
ईरान परमाणु निगरानी पर आईएईए प्रमुख का जोर, तेहरान ने निरीक्षण को अंतिम समझौते से जोड़ा
राफेल ग्रॉसी ने युद्ध के बाद ईरान में 'बहुत मजबूत' सत्यापन प्रणाली की आवश्यकता बताई, जबकि ईरानी अधिकारियों ने क्षतिग्रस्त स्थलों तक पहुंच को प्रतिबंधों की समाप्ति पर निर्भर बताया।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने शुक्रवार को जापान में कहा कि पश्चिम एशिया युद्ध के बाद ईरान में "बहुत मजबूत" सत्यापन प्रणाली स्थापित करना आवश्यक है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वहां परमाणु हथियार विकसित न हों। IAEA प्रमुख के अनुसार, हालिया अमेरिका-ईरान समझौते का उद्देश्य यही है, और ईरान सरकार ने स्पष्ट घोषणा की है कि उसका ऐसा कोई इरादा नहीं है। ग्रॉसी ने बताया कि एजेंसी का मानना है कि 2025 में अंतिम निरीक्षण के बाद से ईरान की परमाणु सामग्री को स्थानांतरित नहीं किया गया है, लेकिन इसकी जमीनी स्तर पर पुष्टि की जानी चाहिए। उन्होंने ईरान के उच्च-संवर्धित यूरेनियम भंडार से निपटने के लिए तनुकरण या किसी अन्य देश में स्थानांतरण जैसे विकल्पों का उल्लेख किया, हालांकि अंतिम निर्णय अमेरिका-ईरान ज्ञापन द्वारा तय होगा, न कि IAEA द्वारा।
ईरानी पक्ष ने IAEA की निरीक्षण मांग को लेकर सशर्त रुख अपनाया है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगई और उप विदेश मंत्री काजिम गरीबाबादी के बयानों के अनुसार, अमेरिका और इज़राइल के सैन्य हमलों से क्षतिग्रस्त परमाणु स्थलों तक निरीक्षकों की पहुंच की कोई योजना नहीं है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि यह मामला केवल अंतिम समझौते के तहत ही सुलझाया जाएगा, और तब जब दूसरा पक्ष सभी प्रतिबंधों को समाप्त करने की दिशा में व्यावहारिक कदम उठाए। विदेश मंत्रालय ने युद्धविराम ज्ञापन के खंड 8 और 9 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि 60 दिनों की बातचीत अवधि के दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वर्तमान स्थिति बनी रहेगी। इसके तहत बुशहर जैसे संयंत्रों का नियमित निरीक्षण जारी रहेगा, लेकिन जिन स्थलों पर हमलों के कारण पहुंच रोक दी गई थी, वहां निरीक्षण वार्ता प्रक्रिया और उसके परिणाम पर निर्भर करेगा। गौरतलब है कि पिछले वर्ष इज़राइल के साथ 12-दिवसीय युद्ध के बाद ईरानी संसद ने एक कानून पारित कर IAEA के साथ सहयोग निलंबित कर दिया था।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बहरीन में क्षेत्रीय सहयोगियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि ईरान के साथ किसी भी समझौते में अमेरिका की स्वीकार्य सीमाएं हैं, और होर्मुज जलडमरूमध्य में शुल्क वसूलने के विचार को खारिज कर दिया। IAEA प्रमुख ग्रॉसी ने यह भी स्पष्ट किया कि निरीक्षण दलों के काम का ब्योरा और समन्वय समिति का गठन अमेरिका-ईरान वार्ता द्वारा तय होगा। पश्चिम एशिया के विश्लेषकों के अनुसार, यह ज्ञापन युद्ध समाप्त करने की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसमें परमाणु मुद्दा एक प्रमुख बाधा बना हुआ है। IAEA ने अभी तक ईरान के साथ प्रारंभिक बातचीत ही शुरू की है, और ग्रॉसी ने उम्मीद जताई कि यह काम जल्द गति पकड़ेगा। इस बीच, होर्मुज जलडमरूमध्य में एक जहाज पर हमले के कारण संयुक्त राष्ट्र को फंसे नाविकों को निकालने का प्रयास स्थगित करना पड़ा, जो क्षेत्रीय तनाव को दर्शाता है।
भारत के लिए, पश्चिम एशिया में स्थिरता और ईरान के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय व्यापार मार्गों को प्रभावित करता है। भारतीय रणनीतिकारों का मानना है कि यदि वार्ता सफल होती है और प्रतिबंध हटते हैं, तो चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा आयात के अवसर बढ़ सकते हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने पहले ही सभी पक्षों से संयम और बातचीत का आग्रह किया है। फिलहाल, 60 दिनों की बातचीत की अवधि के दौरान IAEA की भूमिका सीमित रहेगी, और निरीक्षणों का दायरा राजनीतिक प्रगति पर निर्भर करेगा। अगला कदम अमेरिका-ईरान वार्ता का आगे बढ़ना और IAEA द्वारा तकनीकी तैयारियों को अंतिम रूप देना है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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परमाणु एजेंसी निरीक्षणों के बहाने ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है, जबकि प्राथमिकता प्रतिबंधों को समाप्त करना है। तेहरान दोहराता है कि 2025 से परमाणु सामग्री को स्थानांतरित नहीं किया गया है और निरीक्षकों की पहुँच एक व्यापक समझौते पर निर्भर है। ग्रॉसी के अनुरोध को अनुचित हस्तक्षेप के रूप में चित्रित किया गया है, जबकि ईरान खुद को पीड़ित पक्ष के रूप में प्रस्तुत करता है जो अपनी प्रतिबद्धताओं का सम्मान करता है।
IAEA प्रमुख ने ईरान में निरीक्षण के लिए एक सहमत तंत्र की पुष्टि की, इस बात पर जोर देते हुए कि समझौते की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए एजेंसी की उपस्थिति आवश्यक है। ईरानी अधिकारियों ने प्रारंभिक संपर्क शुरू कर दिए हैं, लेकिन परिचालन विवरण अमेरिका-ईरान वार्ता में तय होंगे। सत्यापन को एक आवश्यक तकनीकी कदम के रूप में प्रस्तुत किया गया है, न कि राजनीतिक रुख के रूप में।
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