
अर्जेंटीना की मानवाधिकार प्रतीक ताती अल्मेइदा का 95 वर्ष की आयु में निधन, माद्रेस आंदोलन की एक पीढ़ी का अंत
तानाशाही के खिलाफ पांच दशक लंबी लड़ाई लड़ने वाली माद्रेस दे प्लाजा दे मायो की अध्यक्ष के निधन पर शोक, सरकार के रुख पर कार्लोत्तो का तीखा हमला।
अर्जेंटीना में मानवाधिकारों की जीवित प्रतीक रहीं लिदिया ‘ताती’ अल्मेइदा का रविवार को 95 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे माद्रेस दे प्लाजा दे मायो लीनिया फंडादोरा की अध्यक्ष थीं और पिछले पांच दशकों से अपने बेटे अलेहांद्रो की खोज कर रही थीं, जिसे जून 1975 में सैन्य तानाशाही से ठीक पहले अर्धसैनिक बलों ने गायब कर दिया था। एक सैन्य परिवार में जन्मी अल्मेइदा का जीवन उसी क्षण बदल गया जब उनका बेटा लापता हुआ; 1979 में वे प्लाजा दे मायो में हर गुरुवार मार्च करने वाली माताओं के साथ खड़ी हो गईं और धीरे-धीरे उनकी सफ़ेद रुमाल वाली मुस्कान पूरे देश के लिए नैतिक अधिकार का चेहरा बन गई।
उनका अंतिम संस्कार ब्यूनस आयर्स के बाल्वानेरा इलाके में दूरसंचार मजदूर संघ फोएत्रा के मुख्यालय में हुआ, जहां ताबूत बंद रखा गया और पास में उनकी मुस्कुराती तस्वीर सजाई गई। परिवार ने फूल लाने के बजाय दान देने का आग्रह किया। ब्यूनस आयर्स प्रांत के गवर्नर आक्सेल किसियोफ़ ने भावुक होकर कहा, “ताती हमेशा तब मौजूद रहती थीं जब उनकी ज़रूरत होती थी, हर कार्यक्रम में, हर 24 मार्च को।” लेकिन इस शोक सभा में सबसे तीखा सुर अबुएलास दे प्लाजा दे मायो की अध्यक्ष एस्तेला दे कार्लोत्तो का रहा, जिन्होंने सरकार पर सीधा हमला करते हुए कहा, “वे हमसे नफ़रत करते हैं, आज वे ज़रूर जश्न मना रहे होंगे।” यह टिप्पणी राष्ट्रपति हावियेर मिलेई के प्रशासन के उस रुख़ की ओर इशारा करती है जो तानाशाही के दौरान गायब किए गए लोगों की संख्या को नकारता है और मानवाधिकार आंदोलन को लगातार चुनौती देता है।
अल्मेइदा की पहचान सिर्फ़ एक शोकाकुल मां की नहीं थी; वे अपनी कोमलता और ज़िद के लिए जानी जाती थीं। कमज़ोर पड़ते साथियों को वे याद दिलाती थीं: “ज़ोर से दोहराओ—अगर माद्रेस कर सकती हैं, तो हम क्यों नहीं?” उनका सफ़ेद रुमाल अर्जेंटीना की सड़कों से निकलकर वैश्विक प्रतिरोध का प्रतीक बन गया, जो सिंडिकेटों, छात्र आंदोलनों और अन्याय के ख़िलाफ़ हर मोर्चे पर लहराया। द गार्डियन, यूओएल और ला वानगार्दिया जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने उनके निधन को एक युग का अंत बताया, जिसमें उन आवाज़ों का स्थान अब नई पीढ़ी ले रही है।
दक्षिण एशिया के संदर्भ में देखें तो माद्रेस का सफ़ेद रुमाल जबरन गायबगी के ख़िलाफ़ लड़ने वाले परिवारों के लिए एक सार्वभौमिक भाषा बन चुका है—कश्मीर से लेकर बलूचिस्तान तक माताओं ने इसी प्रतीक को अपनाया है। अल्मेइदा का जाना यह रेखांकित करता है कि संस्थापक पीढ़ी अब धीरे-धीरे विदा ले रही है, लेकिन उनकी सीख “एकमात्र हार वह है जो छोड़ दी जाए” आने वाले दशकों तक सड़कों पर गूंजती रहेगी। अर्जेंटीना में स्मृति, सत्य और न्याय की लड़ाई अब युवा कार्यकर्ताओं के कंधों पर है, जिनके लिए ताती अल्मेइदा का जीवन इस बात का प्रमाण है कि प्रेम प्रतिरोध का सबसे स्थायी रूप होता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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प्लाजा दे मायो की माताओं की प्रिय नेता ताती अल्मेडा के निधन ने अर्जेंटीना को गहरे शोक में डुबो दिया है। उनकी संघर्ष साथी एस्टेला दे कार्लोटो ने सरकार पर कठोर आरोप लगाते हुए कहा कि आज वे जश्न मना रहे होंगे। तानाशाही के इनकार के खिलाफ अथक सेनानी के रूप में अल्मेडा की विरासत नई पीढ़ियों के लिए प्रकाशस्तंभ बनी रहेगी।
प्लाजा दे मायो की माताओं की ऐतिहासिक नेता ताती अल्मेडा का 95 वर्ष की आयु में निधन हो गया। मानवाधिकारों की पैरोकारी में अग्रणी, उन्होंने हाल ही में मिलेई सरकार की इनकारवादी नीतियों का विरोध किया था। उनका जाना अर्जेंटीना के मानवाधिकार आंदोलन के एक बुनियादी अध्याय का अंत है।
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