
लेबनान-इज़राइल वार्ता में अमेरिकी पायलट परियोजना, पर इज़राइल ने पूर्ण वापसी से किया इनकार
वाशिंगटन में पाँचवें दौर की सीधी वार्ता के बीच इज़राइल ने दक्षिण लेबनान से सेना हटाने से इनकार किया, जबकि अमेरिकी समर्थित 'पायलट ज़ोन' योजना पर चर्चा जारी है।
वाशिंगटन में लेबनान और इज़राइल के बीच पाँचवें दौर की सीधी बातचीत मंगलवार से शुरू हुई, जिसमें अमेरिकी समर्थित एक 'पायलट परियोजना' पर चर्चा केंद्र में है। इसके तहत इज़राइली सेना दक्षिण लेबनान के कुछ क्षेत्रों से हटकर उन्हें लेबनानी सेना को सौंप सकती है, बशर्ते अमेरिकी प्रशिक्षण और जाँच से यह सुनिश्चित हो कि वे हिज़्बुल्लाह से जुड़े नहीं हैं। हालाँकि, इज़राइली रक्षा मंत्री यिसराइल कात्ज़ ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी अनुरोध पर भी इज़राइल दक्षिण लेबनान से पूरी तरह नहीं हटेगा और विस्थापितों की वापसी फ़िलहाल नहीं होगी।
लेबनानी राष्ट्रपति जोसेफ़ औन ने कहा कि यह वार्ता अमेरिका-ईरान स्विस बैठकों से अलग है और इसका लक्ष्य पूर्ण इज़राइली वापसी, बंदियों की रिहाई और पुनर्निर्माण है। प्रधानमंत्री नवाफ़ सलाम ने ज़ोर देकर कहा कि बेरूत किसी भी आंशिक कब्ज़े को स्वीकार नहीं करेगा। दूसरी ओर, हिज़्बुल्लाह प्रमुख नईम क़ासिम ने इज़राइल को बिना शर्त पूर्ण वापसी की चेतावनी दी और कहा कि यह एक निश्चित समय-सीमा में होनी चाहिए। ईरान ने अमेरिका के साथ 18 जून को हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन में लेबनान में युद्धविराम को अनिवार्य शर्त बनाया है और कहा है कि इसका उल्लंघन पूरे समझौते का उल्लंघन माना जाएगा।
अमेरिकी कूटनीतिक हलकों में इस मुद्दे पर विभाजन दिखता है। विदेश मंत्री मार्को रूबियो लेबनान के साथ सीधे द्विपक्षीय समाधान पर ज़ोर देते हैं, जबकि उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस की टीम ने स्विट्ज़रलैंड वार्ता में ईरान, क़तर और पाकिस्तान को शामिल कर एक 'डी-कॉन्फ़्लिक्शन सेल' बनाई, जिसमें इज़राइल को जगह नहीं दी गई। इस तंत्र की आलोचना इज़राइली और कुछ अमेरिकी विश्लेषकों ने यह कहते हुए की है कि इससे ईरान को लेबनान में वैध भूमिका मिल सकती है। इज़राइली सेना के भीतर भी असंतोष बढ़ा है—कमांडो परिवारों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर स्पष्ट लक्ष्यहीन लड़ाई को समाप्त करने की माँग की है, और फ़ील्ड कमांडरों ने बताया कि राजनीतिक अस्पष्टता के कारण संचालन में बाधाएँ आ रही हैं।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका-ईरान तनाव कम करने के लिए हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलना अहम है, जिसकी बंदी से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई थी। भारत जैसे दक्षिण एशियाई देशों के लिए, जो अपनी कच्चे तेल की ज़रूरत का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आयात करते हैं, लेबनान में स्थायी युद्धविराम और क्षेत्रीय स्थिरता का सीधा आर्थिक महत्त्व है। ईरान ने लेबनान को अपनी क्षेत्रीय साख और हिज़्बुल्लाह के भविष्य से जोड़कर रखा है, जबकि इज़राइल के लिए यह उत्तरी सीमा की सुरक्षा और हिज़्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण का प्रश्न है।
वार्ता का यह दौर गुरुवार तक चलेगा, जिसमें सैन्य-से-सैन्य स्तर पर 'पायलट ज़ोन' और वापसी की समय-सीमा पर बातचीत होगी। लेबनानी सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, कोई भी योजना अंतिम दिन के बाद ही सामने आएगी। फ़िलहाल युद्धविराम नाज़ुक बना हुआ है, इज़राइली सेनाएँ दक्षिण लेबनान में गहराई तक तैनात हैं और दोनों पक्षों के बीच बुनियादी मतभेद—विशेषकर पूर्ण वापसी बनाम बफ़र ज़ोन और हिज़्बुल्लाह के भविष्य पर—बने हुए हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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रिपोर्ट में लेबनान से इजरायल की पूर्ण वापसी की हिजबुल्लाह की मांग को नोट किया गया है, साथ ही राष्ट्रपति औन द्वारा विदेशी हस्तक्षेप को अस्वीकार करने पर प्रकाश डाला गया है। इसमें पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में अमेरिका-ईरान डी-कॉन्फ्लिक्ट सेल की स्थापना का उल्लेख है, जो व्यापक मध्य पूर्व संदर्भ में एक कूटनीतिक घटनाक्रम के रूप में कहानी को प्रस्तुत करता है।
कवरेज वाशिंगटन में चल रही वार्ताओं पर केंद्रित है, जहां लेबनान दक्षिण से पूर्ण इजरायली वापसी की मांग करता है। हालांकि, इजरायल इस बात की गारंटी पर जोर देता है कि लेबनानी सेना हिजबुल्लाह के बुनियादी ढांचे को नष्ट कर सकती है, जो वापसी तंत्र पर गतिरोध को उजागर करता है।
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