
ईरान युद्ध के बीच अमेरिकी रणनीतिक तेल भंडार 43 साल के निचले स्तर पर
ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ जारी संघर्ष के आर्थिक दुष्प्रभावों को कम करने के लिए आपातकालीन भंडार से भारी मात्रा में तेल निकाला, जिससे भंडार 1983 के बाद सबसे कमज़ोर स्थिति में पहुंच गया।
अमेरिका का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (एसपीआर) पिछले सप्ताह 340.3 मिलियन बैरल पर आ गया, जो जुलाई 1983 के बाद का सबसे निचला स्तर है। संघीय आंकड़ों के अनुसार, महज़ एक सप्ताह में 8.9 मिलियन बैरल की अतिरिक्त निकासी की गई, जिससे यह ऐतिहासिक गिरावट दर्ज हुई। इससे पहले का न्यूनतम रिकॉर्ड जुलाई 2023 में बना था, जब रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के बाद बाइडन प्रशासन ने कीमतों को स्थिर करने के लिए भंडार से तेल निकाला था। अब ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ युद्ध—जिसमें इज़राइल भी शामिल है—के कारण उत्पन्न ऊर्जा संकट से निपटने के लिए इसी रणनीति पर निर्भर है, लेकिन भंडार का स्तर पहली बार उस दौर से भी नीचे चला गया है जब रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल में इसे पहली बार भरा जा रहा था।
मध्य पूर्व और अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों से स्पष्ट है कि यह भंडार अब अपनी कुल क्षमता के आधे से भी कम रह गया है। फरवरी के अंत में ईरान के साथ युद्ध छिड़ने के बाद से इसमें लगभग 75 मिलियन बैरल यानी 18 प्रतिशत की कमी आ चुकी है। एसपीआर मूलतः 1970 के दशक के तेल प्रतिबंध के बाद बनाया गया था, ताकि भविष्य की आपूर्ति बाधाओं से अर्थव्यवस्था को बचाया जा सके। अब यह आपातकालीन कवच ईंधन की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने का प्रमुख औज़ार बन गया है, लेकिन इसके लगातार घटते स्तर ने अमेरिकी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं।
वैश्विक स्तर पर, विशेषकर भारत जैसे बड़े तेल आयातकों के लिए, यह स्थिति गंभीर संकेत लेकर आई है। भारत अपनी ज़रूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है और पश्चिम एशिया से उसकी निर्भरता बहुत अधिक है। रूसी और ब्राज़ीलियाई स्रोतों के अनुसार, अमेरिकी भंडार में यह गिरावट अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में मूल्य अस्थिरता को और बढ़ा सकती है। यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव के कारण आपूर्ति शृंखला बाधित होती है, तो भारत को न केवल ऊंचे आयात बिल का सामना करना पड़ेगा, बल्कि घरेलू मुद्रास्फीति और चालू खाता घाटा भी दबाव में आ सकता है। दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह एक साझा जोखिम है, जहाँ ऊर्जा सब्सिडी और राजकोषीय संतुलन पहले से ही नाज़ुक हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के लिए इस भंडार की पुनर्भराई एक बड़ी चुनौती बन सकती है। युद्ध जारी रहने पर और निकासी की ज़रूरत पड़ सकती है, जबकि बाज़ार से भारी मात्रा में तेल खरीदकर भंडार भरने का प्रयास कीमतों को और ऊपर धकेल देगा। इस दुष्चक्र ने ऊर्जा नीति को भू-राजनीतिक संकटों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना दिया है। भारतीय ऊर्जा विशेषज्ञों का सुझाव है कि नई दिल्ली को अपने रणनीतिक भंडार को मज़बूत करने के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा और आपूर्ति स्रोतों के विविधीकरण में तेज़ी लानी चाहिए, ताकि ऐसे बाहरी झटकों से अर्थव्यवस्था को बचाया जा सके।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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अमेरिकी सामरिक पेट्रोलियम भंडार 340.3 मिलियन बैरल तक गिर गया है, जो 1983 के बाद का सबसे निचला स्तर है, जब रीगन प्रशासन इसे भर रहा था। जारी निकासी आपूर्ति व्यवधानों को प्रबंधित करने के लिए है।
अमेरिकी सामरिक भंडार चार दशकों में सबसे निचले स्तर पर गिर गया है क्योंकि ट्रम्प प्रशासन ईरान के साथ युद्ध के प्रभाव को कम करने और ऊर्जा की कीमतों पर लगाम लगाने के लिए इसका उपयोग जारी रखे हुए है। फरवरी के अंत में संघर्ष शुरू होने के बाद से, भंडार 75 मिलियन बैरल घट गया है, जो कुल क्षमता के आधे से नीचे आ गया है और रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के बाद के पिछले निचले स्तर को पार कर गया है।
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