
पेरू चुनाव में फुजीमोरी की बढ़त, सांचेज़ का परिणाम न मानने का ऐलान और गहराता राजनीतिक संकट
99% मतगणना के बाद भी अनिश्चितता बरकरार, वामपंथी उम्मीदवार रॉबर्टो सांचेज़ ने चुनावी प्रक्रिया पर पारदर्शिता का आरोप लगाकर परिणाम अस्वीकार करने और राजधानी लीमा में प्रदर्शनों का आह्वान किया।
पेरू के राष्ट्रपति पद के दूसरे चरण के चुनाव में दक्षिणपंथी उम्मीदवार कीको फुजीमोरी ने अपनी बढ़त को और मजबूत कर लिया है, लेकिन देश एक गहरे राजनीतिक अनिश्चितता की ओर बढ़ रहा है। 99 प्रतिशत से अधिक मतपत्रों की गिनती के बाद फुजीमोरी को 50.1% और वामपंथी प्रतिद्वंद्वी रॉबर्टो सांचेज़ को 49.9% वोट मिले हैं—महज 35,000 मतों का अंतर। इसके बावजूद राष्ट्रीय चुनाव कार्यालय (ONPE) ने अभी तक विजेता की घोषणा नहीं की है, क्योंकि लगभग 2,50,000 विवादित वोटों की समीक्षा बाकी है। सांचेज़ की पार्टी ‘जुंटोस पोर एल पेरू’ ने इस प्रक्रिया को ‘पारदर्शिताहीन’ करार देते हुए परिणाम न मानने की घोषणा कर दी और आगामी बुधवार को लीमा में बड़े विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है।
यह कड़ा मुकाबला पेरू के समाज की गहरी विभाजन रेखाओं को उजागर करता है। लहुआयताम्बो नामक एक छोटे से पर्वतीय जिले में दोनों उम्मीदवारों को ठीक 181-181 वोट मिले—यह दुर्लभ स्थिति राष्ट्रीय स्तर पर फैले ध्रुवीकरण का सूक्ष्म प्रतिबिंब है। शुरुआती गिनती में सांचेज़ आगे थे, लेकिन विदेशी मतों और विवादित मतपत्रों की पड़ताल ने पलड़ा फुजीमोरी की ओर झुका दिया। चुनाव आयोग ने संकेत दिया है कि अंतिम परिणाम आने में दो सप्ताह से लेकर महीने भर तक का समय लग सकता है, जिससे राजनीतिक खिंचाव और बढ़ने की आशंका है।
सांचेज़ खेमे के रुख में आए अचानक बदलाव ने भी विवाद को हवा दी है। जब वे मतगणना में आगे चल रहे थे, तब पार्टी ने प्रक्रिया का सम्मान करने की बात कही थी, लेकिन पिछड़ने पर ‘अनियमितताओं’ और ‘नियमों में बदलाव’ के आरोप लगाए—हालांकि ठोस सबूत सार्वजनिक नहीं किए गए। दूसरी ओर, 2022-23 के सरकार विरोधी प्रदर्शनों में मारे गए लोगों के परिजनों ने न्यायालय के बाहर धरना देकर फुजीमोरी को ‘तानाशाह की बेटी’ बताते हुए उनके राष्ट्रपति बनने का विरोध किया। इन परिवारों का आरोप है कि फुजीमोरी ने पूर्व राष्ट्रपति दीना बोलुआर्ते के कार्यकाल में हुई हिंसा के दोषियों को संरक्षण दिया।
यह घटनाक्रम लैटिन अमेरिका में लोकतांत्रिक संस्थाओं की नाजुकता को एक बार फिर रेखांकित करता है। पेरू में वर्षों से भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता का दौर रहा है, और इस चुनाव का परिणाम चाहे जो भी हो, सत्ता हस्तांतरण सुचारू रूप से होता नहीं दिख रहा। भारत जैसे स्थापित लोकतंत्रों के लिए यह एक सबक है कि चुनावी निकायों की विश्वसनीयता और पारदर्शिता कितनी अहम होती है। यदि विवादित वोटों की समीक्षा के बाद भी अंतर मामूली रहता है, तो सड़कों पर टकराव और कानूनी लड़ाई लंबी खिंच सकती है, जिससे पेरू की आर्थिक सुधार यात्रा और क्षेत्रीय स्थिरता दोनों पर जोखिम बढ़ेगा।
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