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मीडिया और मनोरंजनशनिवार, 4 जुलाई 2026

मुराकामी की कतार से प्रोमेथियस तक: जब मशीनें तेज़ दौड़ें और इंसान सोचने लगे

टोक्यो में आधी रात को किताब खरीदने की कतार से लेकर अफ़्रीकी आर्थिक सपनों और अर्जेंटीना के खेतों तक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की रफ़्तार ने एक साझा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या हम आगे बढ़ रहे हैं या सिर्फ़ हाथ-पाँव मार रहे हैं?

टोक्यो की एक सड़क पर आधी रात का सन्नाटा था, लेकिन किताबों की दुकान के बाहर दर्जनों लोग खामोश कतार में खड़े थे। स्ट्रीटलाइट की पीली रोशनी में वे उस पल का इंतज़ार कर रहे थे जब हारुकी मुराकामी का नया उपन्यास ‘द स्टोरी ऑफ़ काहो’ पहली बार उनके हाथों में होगा। यह पहली बार था जब मुराकामी ने किसी महिला को अपनी कहानी का केंद्रीय पात्र बनाया था, और पाठकों की यह बेचैन कतार बता रही थी कि एक अकेले लेखक की कल्पना अब भी कितनी गहरी पकड़ रखती है। ठीक उसी दिन एक साक्षात्कार में मुराकामी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर तीखा प्रहार करते हुए कहा, “एआई अब तक जो कुछ हुआ है, उसके आधार पर सादृश्य बनाती है, लेकिन मेरी कहानियाँ बिलकुल अलग तरीके से जन्म लेती हैं—पात्र अचानक मन में प्रकट होते हैं, यह सादृश्य से नहीं उपजता।” उनके ये शब्द सिर्फ़ एक लेखक का अभिमान नहीं थे, बल्कि उस बेचैनी की गूँज थे जो दुनिया भर के दफ़्तरों, खेतों और कोड की स्क्रीनों पर महसूस की जा रही है।

यह बेचैनी अर्जेंटीना के एक सलाहकार गाब्रियेल पेरेइरा ने तब करीब से देखी जब एक कंपनी ने उन्हें ढाँचागत बदलाव का काम सौंपा। वे अपना प्रस्ताव पेश करते, इससे पहले ही समझ गए कि संस्था जिस रफ़्तार से बदलाव कर रही थी, उसकी टीमें उसे पचा नहीं पा रही थीं—बैठकें असंभव, फ़ैसले हवा में, लोग बिना सोचे अलग-अलग दिशाओं में भागते हुए। पेरेइरा ने कंपनी से कहा, “हाथ-पाँव मारना आगे बढ़ने जैसा नहीं है।” वैश्विक परामर्श फ़र्मों के आँकड़े इस अनुभव को व्यापक बनाते हैं: 88 प्रतिशत कंपनियाँ एआई का इस्तेमाल कर रही हैं, लेकिन केवल एक-तिहाई ही इसे प्रयोगशाला से आगे ले जा पाई हैं; 73 प्रतिशत कर्मचारी संगठनात्मक बदलावों से मध्यम या उच्च थकान झेल रहे हैं, और उनका प्रदर्शन पाँच प्रतिशत तक गिर जाता है। तकनीक जितनी तेज़ी से बदल रही है, मनुष्य की आत्मसात करने की क्षमता उतनी तेज़ नहीं है।

यह तनाव सिर्फ़ कंपनियों तक सीमित नहीं है। अफ़्रीकी महाद्वीप की आर्थिक सोच में एक अलग किस्म की बेचैनी है—वहाँ के विश्लेषक कहते हैं कि असली चुनौती संसाधनों का निर्यात करने के बजाय उद्योग, विनिर्माण और नवाचार के ज़रिए अपने युवाओं के लिए अवसर पैदा करना है। अफ़्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र जैसे समझौते तभी सार्थक होंगे जब बुनियादी ढाँचा और नीतियाँ स्थानीय कारोबार को साथ लेकर चलें। दूसरी ओर, अर्जेंटीना के ग्रामीण इलाकों में एक खामोश क्रांति चल रही है—90 प्रतिशत से अधिक विस्तृत कृषि सीधी बुआई के तहत है, बायोटेक्नोलॉजी का इस्तेमाल दुनिया में सबसे ऊँचे स्तरों पर है, और स्टार्टअप ऐसे समाधान बना रहे हैं जो निर्यात किए जा सकते हैं। फिर भी, अर्जेंटीना के विश्लेषकों के अनुसार, सार्वजनिक बहस अब भी पचास साल पुरानी श्रेणियों में फँसी है—मानो खेत आज भी सिर्फ़ कच्चा माल उगा रहे हों, जबकि सच्चाई यह है कि वे सेंसर, एल्गोरिदम और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की प्रयोगशाला बन चुके हैं। ब्राज़ील के तकनीकी पर्यवेक्षक भी इसी बदलाव को कोड की दुनिया में रेखांकित करते हैं: प्रोग्रामर अब सिर्फ़ कोड नहीं लिखते, बल्कि एआई द्वारा सुझाए गए कोड की निगरानी, समीक्षा और रणनीतिक निर्णय लेते हैं।

इन सबके बीच, मेक्सिको के एक स्तंभकार ने मैरी शेली के ‘फ्रेंकस्टीन’ और कार्ल मार्क्स की ‘ग्रुंडरिसे’ पांडुलिपियों को सामने रखकर एक गहरा प्रश्न उठाया: क्या हम गलत सवाल पूछ रहे हैं? मशीनें इंसानों की तरह सोचेंगी या नहीं, यह उतना अहम नहीं जितना यह कि इन मशीनों में कैद बुद्धिमत्ता आखिर आई कहाँ से और उस पर नियंत्रण किसका है। मार्क्स ने डेढ़ सदी पहले लिखा था कि मशीनें “मानव मस्तिष्क के अंग हैं, जिन्हें मानव हाथों ने रचा है; यह ज्ञान की वस्तुगत शक्ति है।” आज का सामान्य बौद्धिकता का यह विशाल भंडार—जिसे हम एआई कहते हैं—दरअसल पीढ़ियों के सामूहिक चिंतन का निचोड़ है।

टोक्यो की उस रात, कतार में खड़े पाठकों ने जब आखिरकार किताब थामी, तो उनके हाथों में सिर्फ़ कागज़ और स्याही नहीं थी—वह एक ऐसे दिमाग की उपज थी जिसने एक महिला की आँखों से दुनिया देखने का जोखिम उठाया। मुराकामी ने कहा था कि उन्होंने अमेरिका के एक महिला कॉलेज में समय बिताया और वह माहौल ‘काहो’ में उतर आया। यह वह अदृश्य संवेदना है जिसे कोई एल्गोरिदम सादृश्य से नहीं गढ़ सकता—एक लेखक का अपने अनुभव को पिघलाकर पात्र में ढाल देना। शायद यही वह गति है जो हाथ-पाँव मारने और सचमुच आगे बढ़ने के बीच का फ़र्क तय करती है।

विचलन — कौन इसे कैसे बताता है
0%कम
2 ब्लॉक · स्थिति 0.00 से 0.00 तक
आलोचनात्मकसमर्थक
LATAFR
प्रेस ब्लॉकों के बीच विचलन
लैटिन अमेरिकी प्रेस0.00neutral
उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस0.00neutral
मुराकामी के लिए रात की कतारों और एल्गोरिदम के डर की कहानी प्रदान किए गए प्रेस ब्लॉक सामग्री में शामिल नहीं है।
लैटिन अमेरिकी प्रेस0.00
स्वर

The Latin American bloc does not address the issue.

तंत्रassenza

The absence of coverage avoids taking a stance, making the bloc neutral by omission.

चूक

Not applicable: the bloc has no materials related to the story.

उदासीनता
उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस0.00
स्वर

The Sub-Saharan African bloc does not address the issue.

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शनिवार, 4 जुलाई 2026

मुराकामी की कतार से प्रोमेथियस तक: जब मशीनें तेज़ दौड़ें और इंसान सोचने लगे

टोक्यो में आधी रात को किताब खरीदने की कतार से लेकर अफ़्रीकी आर्थिक सपनों और अर्जेंटीना के खेतों तक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की रफ़्तार ने एक साझा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या हम आगे बढ़ रहे हैं या सिर्फ़ हाथ-पाँव मार रहे हैं?

टोक्यो की एक सड़क पर आधी रात का सन्नाटा था, लेकिन किताबों की दुकान के बाहर दर्जनों लोग खामोश कतार में खड़े थे। स्ट्रीटलाइट की पीली रोशनी में वे उस पल का इंतज़ार कर रहे थे जब हारुकी मुराकामी का नया उपन्यास ‘द स्टोरी ऑफ़ काहो’ पहली बार उनके हाथों में होगा। यह पहली बार था जब मुराकामी ने किसी महिला को अपनी कहानी का केंद्रीय पात्र बनाया था, और पाठकों की यह बेचैन कतार बता रही थी कि एक अकेले लेखक की कल्पना अब भी कितनी गहरी पकड़ रखती है। ठीक उसी दिन एक साक्षात्कार में मुराकामी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर तीखा प्रहार करते हुए कहा, “एआई अब तक जो कुछ हुआ है, उसके आधार पर सादृश्य बनाती है, लेकिन मेरी कहानियाँ बिलकुल अलग तरीके से जन्म लेती हैं—पात्र अचानक मन में प्रकट होते हैं, यह सादृश्य से नहीं उपजता।” उनके ये शब्द सिर्फ़ एक लेखक का अभिमान नहीं थे, बल्कि उस बेचैनी की गूँज थे जो दुनिया भर के दफ़्तरों, खेतों और कोड की स्क्रीनों पर महसूस की जा रही है।

यह बेचैनी अर्जेंटीना के एक सलाहकार गाब्रियेल पेरेइरा ने तब करीब से देखी जब एक कंपनी ने उन्हें ढाँचागत बदलाव का काम सौंपा। वे अपना प्रस्ताव पेश करते, इससे पहले ही समझ गए कि संस्था जिस रफ़्तार से बदलाव कर रही थी, उसकी टीमें उसे पचा नहीं पा रही थीं—बैठकें असंभव, फ़ैसले हवा में, लोग बिना सोचे अलग-अलग दिशाओं में भागते हुए। पेरेइरा ने कंपनी से कहा, “हाथ-पाँव मारना आगे बढ़ने जैसा नहीं है।” वैश्विक परामर्श फ़र्मों के आँकड़े इस अनुभव को व्यापक बनाते हैं: 88 प्रतिशत कंपनियाँ एआई का इस्तेमाल कर रही हैं, लेकिन केवल एक-तिहाई ही इसे प्रयोगशाला से आगे ले जा पाई हैं; 73 प्रतिशत कर्मचारी संगठनात्मक बदलावों से मध्यम या उच्च थकान झेल रहे हैं, और उनका प्रदर्शन पाँच प्रतिशत तक गिर जाता है। तकनीक जितनी तेज़ी से बदल रही है, मनुष्य की आत्मसात करने की क्षमता उतनी तेज़ नहीं है।

यह तनाव सिर्फ़ कंपनियों तक सीमित नहीं है। अफ़्रीकी महाद्वीप की आर्थिक सोच में एक अलग किस्म की बेचैनी है—वहाँ के विश्लेषक कहते हैं कि असली चुनौती संसाधनों का निर्यात करने के बजाय उद्योग, विनिर्माण और नवाचार के ज़रिए अपने युवाओं के लिए अवसर पैदा करना है। अफ़्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र जैसे समझौते तभी सार्थक होंगे जब बुनियादी ढाँचा और नीतियाँ स्थानीय कारोबार को साथ लेकर चलें। दूसरी ओर, अर्जेंटीना के ग्रामीण इलाकों में एक खामोश क्रांति चल रही है—90 प्रतिशत से अधिक विस्तृत कृषि सीधी बुआई के तहत है, बायोटेक्नोलॉजी का इस्तेमाल दुनिया में सबसे ऊँचे स्तरों पर है, और स्टार्टअप ऐसे समाधान बना रहे हैं जो निर्यात किए जा सकते हैं। फिर भी, अर्जेंटीना के विश्लेषकों के अनुसार, सार्वजनिक बहस अब भी पचास साल पुरानी श्रेणियों में फँसी है—मानो खेत आज भी सिर्फ़ कच्चा माल उगा रहे हों, जबकि सच्चाई यह है कि वे सेंसर, एल्गोरिदम और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की प्रयोगशाला बन चुके हैं। ब्राज़ील के तकनीकी पर्यवेक्षक भी इसी बदलाव को कोड की दुनिया में रेखांकित करते हैं: प्रोग्रामर अब सिर्फ़ कोड नहीं लिखते, बल्कि एआई द्वारा सुझाए गए कोड की निगरानी, समीक्षा और रणनीतिक निर्णय लेते हैं।

इन सबके बीच, मेक्सिको के एक स्तंभकार ने मैरी शेली के ‘फ्रेंकस्टीन’ और कार्ल मार्क्स की ‘ग्रुंडरिसे’ पांडुलिपियों को सामने रखकर एक गहरा प्रश्न उठाया: क्या हम गलत सवाल पूछ रहे हैं? मशीनें इंसानों की तरह सोचेंगी या नहीं, यह उतना अहम नहीं जितना यह कि इन मशीनों में कैद बुद्धिमत्ता आखिर आई कहाँ से और उस पर नियंत्रण किसका है। मार्क्स ने डेढ़ सदी पहले लिखा था कि मशीनें “मानव मस्तिष्क के अंग हैं, जिन्हें मानव हाथों ने रचा है; यह ज्ञान की वस्तुगत शक्ति है।” आज का सामान्य बौद्धिकता का यह विशाल भंडार—जिसे हम एआई कहते हैं—दरअसल पीढ़ियों के सामूहिक चिंतन का निचोड़ है।

टोक्यो की उस रात, कतार में खड़े पाठकों ने जब आखिरकार किताब थामी, तो उनके हाथों में सिर्फ़ कागज़ और स्याही नहीं थी—वह एक ऐसे दिमाग की उपज थी जिसने एक महिला की आँखों से दुनिया देखने का जोखिम उठाया। मुराकामी ने कहा था कि उन्होंने अमेरिका के एक महिला कॉलेज में समय बिताया और वह माहौल ‘काहो’ में उतर आया। यह वह अदृश्य संवेदना है जिसे कोई एल्गोरिदम सादृश्य से नहीं गढ़ सकता—एक लेखक का अपने अनुभव को पिघलाकर पात्र में ढाल देना। शायद यही वह गति है जो हाथ-पाँव मारने और सचमुच आगे बढ़ने के बीच का फ़र्क तय करती है।

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