
ट्रंप का दावा: ईरान कभी नहीं बनाएगा परमाणु हथियार, 300 मिलियन डॉलर की अफवाह फर्जी
जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के साथ हुए समझौता ज्ञापन का बचाव करते हुए कहा कि तेहरान परमाणु हथियार नहीं रखेगा, जबकि 60 दिनों की बातचीत और कांग्रेस की समीक्षा की राह खुल गई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस में जारी जी7 शिखर सम्मेलन के इतर ईरान के साथ हुए नए समझौते को लेकर बड़ा बयान देते हुए उन रिपोर्टों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें दावा किया गया था कि वाशिंगटन तेहरान को 300 मिलियन डॉलर देने जा रहा है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर लिखा, 'ईरान इस बात पर सहमत हो गया है कि वह कभी परमाणु हथियार नहीं रखेगा।' उन्होंने एक्सियोस की खबर को 'फर्जी न्यूज' करार देते हुए कहा कि ऐसी अफवाहें डेमोक्रेट फैला रहे हैं। ट्रंप ने यह भी घोषणा की कि 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) का पूरा पाठ शुक्रवार को जिनेवा में एक औपचारिक समारोह के दौरान सार्वजनिक किया जाएगा, और उन्होंने वादा किया कि वह खुद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर इसे 'शब्द दर शब्द' पढ़ेंगे ताकि मीडिया सटीक कवरेज कर सके। इस हस्ताक्षर कार्यक्रम में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी वार्ताकार मोहम्मद बाकर कलीबाफ के शामिल होने की उम्मीद है।
ट्रंप ने पत्रकारों से बातचीत में जोर देकर कहा कि यह समझौता 'साफ और स्पष्ट' रूप से कहता है कि ईरान कभी परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा, और यदि तेहरान ने ऐसा करने की कोशिश की तो उस पर 'कयामत बरसेगी'। उन्होंने बताया कि एमओयू के तहत 60 दिनों की विस्तृत वार्ता होगी, जिसमें यूरेनियम संवर्धन, प्रतिबंधों में ढील और होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने जैसे मुद्दे शामिल हैं। ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य 60 दिनों की अवधि के दौरान और उसके बाद भी बिना किसी शुल्क के खुला रहेगा। उन्होंने इस समझौते को कांग्रेस के पास समीक्षा के लिए भेजने की इच्छा जताई, जो कुछ रिपब्लिकन सांसदों की मांग रही है। साथ ही उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति ओबामा के जेसीपीओए की तीखी आलोचना करते हुए दावा किया कि उनका नया ढांचा कहीं अधिक मजबूत है।
विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों से मिली प्रतिक्रियाएं इस समझौते की जटिलता को रेखांकित करती हैं। यूरोपीय सहयोगी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अनुभवहीन अमेरिकी वार्ता दल एक ठोस समझौता कर पाने में कठिनाई महसूस कर सकता है। वहीं इजरायल को लेकर ट्रंप ने असामान्य नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि वे लेबनान मुद्दे पर 'खुश नहीं' हैं, और सुझाव दिया कि सीरिया ईरान समर्थित हिजबुल्लाह को निरस्त्र करने की बेहतर स्थिति में हो सकता है। दूसरी ओर, ईरान और अमेरिका के बीच समझौते की सामग्री को लेकर परस्पर विरोधी बयान सामने आए हैं, जिससे आगामी तकनीकी वार्ता के दौरान कई अनसुलझे मुद्दों के उभरने की संभावना है। उपराष्ट्रपति वेंस ने स्वीकार किया कि कुछ अहम विषयों पर अभी सहमति नहीं बन पाई है और उन्हें तकनीकी बातचीत के चरण में सुलझाया जाएगा।
दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए इस घटनाक्रम के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य का शुल्क-मुक्त और स्थायी रूप से खुला रहना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए राहत की खबर है, क्योंकि देश का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का आयात इसी मार्ग से होता है। हालांकि, 60 दिनों की सीमित समय-सीमा में एक व्यापक परमाणु समझौते पर पहुंचना महत्वाकांक्षी लक्ष्य है, और इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष अनुपालन और सत्यापन की जटिल प्रक्रिया को कितनी पारदर्शिता से आगे बढ़ाते हैं। यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और ईरान के वैश्विक आर्थिक मुख्यधारा में लौटने की संभावना बनेगी, जो क्षेत्रीय भू-राजनीति को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ट्रंप ने जोर देकर कहा कि ईरान के साथ अंतरिम समझौता 'साफ-साफ' कहता है कि तेहरान को परमाणु हथियार कभी नहीं मिलेगा। लेकिन 14-सूत्रीय ज्ञापन अब भी गुप्त है, जिससे समझौते की मजबूती पर सवाल उठते हैं। रिपोर्ट ट्रंप के बचाव को संदेह के स्वर में पेश करती है और समझौते की अस्पष्टता को रेखांकित करती है।
ट्रंप ने आश्वासन दिया कि ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं पाएगा और समझौते को सफलता बताते हुए कहा कि दूसरा चरण आसान होगा। लेकिन यूरोपीय सहयोगी चिंतित हैं कि अनुभवहीन अमेरिकी वार्ता दल एक मजबूत समझौता करने में कठिनाई महसूस कर सकता है। लैटिन अमेरिकी मीडिया ट्रंप के आशावाद और यूरोपीय चिंताओं दोनों को प्रस्तुत करता है।
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