
जब घर न हो: नाव, झाड़ियां और ख़ुद से दोस्ती का सहारा
दुनिया भर में बढ़ता अकेलापन, चाहे चुनाव हो या मजबूरी, आत्मनिर्भरता और आंतरिक शक्ति की नई कहानी लिख रहा है।
मेलबर्न की कड़कड़ाती सर्द रातों में साठ साल की वैनेसा हार्ट झाड़ियों के नीचे छिप जाती थीं। उनके पास न कंबल था, न ठीक से कोट; हड्डियों में दर्द और ठंड से कांपता शरीर। 'अगर शिकारियों ने पकड़ लिया, तो बुरी तरह पीटते और जो थोड़ा-बहुत था, छीन लेते,' वह बताती हैं। घरेलू हिंसा से भागकर सड़कों पर आईं वैनेसा की कहानी कोई अकेली नहीं।
यह तस्वीर सिर्फ़ ऑस्ट्रेलिया की नहीं है। कनाडा के क्यूबेक प्रांत में प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरकर मांग कर रहे हैं कि आवास के अधिकार को चार्टर ऑफ राइट्स में शामिल किया जाए। वहां के सामाजिक संगठनों का कहना है कि 'चार दीवारी और एक मामूली छत को घर मानना बंद करना होगा।' ऑस्ट्रेलिया में ही न्यू साउथ वेल्स के तट पर जेम्स ब्रायन जैसे लोग बेकार पड़ी नावों को अपना ठिकाना बना रहे हैं, क्योंकि किराया इतना बढ़ गया है कि ज़मीन पर रहना मुमकिन नहीं। ब्रायन कहते हैं, 'मुझे निकालने के लिए उन्हें बंदूक की नोक पर ले जाना होगा।'
दूसरी ओर, अकेलापन हमेशा विवशता नहीं होता। इंडोनेशिया की एक मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट बताती है कि अंतर्मुखी लोग लंबे एकांत और ख़ामोशी में ऊर्जा पाते हैं; उनके लिए यह पलायन नहीं, मानसिक स्वास्थ्य की बहाली है। अर्जेंटीना के शोधकर्ता इस बात पर ज़ोर देते हैं कि चालीस-पचास की उम्र तक बिना स्थायी साथी के रहने वाले लोग भावनात्मक रूप से ठंडे नहीं होते, बल्कि उनमें आत्मनिर्भरता और गहरी सहनशीलता विकसित होती है। सिडनी की सत्तर वर्षीय लेखिका सुज़ैन गेर्वे इसके जीवंत उदाहरण हैं, जो तीन गंभीर संबंधों के बाद जानबूझकर अकेली रहने का सुख भोग रही हैं—किताबी दोस्त, जिम की सहेलियाँ और शुक्रवार को नाती-पोतों का शोर उनकी दुनिया को भर देता है।
भारत और दक्षिण एशिया में यह बहस कई परतों में बंटी है। एक तरफ बुज़ुर्ग महिलाओं का बेघर होना या नाव पर रहने जैसी मजबूरी यहां भी सामने आ रही है, तो दूसरी तरफ शहरी युवा और मध्यवयस्क महिलाएं स्वेच्छा से अकेले रहने का विकल्प चुन रही हैं। मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में किराए की बेतहाशा बढ़ोतरी ने 'पेइंग गेस्ट' और साझा आवास को नया रूप दिया है, लेकिन सामाजिक स्वीकृति अब भी धीमी है। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि जो लोग लंबे समय तक अकेले रहते हैं, वे अनिश्चितता को झेलने और बिना बाहरी मंज़ूरी के फ़ैसले लेने में अधिक सक्षम हो जाते हैं—यह एक ऐसी आंतरिक शक्ति है जो किसी भी समाज में प्रासंगिक है।
मेलबर्न के बॉक्स हिल कम्युनिटी आर्ट्स सेंटर में 'वॉक इन हर शूज़' नामक प्रदर्शनी में वैनेसा और डायना जैसी महिलाओं की कहानियों को जूतों के ज़रिए दर्शाया गया है। वे जूते, जो कभी फुटपाथों, कार की पिछली सीटों और झाड़ियों के नीचे चले, अब एक गैलरी में ख़ामोश खड़े हैं—हर जोड़ी अपने भीतर एक अनकही यात्रा समेटे। यह नज़ारा पूछता है कि घर क्या है: चार दीवारें, एक नाव, या वह आंतरिक ठिकाना जो हम ख़ुद में तलाश लेते हैं?
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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