
अमेरिकी अदालत ने मेटा के खिलाफ बच्चों को लत लगाने का मुकदमा रद्द करने से इनकार किया
29 राज्यों के आरोपों पर सुनवाई जारी रहेगी; टिकटॉक और यूट्यूब ने एक किशोर के साथ समझौता किया, जबकि सुरक्षा सुविधाओं पर अध्ययन ने खामियाँ उजागर कीं।
अमेरिका की एक संघीय अदालत ने सोमवार को मेटा प्लेटफॉर्म्स की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 29 राज्यों के महाधिवक्ताओं द्वारा दायर मुकदमे को रद्द करने की मांग की गई थी। इन राज्यों का आरोप है कि कंपनी ने फेसबुक और इंस्टाग्राम को जानबूझकर बच्चों के लिए लतकारी बनाया और नुकसान को छिपाया। न्यायाधीश यवोन गोंजालेज रोजर्स ने बच्चों की ऑनलाइन गोपनीयता संरक्षण अधिनियम (COPPA) के तहत माता-पिता की सूचना और सहमति की शर्तों का पालन न करने पर राज्यों के पक्ष में संक्षिप्त निर्णय भी दिया। इस बीच, एक अलग मामले में, टिकटॉक और यूट्यूब ने फ्लोरिडा के एक 15 वर्षीय किशोर के साथ समझौता कर लिया, जिसने मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने का आरोप लगाया था; अब मेटा और स्नैप के खिलाफ जुलाई में जूरी ट्रायल होना है।
राज्यों के महाधिवक्ताओं ने शोध का हवाला देते हुए कहा कि फेसबुक और इंस्टाग्राम के इस्तेमाल से बच्चों में अवसाद, चिंता, अनिद्रा, शिक्षा में बाधा और आत्म-क्षति जैसी समस्याएँ सामने आई हैं। मेटा ने तर्क दिया कि 'सोशल मीडिया की लत' कोई मान्य मनोरोग स्थिति नहीं है, इसलिए प्लेटफॉर्म के लतकारी न होने के उसके दावे झूठे नहीं हो सकते। कंपनी ने यह भी कहा कि उसने प्लेटफॉर्म को सामान्य दर्शकों के लिए बनाया है, न कि 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए। न्यायाधीश ने अपने 38 पन्नों के आदेश में पाया कि इस बात पर तथ्यात्मक विवाद हैं कि क्या प्लेटफॉर्म वास्तव में लतकारी हैं, क्या मेटा ने झूठा इनकार किया, और क्या ये आंशिक रूप से बच्चों को लक्षित करते हैं। उन्होंने लिखा कि यदि सबूत दिखाते हैं कि प्लेटफॉर्म किशोरों को अपने नुकसान के लिए मजबूरन इस्तेमाल करने के लिए डिज़ाइन किए गए, तो जूरी मेटा के बयानों को झूठा मान सकती है।
यह मामला 2,600 से अधिक व्यक्तियों, स्कूल जिलों और स्थानीय सरकारों द्वारा दायर बहु-जिला मुकदमेबाजी का हिस्सा है, जिसमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, स्नैपचैट और टिकटॉक पर बच्चों को लत लगाने का आरोप है। इसी सिलसिले में पहले एक 20 वर्षीय युवती के मामले में जूरी ने मेटा और यूट्यूब के खिलाफ 6 मिलियन डॉलर का फैसला सुनाया था, जिसके खिलाफ दोनों कंपनियाँ अपील कर रही हैं। अब 15 वर्षीय लड़के का मामला एक अलग परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करता है, क्योंकि वह नाबालिग है और उसे सोशल मीडिया के कारण गंभीर अवसाद और आत्महत्या के विचारों का सामना करना पड़ा। इस बीच, न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय और नॉर्थईस्टर्न विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन ने दावा किया कि इंस्टाग्राम, यूट्यूब, टिकटॉक और स्नैपचैट पर बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाई गई 60 प्रतिशत सुविधाएँ विफल रहीं। ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और इंडोनेशिया जैसे देश पहले ही नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध या आयु सीमा लागू कर चुके हैं।
कैलिफोर्निया, कोलोराडो, केंटकी और न्यू जर्सी राज्यों के मुकदमों की सुनवाई 18 अगस्त को निर्धारित है, जबकि फ्लोरिडा के किशोर का मामला 27 जुलाई से लॉस एंजेलिस की अदालत में चलेगा। भारत और दक्षिण एशिया में भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी अदालतों के ये फैसले वैश्विक नियामक ढाँचों को प्रभावित कर सकते हैं, खासकर तब जब भारत अपने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम के तहत बच्चों की गोपनीयता के प्रावधानों को सख्ती से लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | 0.00 | neutral |
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| उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस | 0.00 | neutral |
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