
अमेरिका-सऊदी परमाणु समझौते पर इज़राइल की आपत्ति, ट्रंप ने अब्राहम समझौते से जोड़ी शर्त
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच असैन्य परमाणु सहयोग समझौते की घोषणा के बाद इज़राइल में क्षेत्रीय शस्त्र दौड़ की आशंका गहरा गई है, जबकि राष्ट्रपति ट्रंप ने इसे इज़राइल के साथ संबंध सामान्य करने की शर्त से जोड़ दिया है।
अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने बुधवार को सऊदी अरब के साथ एक ऐसे परमाणु सहयोग समझौते की घोषणा की जिसके तहत रियाद को अमेरिकी तकनीक से रिएक्टर बनाने और यूरेनियम संवर्धन की अनुमति दी जाएगी। इस समझौते का उद्देश्य सऊदी अरब में एक असैन्य परमाणु कार्यक्रम विकसित करना बताया गया है, लेकिन इसे अभी अमेरिकी कांग्रेस की मंज़ूरी की आवश्यकता है। घोषणा के तुरंत बाद इज़राइली राजनीतिक हलकों से तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। पूर्व प्रधानमंत्री नफ़्ताली बेनेट ने इसे “इज़राइल के सिर के ऊपर से होने वाला एक गंभीर रणनीतिक विफलता” बताया जो देश की सुरक्षा को ख़तरे में डालता है, और कहा कि सऊदी धरती पर परमाणु संवर्धन क्षेत्रीय परमाणु दौड़ और नियंत्रण की ख़तरनाक हानि को जन्म दे सकता है।
इज़राइल के पूर्व रक्षा मंत्री अविगडोर लिबरमैन ने चेतावनी दी कि सऊदी अरब का असैन्य परमाणु कार्यक्रम अंततः परमाणु हथियारों में तब्दील होगा और पूरे मध्य पूर्व में एक अनियंत्रित हथियार दौड़ शुरू कर देगा। पूर्व रक्षा प्रमुख बेनी गैंट्ज़ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कोई भी सुरक्षा अधिकारी यह नहीं कहेगा कि एक उदारवादी क्षेत्रीय गठबंधन के निर्माण के साथ जोड़े बिना सऊदी अरब में असैन्य परमाणु क्षमता स्थापित करना इज़राइल की सुरक्षा के लिए अच्छा क़दम है। इन बयानों में एक साझा चिंता यह दिखी कि यह समझौता इज़राइल और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से प्रतीक्षित संबंध सामान्यीकरण की प्रक्रिया से अलग करके किया गया है, जो पूर्व राष्ट्रपति बाइडन की योजना का हिस्सा था।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में इस समझौते को लेकर नई शर्तें सार्वजनिक कीं। उन्होंने कहा कि यह समझौता पूरी तरह से सऊदी अरब के ‘अब्राहम समझौते’ में शामिल होने पर निर्भर है, जिसके तहत खाड़ी देश इज़राइल के साथ संबंध सामान्य करते हैं। ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि इसमें किसी प्रकार का संवर्धन शामिल नहीं होगा और यह केवल ग़ैर-सैन्य उपयोग के लिए है, ठीक वैसे ही जैसे ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के पास पहले से मौजूद है। यह बयान इज़राइल की चिंताओं को आंशिक रूप से संबोधित करता प्रतीत होता है, लेकिन इसने समझौते के भविष्य को सीधे तौर पर कूटनीतिक सामान्यीकरण की प्रक्रिया से जोड़ दिया है, जो अब तक अटकी हुई है।
यह परमाणु सहयोग समझौता वर्षों से विचाराधीन था—पहले ट्रंप के पहले कार्यकाल में और फिर बाइडन प्रशासन के दौरान—लेकिन अप्रसार समूहों की चेतावनियों के कारण अब तक अंतिम रूप नहीं ले पाया था। इन समूहों का कहना है कि इस तरह का समझौता सऊदी अरब को परमाणु हथियार विकसित करने का रास्ता दे सकता है। इज़राइल, जिसे व्यापक रूप से इस क्षेत्र का एकमात्र परमाणु शस्त्र भंडार वाला देश माना जाता है, के लिए यह मामला रणनीतिक श्रेष्ठता और क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ा है। इज़राइली नेता अब अमेरिकी कांग्रेस में इस समझौते का विरोध करने की तैयारी कर रहे हैं, जबकि अक्टूबर में होने वाले इज़राइली चुनाव भी इस मुद्दे को घरेलू राजनीति का हिस्सा बना सकते हैं।
फ़िलहाल यह समझौता कांग्रेस की अधिसूचना प्रक्रिया में है और इस पर मंज़ूरी की कोई निश्चित तारीख़ तय नहीं है। ट्रंप प्रशासन ने इसे ऐतिहासिक बताते हुए कहा है कि अमेरिकी कंपनियाँ सऊदी अरब को परमाणु प्रौद्योगिकी प्रदान करेंगी और यह उच्चतम सुरक्षा व अप्रसार मानकों का पालन करेगा। हालाँकि, इज़राइल की ओर से लॉबिंग और अब्राहम समझौते की शर्त के चलते इस मामले के जल्द सुलझने के बजाय एक कूटनीतिक सौदेबाज़ी में बदलने की संभावना है।
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | 0.00 | neutral |
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| दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस | 0.00 | neutral |
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | 0.00 | neutral |
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | 0.00 | neutral |
The US-Saudi uranium enrichment deal threatens Middle East stability and triggers fears of an arms race.
By quoting former PM Bennett as an authority, the Israeli concern is legitimized without scrutiny.
The Abraham Accords context and Saudi position are omitted, which could mitigate the threat.
Israeli panic is justified: the US-Saudi nuclear deal is an immediate danger to the region.
Using the term 'panic' and emphasizing urgency creates a sense of imminent crisis.
The Saudi perspective and the fact that the deal still needs approval are missing.
The US-Saudi nuclear deal fuels Israeli fear of an arms race, a concrete risk for the Middle East.
Repeating the same Bennett quotes without independent analysis reinforces the Israeli narrative.
The link to the Abraham Accords and possible non-proliferation guarantees are not mentioned.
The US-Saudi uranium enrichment deal threatens West Asian security, with Israel on alert.
Using 'West Asia' instead of 'Middle East' shifts the geopolitical focus, aligning with Indian terminology.
Trump's role and the Abraham Accords condition are omitted, which could alter the dynamic.
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