
ट्रंप की शांति पहल से नेतन्याहू का राजनीतिक दुःस्वप्न: अमेरिका-ईरान समझौते ने बदले समीकरण
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की ओर बढ़ते कदमों ने इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है, जिससे उनकी वाशिंगटन में प्रभाव, ईरान विरोधी नीति और सुरक्षा छवि तीनों पर प्रश्नचिह्न लग गए हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की ओर बढ़ते कूटनीतिक कदमों ने इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए एक गहरा राजनीतिक संकट पैदा कर दिया है। जिस युद्ध को उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप के साथ मिलकर ईरान की क्षेत्रीय ताकत को कुचलने और अपनी चुनावी स्थिति मजबूत करने के लिए छेड़ा था, वही अब उनके करियर के तीन स्तंभों—वाशिंगटन पर प्रभाव, ईरान विरोधी केंद्रीय नीति और ‘मिस्टर सिक्योरिटी’ की छवि—को ध्वस्त करता दिख रहा है। ट्रंप प्रशासन तेज़ी से युद्ध से बाहर निकलना चाहता है, जबकि इज़राइल के सैन्य अभियान लेबनान में उलझे हुए हैं और ईरान की क्षेत्रीय शक्ति को तोड़ने का लक्ष्य अधूरा है।
यह टकराव उस साझा रणनीति की विफलता से उपजा है जिसमें नेतन्याहू ने ईरान के धार्मिक शासन को गिराने और हिज़्बुल्लाह जैसे सहयोगी संगठनों को निष्क्रिय करने का दांव खेला था, जबकि ट्रंप ने इसे अमेरिकी महाशक्ति प्रदर्शन और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने के अवसर के रूप में देखा। लेकिन अब जब वाशिंगटन और तेहरान के बीच समझौते की रूपरेखा बन रही है, इज़राइली नेतृत्व को भय है कि युद्ध उनकी शर्तों पर खत्म होने से पहले ही रुक जाएगा। सार्वजनिक रूप से इज़राइली अधिकारी सावधानी बरत रहे हैं, क्योंकि वे अपने सबसे अहम सहयोगी को नाराज़ नहीं करना चाहते, लेकिन निजी बातचीत में उनकी निराशा साफ झलकती है।
यह गतिरोध नेतन्याहू के लिए बहुआयामी संकट लेकर आया है। पहला, वह व्यक्ति जो स्वयं को वाशिंगटन का ‘राजनीतिक फुसफुसाहटकर्ता’ मानता था, अब अपने ही प्रमुख सहयोगी द्वारा सार्वजनिक रूप से दरकिनार किए जाने की स्थिति में है। दूसरा, ईरान को कमज़ोर करने की उनकी केंद्रीय सुरक्षा नीति ध्वस्त होती दिख रही है, क्योंकि तेहरान युद्धविराम के बाद अपेक्षाकृत मज़बूत स्थिति में उभर सकता है। तीसरा, लेबनान में हिज़्बुल्लाह के खिलाफ़ सैन्य कार्रवाई जारी रखने की मांग पर वाशिंगटन और तेहरान दोनों के दबाव ने उनकी ‘सुरक्षा गारंटर’ की छवि को चोट पहुंचाई है। आने वाले चुनावों को देखते हुए यह राजनीतिक दुःस्वप्न और भी गहरा हो जाता है।
दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। भारत इज़राइल के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी साझेदारी तथा ईरान के साथ ऊर्जा आयात और चाबहार बंदरगाह जैसी कनेक्टिविटी परियोजनाओं के बीच नाज़ुक संतुलन बनाए हुए है। अमेरिका-ईरान समझौते से प्रतिबंधों में ढील मिलने पर भारत की ईरानी तेल तक पहुंच आसान हो सकती है और अफ़ग़ानिस्तान-मध्य एशिया से जुड़ाव मज़बूत हो सकता है। लेकिन इसके साथ ही पश्चिम एशिया में ईरान की बढ़ती वैधता क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बदल सकती है, जिसका असर भारत की खाड़ी कूटनीति पर पड़ेगा।
आगे की राह अनिश्चित है। नेतन्याहू संभवतः समझौते को पटरी से उतारने के लिए लेबनान में सैन्य कार्रवाई तेज़ कर सकते हैं, लेकिन इससे ट्रंप से सीधी टकराहट का जोखिम है। यदि अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी शांति पहल को प्राथमिकता देते हैं, तो इज़राइल-अमेरिका संबंधों में ऐतिहासिक दरार आ सकती है। वैश्विक नज़रिया यही कहता है कि यह समझौता मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक नक्शे को फिर से खींचेगा, और भारत जैसे उभरते शक्ति केंद्रों को अपनी विदेश नीति की धुरी को नए सिरे से जांचना होगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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नेतन्याहू के करीबी दक्षिणपंथी इज़राइली हलकों में भारी आक्रोश है, वे ट्रंप को 'हारा हुआ' बता रहे हैं और ईरान के साथ शांति समझौता करने पर वाशिंगटन पर 'विश्वासघात' का आरोप लगा रहे हैं। उनकी नज़र में यह समझौता एक धोखा है जो इज़राइल को असुरक्षित छोड़ देता है और चुनावों से ठीक पहले प्रधानमंत्री की युद्ध रणनीति को कमज़ोर करता है।
राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नेतन्याहू के बीच तनाव चरम पर पहुँच गया है क्योंकि अमेरिका-ईरान शांति समझौता उनके अलग-अलग लक्ष्यों को उजागर करता है। जहाँ ट्रंप ईरान के परमाणु रास्ते को रोकने में जीत का दावा कर रहे हैं, वहीं नेतन्याहू का युद्ध के ज़रिए क्षेत्र को नया आकार देने का दाँव उलटा पड़ गया है, जिससे इज़राइल लेबनान में उलझ गया है और गठबंधन पर दबाव बढ़ गया है।
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