
पितृत्व और मानसिक स्वास्थ्य: चुप्पी तोड़ने की चुनौती
नए पिताओं में प्रसवोत्तर अवसाद से लेकर शराब के बढ़ते सेवन तक, पुरुषों की मानसिक पीड़ा अक्सर सांस्कृतिक अपेक्षाओं के पीछे छिपी रहती है, जिसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है।
नाइजीरिया के चिकित्सकीय विशेषज्ञों के अनुसार, लगभग दस में से एक नया पिता प्रसवोत्तर अवसाद का अनुभव करता है, लेकिन आधिकारिक रूप से दर्ज मामले बहुत कम हैं। यह स्थिति शास्त्रीय उदासी के बजाय चिड़चिड़ापन, आक्रामकता, शराब का सेवन बढ़ने या सामाजिक रूप से पीछे हटने जैसे व्यवहारों में प्रकट होती है। लाडोक अकिंटोला प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के मनोचिकित्सक डॉ. अदेओये ओयेवोले बताते हैं कि आर्थिक दबाव और प्रदाता के रूप में विफलता का भय कई पुरुषों को चुपचाप पीड़ित रखता है।
यह चुप्पी केवल नाइजीरिया तक सीमित नहीं है। वैश्विक स्तर पर, पुरुषों का मानसिक स्वास्थ्य सांस्कृतिक अपेक्षाओं से गहराई से जुड़ा है। घाना और अन्य अफ्रीकी समाजों में पारंपरिक मर्दानगी की भूमिकाएँ इतनी कठोर हो सकती हैं कि भावनात्मक अभिव्यक्ति को कमज़ोरी मान लिया जाता है। प्रवासी पुरुषों के लिए सांस्कृतिक अलगाव और भेदभाव अतिरिक्त तनाव पैदा करते हैं। कार्यस्थल पर पहचान का संकट, नौकरी छूटना या सेवानिवृत्ति भी आत्म-मूल्य की भावना को गहरा आघात पहुँचा सकती है।
इस मनोवैज्ञानिक दबाव का एक सामान्य परिणाम शराब या नशीले पदार्थों का सहारा लेना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन शराब को समूह-1 कार्सिनोजेन मानता है, जो तम्बाकू और एस्बेस्टस की श्रेणी में आता है। 2025 में अमेरिकी सर्जन जनरल की सलाह ने पुष्टि की कि शराब स्तन, यकृत और आंत सहित कम से कम सात प्रकार के कैंसर का खतरा बढ़ाती है। फिर भी, आधे से भी कम अमेरिकी इसे कैंसर का जोखिम कारक मानते हैं। शराब अस्थायी राहत तो देती है, लेकिन दीर्घकाल में अवसाद को गहराती है और एक खतरनाक चक्र बनाती है।
वैवाहिक जीवन पर भी इसका प्रभाव स्पष्ट है। नाइजीरियाई परामर्शदाताओं की रिपोर्ट के अनुसार, कई पत्नियाँ यौन इच्छा होने पर भी पहल करने से डरती हैं, क्योंकि अस्वीकृति या ‘सेक्स की दीवानी’ कहे जाने का भय होता है। दूसरी ओर, अपमानजनक विवाह में बच्चों की खातिर बने रहने की सलाह दी जाती है, हालाँकि शोध बताते हैं कि ऐसे घरों में पलने वाले बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएँ और भविष्य में वैवाहिक अस्थिरता की संभावना बढ़ जाती है।
समाधान की दिशा में, ‘मूवेम्बर’ जैसे अभियान और ऑनलाइन समुदाय पुरुषों को खुलकर बोलने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को प्रशिक्षण देने, कार्यस्थलों पर मानसिक स्वास्थ्य संस्कृति विकसित करने और सुलभ सेवाएँ उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है। अगला ठोस कदम राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों में पुरुष-विशिष्ट मानसिक स्वास्थ्य जाँच को शामिल करना और शराब के कैंसर जोखिम पर जन-जागरूकता अभियानों का विस्तार होगा।
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | +0.60 | aligned |
|---|---|---|
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | +0.10 | neutral |
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | −0.30 | critical |
| दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस | −0.50 | critical |
Habits decide the future; daily repetition is the path to success.
It cites a recognized authority (Frederick Matthias Alexander) to turn an opinion into a universal truth, without need for empirical evidence.
It does not consider the negative aspects of rigid habits, such as anxiety or addiction, highlighted by other perspectives.
Habits are cognitive tools to face uncertainty; repetition is a form of security.
It uses psychological explanations to turn seemingly trivial behaviors into adaptive strategies, making them acceptable and understandable.
It does not mention the possibility that these same habits could be symptoms of pathological anxiety, as highlighted by other sources.
Hypervigilance is an alarm signal; the brain constantly seeks dangers even in the absence of real threats.
It uses clinical terms like 'hypervigilance' to label common behaviors as pathological, creating a sense of urgency and need for intervention.
It does not consider the adaptive value of these habits, such as seeking safety, which other perspectives emphasize.
Gadgets cause addiction and sleep disorders in children; limiting use is essential for health.
It establishes a direct causal link between gadget use and specific symptoms, simplifying the complexity of childhood sleep disorders.
It does not explore other possible causes of sleep disorders, such as anxiety or environmental factors, which could reduce the responsibility of devices.
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