
आदतों से लेकर दीर्घायु तक: मनोविज्ञान और जीन के नए शोध क्या बताते हैं?
त्वचा खुजलाने की बेसुध आदत से लेकर मसालेदार भोजन के शौक और लंबी उम्र के आनुवंशिक रहस्यों तक, हाल के अध्ययन मानव व्यवहार और स्वास्थ्य की जटिल परतें खोल रहे हैं।
रोज़मर्रा की कई आदतें जिन्हें हम इच्छाशक्ति की कमी मान लेते हैं, दरअसल मस्तिष्क की गहरी संरचनाओं में बंधी होती हैं। भारत के आर्टेमिस अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. राहुल चंढोक बताते हैं कि बातचीत के दौरान नाखून या त्वचा कुतरना तनाव और चिंता से निपटने का एक स्वचालित मुकाबला तंत्र है, जो ध्यान भटकने पर बिना जागरूकता के सक्रिय हो जाता है। इसी तरह, बात करते समय नज़रें चुराना केवल शर्म नहीं; मनोवैज्ञानिक माइकल आर्गाइल और एडम केंडन के दशकों के शोध इसे सूचना प्रसंस्करण, भावनात्मक तीव्रता को नियंत्रित करने और बातचीत का प्रवाह संभालने की एक बहुकार्यात्मक रणनीति के रूप में देखते हैं।
खान-पान की प्राथमिकताओं में भी जैविकी की भूमिका उतनी ही निर्णायक है। अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी की एश्ली गियरहार्ट ने येल खाद्य लत पैमाने के आधार पर दिखाया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन की लत नशीले पदार्थों जैसी न्यूरोबायोलॉजिकल पकड़ रखती है—करीब 14 प्रतिशत वयस्क इसके नैदानिक मानदंड पूरे करते हैं। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया की क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 1.6 लाख से अधिक लोगों के जीनोम का विश्लेषण कर 325 स्वाद-गंध जीनों और 140 खाद्य पदार्थों की पसंद के बीच संबंध स्थापित किया है; मसलन, प्याज का स्वाद पसंद करने वालों में उच्च रक्तचाप और टाइप-2 मधुमेह का जोखिम कम पाया गया। मसालेदार भोजन के शौकीनों में ‘सेंसेशन-सीकिंग’ व्यक्तित्व प्रवृत्ति अधिक होती है, जहाँ कैप्सेसिन से उत्पन्न हल्का दर्द एंडोर्फिन रिलीज़ कर एक सुरक्षित तीव्रता का अनुभव देता है।
दीर्घायु के मोर्चे पर दो विपरीत धाराएँ सामने आई हैं। नीदरलैंड्स के लाइडेन यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर ने 212 परिवार समूहों के जीनोम अध्ययन में CGAS जीन का एक दुर्लभ प्रकार खोजा है, जो दीर्घकालिक सूजन को घटाकर स्वस्थ जीवनकाल (हेल्थस्पैन) बढ़ा सकता है; इस प्रकार के वाहकों में हृदय-चयापचय रोग औसतन 13 वर्ष बाद शुरू होते हैं। अब इसकी पुष्टि के लिए किलिफिश नामक अल्पायु कशेरुकी पर इन-विवो परीक्षण शुरू हो रहे हैं। दूसरी तरफ, शिकागो विश्वविद्यालय के ‘सुपरएजर’ अध्ययन में 80 वर्ष से ऊपर के ऐसे लोगों की पहचान हुई है जिनकी स्मृति 50-60 वर्ष के बराबर होती है; उनके मस्तिष्क का एंटीरियर सिंगुलेट क्षेत्र सामान्य से चार-पाँच गुना अधिक न्यूरॉन रखता है और टाऊ प्रोटीन का जमाव कम होता है, बावजूद इसके कि कुछ मस्तिष्कों में अल्ज़ाइमर के जीवाणु मौजूद रहते हैं।
इन उम्मीदों पर एक सख्त चेतावनी ऑक्सफ़र्ड जनसंख्या विज्ञान संस्थान के सॉल न्यूमैन की ओर से आती है। उन्होंने यूरोपीय मानव आनुवंशिकी सोसायटी के सम्मेलन में बताया कि 110 वर्ष से अधिक आयु के अधिकांश दावे कागज़ी त्रुटियों या पेंशन धोखाधड़ी पर टिके हैं; यूनान में 72 प्रतिशत शतायु रिकॉर्ड ऐसे ही पाए गए। एपिजेनेटिक घड़ियाँ भी इन्हीं गलत दस्तावेज़ों पर अंशांकित हैं, इसलिए जब तक रेडियोकार्बन या दंत अमीनो अम्ल विश्लेषण जैसी भौतिक विधियों से पुष्टि न हो, ‘असाधारण दीर्घायु’ के दावों पर संदेह ज़रूरी है। अगला ठोस कदम किलिफिश परीक्षणों के नतीजे और बड़े पैमाने पर आयु सत्यापन के लिए भौतिक मानकों को अपनाना होगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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CGAS जीन का एक दुर्लभ प्रकार स्वस्थ दीर्घायु से जुड़ा पाया गया है, जो पुरानी बीमारियों को टालता है और उम्र बढ़ने से जुड़ी सूजन को कम करता है। कई पीढ़ियों तक दीर्घायु सदस्यों वाले परिवारों पर किए गए अध्ययन से संकेत मिलता है कि विस्तारित स्वास्थ्य अवधि का आनुवंशिक आधार हो सकता है।
अत्यधिक दीर्घायु के दावे, जैसे कि सुपरसेंटेनेरियन के, त्रुटिपूर्ण आंकड़ों और अविश्वसनीय दस्तावेजों पर आधारित हो सकते हैं। मानव जीवनकाल की जैविक सीमा पर बहस जारी है, जबकि ध्यान स्रोतों की पुष्टि और स्वस्थ उम्र बढ़ने के आनुवंशिक कारकों को समझने पर केंद्रित हो रहा है।
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