
गर्मी की छुट्टियों में संस्कृति की सौंधी महक: अबू धाबी से ढाका तक बच्चों की नई पहल
संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश और अल्जीरिया में चल रहे ग्रीष्मकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम किस तरह नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ते हुए भविष्य की तकनीक और अभिव्यक्ति से जोड़ रहे हैं।
अबू धाबी के एक कक्ष में इलायची और भुनी कॉफ़ी की ख़ुशबू तैर रही थी। दस-ग्यारह साल के बच्चे बारीक़ी से दल्लाह से छोटे फ़िंजान में क़हवा उड़ेल रहे थे—यह ‘सनअ अल-क़हवा’ की कार्यशाला थी, जो शेख़ मोहम्मद बिन ख़ालिद आल नहयान सांस्कृतिक केंद्र के ग्रीष्मकालीन कार्यक्रम का हिस्सा थी। यहाँ इमारती बच्चे कॉफ़ी बनाने की विरासत, योला नृत्य, सद्दू बुनाई और खजूर की खेती जैसी परंपराओं से रूबरू हो रहे थे, ताकि छुट्टियों का समय सीखने और रचनात्मकता में ढले।
खाड़ी क्षेत्र में इस गर्मी यह नज़ारा अकेला नहीं था। पूरे संयुक्त अरब अमीरात में ‘सन्दूक़ अल-वतन’ के तहत पचास स्थानों पर 1,350 गतिविधियाँ चल रही थीं, जिनमें परिवार दिवस पर 600 से अधिक परिवारों ने भाग लिया। शेख़ नहयान बिन मुबारक आल नहयान ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ये कार्यक्रम बच्चों को अपनी पहचान से जोड़ने के साथ-साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल सिखा रहे हैं। वहीं दुबई अंतरराष्ट्रीय लेखन कार्यक्रम ने युवा लेखकों को तराशने का बीड़ा उठाया; आलोचक अहमद अल-अक़ीली के अनुसार यह ‘मानव और ज्ञान में निवेश’ का नमूना है, जो मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम नॉलेज फ़ाउंडेशन की पहल है।
पूरब की ओर ढाका के बंगला अकादमी में माहौल ज़रा अलग था, लेकिन सवाल वही था—संस्कृति का भविष्य से क्या रिश्ता है? वहाँ साहित्यिक संगठन ‘सृजन’ ने एक पाठचक्र आयोजित किया था, जिसमें राजीव सरकार की किताब ‘संस्कृति: द्वंद्व और समन्वय’ पर चर्चा हुई। वक्ता नूर-ए-आलम सिद्दीक़ी ने कहा कि सिर्फ़ बुनियादी ढाँचा किसी देश को विकसित नहीं बना सकता, जब तक लोगों की सोच उदार और मानवीय न हो। कुदरत-ए-हुदा ने जोड़ा कि किताबों से दूर होते समाज में लेखक का यह काम संस्कृति की निरंतरता का प्रमाण है। बांग्लादेशी बुद्धिजीवियों की यह चिंता दक्षिण एशिया के उस यथार्थ को रेखांकित करती है जहाँ भौतिक प्रगति अक्सर सांस्कृतिक जड़ों को पीछे छोड़ देती है।
भूमध्य सागर के दक्षिण में अल्जीरिया ने इस गर्मी अपने प्रवासी बच्चों के लिए पहली बार शैक्षिक और सांस्कृतिक ग्रीष्मकालीन शिविर शुरू किए। विदेश मंत्रालय के राज्य सचिव सुफ़ियान शाइब ने बताया कि यह कार्यक्रम चौदह प्रांतों में जुलाई-अगस्त में चलेगा, ताकि छुट्टियाँ मनाने आए बच्चे अपनी मिट्टी, इतिहास और पहचान से जुड़ सकें। प्रवासियों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी के लिए यह एक सेतु जैसा है—ना केवल भाषा और परंपरा का, बल्कि अपनेपन के एहसास का।
अबू धाबी के उसी केंद्र में शाम ढले एक लड़की अपने हाथों से सिले बैग पर कढ़ाई कर रही थी; उसके बग़ल में एक किशोर ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से पर्यावरण संरक्षण का एक छोटा-सा प्रोजेक्ट तैयार किया था। इमारती माँ अपने बच्चे के लिखे संदेश को पढ़कर मुस्कुरा रही थी कि ‘मुझे अपने परिवार पर गर्व है’। ये सब धागे एक ही ताने-बाने में बुने जा रहे थे—बीता कल और आने वाला कल, दोनों एक बच्चे की हथेली पर टिके थे।
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We build national identity through summer: every program is a brick for a strong, cohesive homeland.
The enumeration of government agreements and initiatives creates an impression of totality and control, making identity a manageable and measurable project.
Omits mention of independent civil society's role or criticism of cultural standardization.
Culture is the foundation of all real development; without it, progress is empty.
The use of a philosophical axiom (culture as prerequisite) makes the thesis indisputable and universally valid.
We welcome our children back home, strengthening the bond with the homeland through education and culture.
The framing of the diaspora as 'children' creates a familial and affective relationship, making the program a national duty.
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