
चीन की रणनीतिक महत्वाकांक्षाएं और बदलती वैश्विक व्यवस्था
बीजिंग में जुटे विशेषज्ञ द्विध्रुवीय विश्व की बात कर रहे हैं, जबकि पश्चिम चीनी उत्पादन क्षमता और सैन्य योजनाओं पर चिंता जता रहा है।
चीन का प्रभाव आर्कटिक, अंतरिक्ष और स्वच्छ ऊर्जा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में एक साथ बढ़ रहा है, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन के पुनर्गठन की चर्चा तेज हो गई है। बीजिंग में आयोजित वार्षिक विश्व शांति मंच में चीनी विदेश नीति विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि ईरान युद्ध के बाद अमेरिकी विश्वसनीयता में गिरावट आई है और अधिकांश राष्ट्र अब चीन को अमेरिका से अधिक भरोसेमंद मानते हैं। उनके अनुसार, विश्व एकध्रुवीयता से द्विध्रुवीयता की ओर बढ़ रहा है और प्रौद्योगिकी, विशेषकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, किसी देश की स्थिति निर्धारित करने वाला प्रमुख कारक बन गया है।
पश्चिमी विश्लेषक चीन की इन गतिविधियों को भिन्न दृष्टि से देखते हैं। अमेरिकी पूर्व खुफिया अधिकारी रेबेका कॉफ़लर ने फ़ॉक्स बिज़नेस को बताया कि चीन रूस की यूक्रेन युद्ध में कमज़ोरी का लाभ उठाते हुए आर्कटिक के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर नियंत्रण हेतु सैन्य कार्रवाई की योजना बना सकता है। यूरोपीय आर्थिक नीति संस्थान ब्रूगेल के एक शोधपत्र में चीन की स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन क्षमता को ‘अत्यधिक’ बताया गया, हालाँकि दक्षिण चीन मॉर्निंग पोस्ट के अनुसार, सस्ते सौर पैनल और बैटरियां जलवायु समाधान का हिस्सा हैं और कई विकासशील देश पश्चिमी उत्पादन लागत पर डीकार्बोनाइज़ेशन कठिन पाएंगे। अमेरिकी रणनीतिक हलकों में चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रम चिंता का विषय है; इतालवी विश्लेषकों के अनुसार, चीन का लक्ष्य अमेरिकी अंतरिक्ष एकाधिकार को तोड़ना है और हाल के प्रक्षेपण परीक्षणों ने उसे तकनीकी रूप से अमेरिकी और यूरोपीय प्रणालियों से आगे खड़ा कर दिया है।
इन प्रतिस्पर्धी आख्यानों के बीच, चीन और अमेरिका के बीच ‘रणनीतिक स्थिरता’ की साझा समझ बनाने के प्रयास अब भी अटके हुए हैं। शिघुआ विश्वविद्यालय के एक मंच पर बताया गया कि दोनों पक्ष इस अवधारणा की भिन्न-भिन्न व्याख्या करते हैं: बीजिंग सहयोग को प्राथमिकता देता है जबकि वाशिंगटन विवाद प्रबंधन पर केंद्रित है। सैन्य संचार चैनल, विशेषकर अमेरिकी प्रशांत कमान और चीनी समकक्षों के बीच, अवरुद्ध हैं; एक अमेरिकी रक्षा अवर सचिव की प्रस्तावित यात्रा स्थगित होना इसका ताज़ा उदाहरण है। वहीं, चीन के बौद्धिक हलकों में अपनी प्राचीन सभ्यतागत दृष्टि से संयम की बात उठती है, जैसे झेंग राज्य के कूटनीतिज्ञ ज़ीचान का मानना था कि बड़ी शक्तियों को अहंकार त्याग कर छोटे राज्यों का ध्यान रखना चाहिए।
अगला व्यावहारिक कदम मानक-निर्धारण की लड़ाई में दिख सकता है, जहाँ दोनों महाशक्तियाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता और संचार उपग्रहों के नियम गढ़ने में जुटी हैं। चीन में निजी अंतरिक्ष कंपनियों को अरबों युआन का वित्तपोषण मिल रहा है और हांगकांग में ऊर्जा वैज्ञानिक चेन पेइपेइ का कैम्ब्रिज छोड़कर वापसी इस बात का संकेत है कि अनुसंधान स्वायत्तता और संसाधनों की तलाश में प्रतिभा पूर्व की ओर रुख कर रही है। यह बहुआयामी बदलाव एक ऐसे डोज़ियर का रूप ले चुका है जिसमें कोई भी पक्ष तत्काल समझौते का इच्छुक नहीं दिखता, और वैश्विक संस्थाओं के कामकाज में मूल्यों को लेकर तनाव बना हुआ है।
| चीनी प्रेस | +0.30 | aligned |
|---|---|---|
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | 0.00 | neutral |
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | −0.70 | critical |
Beijing rejects Western criticisms and claims its role as a global leader in the green transition, presenting its rise as beneficial for all.
Chinese interests are universalized, presented as aligned with global clean energy and sustainable development goals, while Western objections are portrayed as short-sighted protectionism.
The theory of Chinese military expansion in the Arctic, present in Latin American media, and the aggressive space competition mentioned in continental European media are omitted.
The Indian account presents the views of Chinese experts as a fact, without taking a stance, maintaining an analytical and detached tone.
A third-observer perspective is adopted, faithfully reporting forum statements without evaluative comments, leaving assessment to the reader.
Alarmist theories about Chinese expansion (present in Latin America) and China's defense (present in Chinese media) are omitted, focusing only on forum statements.
Latin America warns against alleged Chinese expansionist ambitions, describing Beijing as an aggressive power threatening global stability.
Aggressive intentions are attributed to China based on unverified defense analyses, creating a parallel between US decline and the rise of a Chinese threat.
Perspectives from the Chinese forum emphasizing cooperation and stability are omitted, as are details on industrial overcapacity accusations present in Chinese media.
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