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समाजरविवार, 14 जून 2026

ब्रिटेन में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध की घोषणा

प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने ऑस्ट्रेलिया से भी सख्त कदम उठाते हुए टिकटॉक, इंस्टाग्राम समेत प्रमुख प्लेटफॉर्मों पर रोक लगाने की योजना बनाई है, जो 2027 की शुरुआत से लागू होगी।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने सोमवार को डाउनिंग स्ट्रीट से एक ऐतिहासिक कदम की घोषणा करते हुए कहा कि 16 साल से कम उम्र के सभी बच्चों के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल प्रतिबंधित कर दिया जाएगा। यह फैसला ऑनलाइन बाल सुरक्षा को लेकर दुनिया भर में बढ़ती चिंताओं के बीच आया है। ऑस्ट्रेलिया दिसंबर 2025 में ऐसा प्रतिबंध लगाने वाला पहला देश बना था, और अब कनाडा, ब्राजील, इंडोनेशिया, फ्रांस, स्पेन, डेनमार्क, थाईलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी इसी दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। स्टारमर ने इसे “हमारे बच्चों और हमारे भविष्य के लिए एक बड़ा बदलाव” बताते हुए कहा कि सोशल मीडिया बच्चों को दुखी और असुरक्षित बना रहा है, और सरकार अब समझौता करने को तैयार नहीं है।

यह प्रतिबंध स्नैपचैट, टिकटॉक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, एक्स, रेडिट और ट्विच जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्मों पर लागू होगा, जबकि व्हाट्सएप और सिग्नल जैसी मैसेजिंग सेवाओं को इससे छूट दी गई है। ब्रिटेन का यह कदम ऑस्ट्रेलिया के मॉडल से भी आगे जाता है: सरकार गेमिंग प्लेटफॉर्मों पर अजनबियों से बातचीत, लाइव स्ट्रीमिंग, और 18 साल से कम उम्र के युवाओं के लिए एआई ‘रोमांटिक कंपेनियन’ चैटबॉट्स पर भी रोक लगाएगी। साथ ही 16-17 साल के किशोरों के लिए रात के समय डिजिटल कर्फ्यू और अनंत स्क्रॉलिंग पर ब्रेक जैसे उपायों पर भी विचार हो रहा है। सरकार को उम्मीद है कि यह कानून क्रिसमस 2026 तक पारित हो जाएगा और 2027 की वसंत ऋतु से प्रभावी होगा। आयु सत्यापन के लिए चेहरे की पहचान जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा, और नियमों का पालन न करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा, हालांकि प्रतिबंध तोड़ने की कोशिश करने वाले बच्चों को सजा नहीं दी जाएगी।

इस घोषणा पर वैश्विक प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रही हैं। ब्रिटेन में अभिभावकों के बीच कराए गए एक सरकारी परामर्श में 90 प्रतिशत ने 16 साल की न्यूनतम आयु का समर्थन किया, और यूगॉव सर्वेक्षण में 74 प्रतिशत लोग प्रतिबंध के पक्ष में थे। हालांकि, मौली रसेल फाउंडेशन जैसे बाल सुरक्षा समूहों ने चेतावनी दी कि यह प्रतिबंध उत्पाद सुरक्षा के बुनियादी जोखिमों को संबोधित नहीं करता और माता-पिता को सुरक्षा का झूठा भरोसा दे सकता है। यूट्यूब ने भी आपत्ति जताई कि इससे बच्चे अनियमित और गुमनाम सेवाओं की ओर धकेले जा सकते हैं। रूस के विशेष प्रतिनिधि किरिल दिमित्रिएव ने इसे इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की पहचान और नियंत्रण बढ़ाने की चाल बताया, जबकि अमेरिकी मीडिया में इसे “पेरेंट ट्रैप” यानी अभिभावकों के सामने खड़ी असंभव चुनौती का सरकारी समाधान कहा गया। स्वयं किशोरों की राय भी बंटी हुई है—कुछ इसे सही दिशा मानते हैं, तो कुछ का मानना है कि इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के प्रतिबंध को लागू करना तकनीकी और सामाजिक रूप से जटिल होगा। ऑस्ट्रेलिया में पहले ही रेडिट जैसी कंपनियां कानूनी चुनौती दे चुकी हैं, और ब्रिटेन में भी बड़ी टेक कंपनियों के विरोध की संभावना है। फिर भी, स्टारमर सरकार इसे “पीढ़ीगत रीसेट” के रूप में पेश कर रही है, जो बच्चों को उनका बचपन वापस दिलाने और डिजिटल माहौल में एक नया सामान्य स्थापित करने का प्रयास है। इटली में इसी तरह का एक द्विदलीय विधेयक महीनों से सीनेट में अटका हुआ है, जो यूरोपीय देशों के बीच नीतिगत अंतर को रेखांकित करता है। दक्षिण एशिया के संदर्भ में देखें तो भारत जैसे देश, जहां इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या दुनिया में दूसरे स्थान पर है और किशोरों के बीच सोशल मीडिया का प्रसार तेजी से बढ़ रहा है, के लिए ब्रिटेन का यह प्रयोग एक महत्वपूर्ण नीतिगत संदर्भ बन सकता है, हालांकि वहां डिजिटल साक्षरता और बुनियादी ढांचे की चुनौतियां भिन्न हैं।

कुल मिलाकर, ब्रिटेन का यह कदम बाल संरक्षण और डिजिटल अधिकारों के बीच बढ़ते वैश्विक तनाव को दर्शाता है। यह पहल सरकारों की इस बढ़ती मान्यता को रेखांकित करती है कि एल्गोरिदम-संचालित प्लेटफॉर्म बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रहे हैं, और स्वैच्छिक उपाय पर्याप्त नहीं रहे। आने वाले महीनों में इस कानून के मसौदे और कार्यान्वयन की बारीकियां तय करेंगी कि क्या यह वास्तव में एक “विश्व-अग्रणी” सुरक्षा ढांचा बन पाता है या एक विवादास्पद मिसाल जिसे लागू करना मुश्किल साबित हो।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 6 भाषाएँ

58%
लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa atlantica / anglosferaStampa latinoamericana
Stampa atlantica / anglosfera/ sicurezza
allarmeindignazionescetticismo

16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध बचाव का नहीं, बल्कि व्यापक सेंसरशिप का बहाना है। उम्र की पुष्टि और ऑनलाइन सीमाएं लगाकर सरकार अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरा पैदा कर रही है, जो भविष्य में असहमति को दबाने का औजार बन सकता है।

Stampa latinoamericana
pragmatismourgenzapaternalismo

ब्रिटेन का 16 साल से कम के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का फैसला एक साहसिक कदम माना जा रहा है, जो बड़ी टेक कंपनियों के मुनाफ़े से ऊपर बच्चों की भलाई को रखता है। अमेरिकी दबाव के बावजूद लंदन ने बचपन लौटाने का रास्ता चुना, यह दिखाते हुए कि जनहित की जीत हो सकती है।

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रविवार, 14 जून 2026

ब्रिटेन में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध की घोषणा

प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने ऑस्ट्रेलिया से भी सख्त कदम उठाते हुए टिकटॉक, इंस्टाग्राम समेत प्रमुख प्लेटफॉर्मों पर रोक लगाने की योजना बनाई है, जो 2027 की शुरुआत से लागू होगी।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने सोमवार को डाउनिंग स्ट्रीट से एक ऐतिहासिक कदम की घोषणा करते हुए कहा कि 16 साल से कम उम्र के सभी बच्चों के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल प्रतिबंधित कर दिया जाएगा। यह फैसला ऑनलाइन बाल सुरक्षा को लेकर दुनिया भर में बढ़ती चिंताओं के बीच आया है। ऑस्ट्रेलिया दिसंबर 2025 में ऐसा प्रतिबंध लगाने वाला पहला देश बना था, और अब कनाडा, ब्राजील, इंडोनेशिया, फ्रांस, स्पेन, डेनमार्क, थाईलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी इसी दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। स्टारमर ने इसे “हमारे बच्चों और हमारे भविष्य के लिए एक बड़ा बदलाव” बताते हुए कहा कि सोशल मीडिया बच्चों को दुखी और असुरक्षित बना रहा है, और सरकार अब समझौता करने को तैयार नहीं है।

यह प्रतिबंध स्नैपचैट, टिकटॉक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, एक्स, रेडिट और ट्विच जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्मों पर लागू होगा, जबकि व्हाट्सएप और सिग्नल जैसी मैसेजिंग सेवाओं को इससे छूट दी गई है। ब्रिटेन का यह कदम ऑस्ट्रेलिया के मॉडल से भी आगे जाता है: सरकार गेमिंग प्लेटफॉर्मों पर अजनबियों से बातचीत, लाइव स्ट्रीमिंग, और 18 साल से कम उम्र के युवाओं के लिए एआई ‘रोमांटिक कंपेनियन’ चैटबॉट्स पर भी रोक लगाएगी। साथ ही 16-17 साल के किशोरों के लिए रात के समय डिजिटल कर्फ्यू और अनंत स्क्रॉलिंग पर ब्रेक जैसे उपायों पर भी विचार हो रहा है। सरकार को उम्मीद है कि यह कानून क्रिसमस 2026 तक पारित हो जाएगा और 2027 की वसंत ऋतु से प्रभावी होगा। आयु सत्यापन के लिए चेहरे की पहचान जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा, और नियमों का पालन न करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा, हालांकि प्रतिबंध तोड़ने की कोशिश करने वाले बच्चों को सजा नहीं दी जाएगी।

इस घोषणा पर वैश्विक प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रही हैं। ब्रिटेन में अभिभावकों के बीच कराए गए एक सरकारी परामर्श में 90 प्रतिशत ने 16 साल की न्यूनतम आयु का समर्थन किया, और यूगॉव सर्वेक्षण में 74 प्रतिशत लोग प्रतिबंध के पक्ष में थे। हालांकि, मौली रसेल फाउंडेशन जैसे बाल सुरक्षा समूहों ने चेतावनी दी कि यह प्रतिबंध उत्पाद सुरक्षा के बुनियादी जोखिमों को संबोधित नहीं करता और माता-पिता को सुरक्षा का झूठा भरोसा दे सकता है। यूट्यूब ने भी आपत्ति जताई कि इससे बच्चे अनियमित और गुमनाम सेवाओं की ओर धकेले जा सकते हैं। रूस के विशेष प्रतिनिधि किरिल दिमित्रिएव ने इसे इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की पहचान और नियंत्रण बढ़ाने की चाल बताया, जबकि अमेरिकी मीडिया में इसे “पेरेंट ट्रैप” यानी अभिभावकों के सामने खड़ी असंभव चुनौती का सरकारी समाधान कहा गया। स्वयं किशोरों की राय भी बंटी हुई है—कुछ इसे सही दिशा मानते हैं, तो कुछ का मानना है कि इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के प्रतिबंध को लागू करना तकनीकी और सामाजिक रूप से जटिल होगा। ऑस्ट्रेलिया में पहले ही रेडिट जैसी कंपनियां कानूनी चुनौती दे चुकी हैं, और ब्रिटेन में भी बड़ी टेक कंपनियों के विरोध की संभावना है। फिर भी, स्टारमर सरकार इसे “पीढ़ीगत रीसेट” के रूप में पेश कर रही है, जो बच्चों को उनका बचपन वापस दिलाने और डिजिटल माहौल में एक नया सामान्य स्थापित करने का प्रयास है। इटली में इसी तरह का एक द्विदलीय विधेयक महीनों से सीनेट में अटका हुआ है, जो यूरोपीय देशों के बीच नीतिगत अंतर को रेखांकित करता है। दक्षिण एशिया के संदर्भ में देखें तो भारत जैसे देश, जहां इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या दुनिया में दूसरे स्थान पर है और किशोरों के बीच सोशल मीडिया का प्रसार तेजी से बढ़ रहा है, के लिए ब्रिटेन का यह प्रयोग एक महत्वपूर्ण नीतिगत संदर्भ बन सकता है, हालांकि वहां डिजिटल साक्षरता और बुनियादी ढांचे की चुनौतियां भिन्न हैं।

कुल मिलाकर, ब्रिटेन का यह कदम बाल संरक्षण और डिजिटल अधिकारों के बीच बढ़ते वैश्विक तनाव को दर्शाता है। यह पहल सरकारों की इस बढ़ती मान्यता को रेखांकित करती है कि एल्गोरिदम-संचालित प्लेटफॉर्म बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रहे हैं, और स्वैच्छिक उपाय पर्याप्त नहीं रहे। आने वाले महीनों में इस कानून के मसौदे और कार्यान्वयन की बारीकियां तय करेंगी कि क्या यह वास्तव में एक “विश्व-अग्रणी” सुरक्षा ढांचा बन पाता है या एक विवादास्पद मिसाल जिसे लागू करना मुश्किल साबित हो।

स्रोतों में मतभेद

समाज · 24 स्रोत · 6 भाषाएँ

58%उच्च

स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

समर्थक15%
न्यूनत्र55%
निंदक30%

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 6 भाषाएँ

लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa atlantica / anglosferaStampa latinoamericana
Stampa atlantica / anglosfera/ sicurezza
allarmeindignazionescetticismo

16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध बचाव का नहीं, बल्कि व्यापक सेंसरशिप का बहाना है। उम्र की पुष्टि और ऑनलाइन सीमाएं लगाकर सरकार अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरा पैदा कर रही है, जो भविष्य में असहमति को दबाने का औजार बन सकता है।

Stampa latinoamericana
pragmatismourgenzapaternalismo

ब्रिटेन का 16 साल से कम के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का फैसला एक साहसिक कदम माना जा रहा है, जो बड़ी टेक कंपनियों के मुनाफ़े से ऊपर बच्चों की भलाई को रखता है। अमेरिकी दबाव के बावजूद लंदन ने बचपन लौटाने का रास्ता चुना, यह दिखाते हुए कि जनहित की जीत हो सकती है।

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