
अमेरिका के 250वें स्थापना दिवस पर ट्रंप का आक्रामक भाषण: विरोधियों को ‘कम्युनिस्ट’ बताया, सैन्य कार्रवाइयों का गुणगान
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अमेरिका को मानव इतिहास की ‘सर्वोच्च उपलब्धि’ करार देते हुए आंतरिक राजनीतिक विभाजन को और गहरा किया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने देश के 250वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर वाशिंगटन के नेशनल मॉल में दिए गए भाषण में अमेरिकी गणराज्य को ‘मानव इतिहास की सर्वोच्च उपलब्धि’ बताया, साथ ही अपने राजनीतिक विरोधियों पर ‘कम्युनिस्ट’ होने का आरोप लगाते हुए उन्हें ‘कैंसर’ की संज्ञा दी। व्हाइट हाउस के अनुसार, यह भाषण अमेरिकी गौरव को रेखांकित करने के लिए था, लेकिन इसमें आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले वामपंथी डेमोक्रेटिक नेताओं को निशाना बनाया गया। ट्रंप ने कोरियाई और वियतनाम युद्धों को साम्यवाद के खिलाफ लड़ाई का उदाहरण बताते हुए कहा कि यह खतरा अब अमेरिका के भीतर ही सिर उठा रहा है।
अमेरिकी राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ट्रंप का यह रुख हाल के प्राइमरी चुनावों में वामपंथी उम्मीदवारों की जीत के बाद अपने समर्थक आधार को गोलबंद रखने की रणनीति का हिस्सा है। भाषण में ईरान और वेनेजुएला के खिलाफ सैन्य कार्रवाइयों का जिक्र करते हुए ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका ने तेहरान की सेना को ‘तबाह’ कर दिया है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस तरह के बयानों से खाड़ी क्षेत्र और लैटिन अमेरिका में कूटनीतिक तनाव बढ़ सकता है, यद्यपि तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
कार्यक्रम के दौरान भीषण गर्मी और तूफान के कारण हजारों लोगों को अस्थायी रूप से मैदान खाली करना पड़ा, जिससे अव्यवस्था फैली और कई स्थानों पर ‘ट्रंप-ट्रंप’ के नारे लगे। वहीं, कैपिटल हिल के पास नकाबपोश प्रदर्शनकारियों—जिनमें कुछ श्वेत वर्चस्ववादी संगठन पैट्रियट फ्रंट के सदस्य भी थे—के इकट्ठा होने और ‘अमेरिका को पुनः जीतो’ जैसे नारों ने सामाजिक विभाजन को उजागर किया। क्विनिपिएक विश्वविद्यालय के एक सर्वेक्षण के अनुसार, 61 प्रतिशत अमेरिकी मानते हैं कि देश स्वतंत्रता की घोषणा में वर्णित आदर्शों पर खरा नहीं उतर रहा है।
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में लगातार गहराता राजनीतिक ध्रुवीकरण इस आयोजन में स्पष्ट झलका। यूरोपीय कूटनीतिक हलकों में इसे अमेरिकी लोकतंत्र की आंतरिक चुनौतियों के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले यह मुद्दा और प्रखर होने की संभावना है, जहां सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी और वामपंथी डेमोक्रेट्स के बीच वैचारिक टकराव चरम पर पहुंच सकता है।
| उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस | −0.40 | critical |
|---|---|---|
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | −0.60 | critical |
| दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस | −0.20 | neutral |
Sub-Saharan Africa is not dazzled by Trump's rhetoric: his migration policies and multilateral disengagement speak louder than words.
It contrasts the triumphant image of America with the concrete facts of restrictive policies and humanitarian crises, creating a moral contrast.
The domestic US context (electoral support, economy) that might explain Trump's rhetorical choice is not mentioned.
Latin America sees in Trump the embodiment of a new authoritarianism that threatens democracy and regional sovereignty, with language reminiscent of the worst totalitarianisms.
It uses the parallel with '1984' to delegitimize Trump's rhetoric, turning it into a symptom of a global danger to freedom.
It does not consider the possible domestic strategic reasons behind the attack on 'communists', such as mobilizing the electoral base.
Southeast Asia is not drawn into Trump's rhetoric: priorities are internal stability and growth, not American ideological battles.
It downplays the importance of the speech by relegating it to a foreign news item, without attributing strategic impact on the region.
It does not analyze the effect that Trump's anti-communist rhetoric could have on relations with China or regional dynamics.
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