
तंत्रिका तंत्र विकारों का बोझ बढ़ा, मौतें घटीं पर दिव्यांगता के साथ जीवन लंबा हुआ
अमेरिकी महाद्वीप में 1990 से 2023 के बीच तंत्रिका तंत्र विकारों से मृत्यु दर घटी लेकिन इनके साथ जीने वालों की संख्या और दिव्यांगता के बोझ में लगातार वृद्धि हुई, एक अध्ययन में खुलासा।
वैश्विक स्तर पर तंत्रिका तंत्र विकारों के परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया है। 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, अमेरिकी महाद्वीप के 38 देशों में 1990 से 2023 के बीच इन बीमारियों से मृत्यु का जोखिम कम हुआ है, लेकिन इनके साथ जीने वाले लोगों की संख्या और दिव्यांगता में काफी वृद्धि हुई है। 2023 में अकेले इन विकारों से 11 लाख मौतें और 3.75 करोड़ स्वस्थ जीवन वर्षों का नुकसान दर्ज किया गया। यह बदलाव बढ़ती उम्र, स्ट्रोक जैसी गंभीर स्थितियों में बचने की दर में सुधार और बेहतर निदान का परिणाम है।
इन स्थितियों के पीछे क्रोनिक तनाव और आर्थिक तंगी जैसे जोखिम कारकों की भूमिका सामने आ रही है। अर्जेंटीना के हृदय रोग विशेषज्ञ मारियो बोस्किस बताते हैं कि लगातार तनाव से कोर्टिसोल हार्मोन का स्राव बढ़ता है, जो रक्त वाहिकाओं को नुकसान, उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी समस्याओं को जन्म देता है। वहीं, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के एक अध्ययन में 2,759 लोगों पर 26, 43 और 53 वर्ष की आयु में आय के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि जो लोग लगातार आर्थिक तंगी में रहे, 53 की उम्र में उनकी संज्ञानात्मक क्षमता कमजोर और 69-71 की उम्र में उनके मस्तिष्क की सेहत खराब पाई गई। यह जोखिम पुरुषों, बचपन में विपन्नता झेलने वालों और अल्जाइमर की आनुवांशिक प्रवृत्ति वालों में अधिक था।
लैटिन अमेरिकी देशों में इसका असर अलग-अलग रूप में दिखता है। कोलंबिया में हर साल 45,000 से 60,000 नए स्ट्रोक के मामले सामने आते हैं, और माइग्रेन वहाँ सबसे अधिक विकलांगता पैदा करने वाला तंत्रिका तंत्र विकार है। अर्जेंटीना में 49 प्रतिशत वयस्क खुद को तनावग्रस्त मानते हैं, जो वैश्विक स्तर पर सबसे ऊंचा आँकड़ा है। मेक्सिको में विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि दृष्टि धुंधली होना, चक्कर आना और बोलने में कठिनाई जैसे लक्षण अक्सर अनदेखे रह जाते हैं, जबकि ये स्ट्रोक के शुरुआती संकेत हो सकते हैं।
विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि समय पर पहचान और उपचार ही स्थायी क्षति को रोक सकता है। कोलंबिया में न्यूरोलॉजिस्ट द्वारा प्रचारित ‘कोरे+’ (CORRE+) और अमेरिकन स्ट्रोक एसोसिएशन का ‘रैपिडो’ (RAPIDO) जैसे स्मरणीय नियम मरीजों और परिजनों को त्वरित कार्रवाई में मदद करते हैं। ये चेहरे की ऐंठन, आँखों की रोशनी में अचानक बदलाव, एक तरफ कमजोरी, बोलने में दिक्कत और संतुलन बिगड़ने जैसे संकेतों पर केंद्रित हैं। ऐसे में तुरंत आपातकालीन सेवाओं को बुलाना और लक्षण शुरू होने का समय नोट करना आवश्यक है, क्योंकि थक्का-घोलने वाली प्रभावी दवा 4.5 घंटे के भीतर ही दी जा सकती है।
आगामी 22 जुलाई को मनाए जाने वाले विश्व मस्तिष्क दिवस का ध्यान जोखिम कारकों को कम करने और पुनर्वास सेवाओं की मजबूती पर होगा, ताकि बढ़ते तंत्रिका तंत्र विकारों के बोझ से निपटा जा सके।
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | 0.00 | neutral |
|---|---|---|
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | 0.00 | neutral |
The Latin American neurologist calls citizens to action: recognizing symptoms is the first step to saving lives.
Transforming alarming statistics into individual behaviors: the threat becomes manageable through awareness and timely action.
No mention of the link between economic stress and cognitive decline, present in Atlantic reports.
Poverty ages the brain: science calls for economic support policies to prevent dementia.
From individual economic anxiety to collective neurological threat: a social problem is universalized into a health risk factor.
Does not provide specific data on neurological disorders in the Americas nor practical symptom guides, unlike Latin American coverage.
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