
सूडान के अल-ओबेद में मानवीय तबाही की चेतावनी, संयुक्त राष्ट्र का 'रेड अलर्ट'
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की तत्काल बैठक में अल-ओबेद पर घेराबंदी और ड्रोन हमलों से नागरिकों की मौत पर गहरी चिंता जताई गई, सोमवार को युद्धविराम प्रस्ताव पर मतदान संभव।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने 3 जुलाई 2026 को जिनेवा में मानवाधिकार परिषद की तत्काल बैठक में 'रेड अलर्ट' जारी करते हुए कहा कि सूडान के उत्तरी कोर्डोफान प्रांत के अल-ओबेद शहर में एक नई मानवाधिकार तबाही सामने आ रही है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के अनुसार, 6 से 28 जून के बीच अल-ओबेद और आसपास के इलाकों में कम से कम 15 ड्रोन हमलों में 45 नागरिक मारे गए और 41 घायल हुए, हालांकि वास्तविक संख्या अधिक होने की आशंका है। तुर्क ने चेतावनी दी कि यदि तत्काल कार्रवाई नहीं की गई तो अल-ओबेद में वैसी ही स्थिति बन सकती है जैसी पिछले वर्ष अल-फशर में हुई थी, जिससे पाँच लाख या अधिक लोग विस्थापित हो सकते हैं।
इस बैठक में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने तत्काल और बिना शर्त युद्धविराम तथा मानवीय संघर्षविराम का आह्वान किया। यूएई ने अपने बयान में दोनों युद्धरत पक्षों द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की कड़ी निंदा की और पूरे सूडान में संयुक्त राष्ट्र हथियार प्रतिबंध के विस्तार की माँग की। वहीं, ब्रिटेन, जर्मनी, आयरलैंड, नीदरलैंड और नॉर्वे के समर्थन से एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया है, जिसमें मानवीय संघर्षविराम और तत्काल युद्धविराम का आह्वान किया गया है तथा रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (आरएसएफ) द्वारा अल-ओबेद में हिंसा बढ़ाने की कड़ी निंदा की गई है। इसके विपरीत, ईरानी मीडिया रिपोर्टों में दस्तावेजी साक्ष्यों के हवाले से आरोप लगाया गया है कि यूएई आरएसएफ को हथियार, वित्तीय और सैन्य सहायता प्रदान कर रहा है, जिससे नागरिकों के खिलाफ व्यापक अपराधों को बल मिला है। शांति एवं संघर्ष समाधान विशेषज्ञ जान पोस्पिसिल के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय समर्थन के बिना यह युद्ध इस स्तर पर जारी नहीं रह सकता था, लेकिन अमेरिका, सऊदी अरब या यूएई जैसे किसी भी बाहरी अभिनेता के पास युद्धविराम कराने का प्रभाव नहीं है।
अल-ओबेद, जिसकी आबादी लगभग पाँच लाख है और जहाँ पहले से ही लगभग एक लाख विस्थापित शरणार्थी मौजूद हैं, पिछले 18 महीनों से घेराबंदी जैसी स्थिति झेल रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, स्वच्छ पानी की कमी गंभीर स्तर पर पहुँच गई है और आवश्यक आपूर्ति मार्ग, पेट्रोल पंप तथा विद्युत नेटवर्क ड्रोन हमलों से प्रभावित हुए हैं। तुर्क ने 'युद्ध की अर्थव्यवस्था' पर प्रहार करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि घरेलू और विदेशी तत्व इस नरसंहार से लाभान्वित हो रहे हैं। यूएई ने सूडान क्वाड के सदस्य के रूप में बर्लिन सम्मेलन के परिणामों और नागरिक ट्रैक को आगे बढ़ाने के प्रयासों का स्वागत किया, तथा इस बात पर जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मुख्य उद्देश्य एक व्यापक, नागरिक-नेतृत्व वाली राजनीतिक प्रक्रिया होनी चाहिए जो युद्धरत पक्षों और चरमपंथी समूहों से स्वतंत्र हो।
अप्रैल 2023 में सूडानी सेना और आरएसएफ के बीच शुरू हुए इस गृहयुद्ध में अल-ओबेद रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है। फरवरी 2025 में सेना द्वारा लंबी घेराबंदी तोड़ने के बावजूद, आरएसएफ ने ड्रोन हमलों के जरिए नाकाबंदी फिर से लागू कर दी है। ब्रिटेन द्वारा बुलाई गई इस तत्काल बहस के बाद प्रस्ताव पर सोमवार को मतदान अपेक्षित है। विश्लेषकों का मानना है कि सूडान में जारी अस्थिरता लाल सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा सकती है, जो दक्षिण एशियाई देशों के लिए रणनीतिक रूप से संवेदनशील है। फिलहाल, अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती युद्धरत पक्षों पर युद्धविराम के लिए प्रभावी दबाव बनाने की है, जिसके लिए अभी तक कोई स्पष्ट सहमति नहीं बन पाई है।
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | −0.60 | critical |
|---|---|---|
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | +0.20 | neutral |
| अरब खाड़ी प्रेस | −0.20 | neutral |
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.50 | critical |
Iran denounces the Western conspiracy and calls for an embargo, while the UN Council is useless.
It attributes the cause of the crisis to an external enemy (US/Israel) and transforms the victim into a legitimate fighter, reprojecting the narrative of resistance.
Omisses the role of Sudanese government forces in the siege and their responsibility for the violence.
Europe calls for a legal and diplomatic solution, without openly taking sides.
It transforms the conflict into a matter of international law, delegitimizing violence through UN procedure and investigations, without assigning specific blame.
Omisses the role of external actors like Iran and the Gulf, which fund the parties, and the structural causes of the conflict.
The Gulf balances between condemning the siege and protecting its strategic interests.
It hierarchizes threats: regional stability and economic interests come before absolute judgment, leading to conditional support for the embargo.
Omisses the direct involvement of some Gulf states in the Sudanese conflict, such as support for certain factions.
The West condemns the siege and threatens harsher actions if the UN does not act.
It constructs a moral urgency frame that justifies external intervention, equating the situation to previous humanitarian crises that required military intervention.
Omisses the effectiveness of past embargoes and the potential consequences of military intervention, such as conflict escalation.
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