकर सतर्कता बनी हुई है।
अमेरिका और ईरान के बीच प्रारंभिक शांति समझौते की घोषणा के बाद डॉलर दस दिन के निचले स्तर पर कमजोर हुआ, जिससे वित्तीय बाजारों को राहत मिली। तेल की कीमतें गिर गईं और निवेशक जोखिम भरी संपत्तियों की ओर बढ़े; औपचारिक हस्ताक्षर शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में होने की उम्मीद है, हालांकि सटीक सामग्री अज्ञात बनी हुई है।
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