
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का निर्णायक सप्ताह: ट्रंप की राष्ट्रपति शक्तियों और चुनावी नियमों पर फैसले से तय होगी दिशा
फेड गवर्नर की बर्खास्तगी, जन्मजात नागरिकता और मेल-इन मतपत्रों की अंतिम तिथि जैसे मामलों पर आने वाले निर्णय अमेरिकी संस्थागत संतुलन और वैश्विक बाजारों को प्रभावित कर सकते हैं।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट इस सप्ताह अपने सत्र के अंतिम सात निर्णय सुनाने जा रहा है, जिनमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कार्यकारी शक्तियों की सीमा और चुनाव प्रक्रिया को लेकर अहम मामले शामिल हैं। इनमें से सबसे चर्चित मामला फेडरल रिज़र्व की गवर्नर लिसा कुक को बिना ठोस कारण हटाने के ट्रंप के प्रयास से जुड़ा है, जिस पर यदि न्यायालय ने रोक लगाई तो केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता को मजबूत कानूनी आधार मिलेगा। व्हाइट हाउस के अनुसार, राष्ट्रपति को कार्यपालिका के अधिकारियों को किसी भी कारण से हटाने का संवैधानिक अधिकार है, जबकि ब्रेनन सेंटर फॉर जस्टिस जैसे कानूनी संस्थानों का कहना है कि इससे स्वतंत्र एजेंसियों की संरचना कमजोर होगी।
दूसरा अहम मामला जन्मजात नागरिकता को सीमित करने के ट्रंप के कार्यकारी आदेश से जुड़ा है, जिसके तहत अमेरिकी धरती पर पैदा हुए बच्चों को नागरिकता तभी मिलेगी जब कम से कम एक अभिभावक नागरिक या स्थायी निवासी हो। प्रशासन का तर्क है कि यह अवैध आव्रजन और ‘बर्थ टूरिज़्म’ रोकने के लिए जरूरी है। उधर, प्रधान न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने मौखिक दलीलों के दौरान इस तर्क पर संदेह जताते हुए कहा था, “यह नई दुनिया है, लेकिन संविधान वही है।” विधि विशेषज्ञों के अनुसार, यदि न्यायालय ने प्रशासन के पक्ष में फैसला दिया, तो हर साल लगभग 2.5 लाख बच्चों की नागरिकता प्रभावित होगी, जिनमें दक्षिण एशियाई मूल के अस्थायी वीज़ा धारक भी शामिल हैं।
चुनाव नियमों से जुड़े दो मामलों पर भी न्यायालय का रुख अहम होगा। एक मिसिसिपी के उस कानून को चुनौती देता है जो चुनाव दिवस के पांच दिन बाद तक आने वाले डाक मतपत्रों को गिनने की इजाज़त देता है; अगर इसे असंवैधानिक ठहराया गया तो 29 राज्यों में मिलने वाली ऐसी छूट समाप्त हो सकती है। दूसरा मामला राजनैतिक दलों और उम्मीदवारों के बीच अभियान खर्च के समन्वय पर लगी पाबंदियों को लेकर है। इसके अलावा, एक और फैसला इदाहो और वेस्ट वर्जीनिया के उन कानूनों पर होना है जो ट्रांसजेंडर महिलाओं के महिला खेलों में हिस्सा लेने पर रोक लगाते हैं। इन मामलों में न्यायालय की रूढ़िवादी बहुमत वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकारों के प्रति सहानुभूति दिखाई थी।
ये सभी निर्णय ऐसे समय आ रहे हैं जब ट्रंप प्रशासन निचली अदालतों में चुनावी प्रक्रिया में बदलाव के कई प्रयासों में उलझा हुआ है। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, मतदाता पात्रता जांचने के लिए आव्रजन डेटाबेस के प्रयोग पर एक संघीय न्यायाधीश ने पिछले सप्ताह रोक लगाते हुए कहा था कि इससे “पवित्र मताधिकार खतरे में पड़ सकता है।” इसी तरह, प्रशासन द्वारा 30 राज्यों के खिलाफ मतदाता सूचियाँ मांगने के मुकदमों में अब तक नौ में हार मिली है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता ने कहा कि राष्ट्रपति “चुनाव प्रशासन में पूर्ण विश्वास सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं,” जबकि ब्रेनन सेंटर की वेंडी वीज़र के अनुसार, “यह प्रशासन चुनाव चक्र में अधिकतम अराजकता फैलाने का प्रयास कर रहा है।”
वैश्विक नज़रिए से, फेड की स्वतंत्रता को कमजोर करने के असर दूरगामी हो सकते हैं, क्योंकि अमेरिकी मौद्रिक नीति में राजनीतिक हस्तक्षेप से उभरते बाजारों, खासकर भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं पर पूंजी प्रवाह अस्थिरता का दबाव पड़ सकता है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के कानून के प्रोफेसर विलियम बॉड के अनुसार, लिसा कुक के मामले में न्यायालय प्रशासन के खिलाफ जा सकता है, लेकिन एफटीसी के एक पदाधिकारी से जुड़े दूसरे मामले में ट्रंप को व्यापक अधिकार मिल सकते हैं, जिसमें वह 91 साल पुरानी उस नज़ीर को पलटने की मांग कर रहे हैं जो स्वतंत्र एजेंसियों के प्रमुखों को संरक्षण देती है। फिलहाल, सोमवार (29 जून) से शुरू होकर आने वाले इन निर्णयों पर न केवल कानूनी बल्कि राजनीतिक हलकों की निगाहें टिकी हैं, जहाँ नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों का मद्देनज़र ये फैसले ज़मीनी नियमों को दोबारा लिख सकते हैं।
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | −0.30 | critical |
|---|---|---|
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | 0.00 | neutral |
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