
ईरान युद्धविराम: ट्रंप की 'जीत' को दुनिया क्यों मान रही है अमेरिकी आत्मसमर्पण?
चार महीने के युद्ध के बाद हुआ समझौता यथास्थिति बहाल कर रहा है, जबकि ईरान को अरबों डॉलर मिलेंगे और परमाणु कार्यक्रम पर केवल अस्पष्ट वादा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ हुए युद्धविराम समझौते को ऐतिहासिक जीत बताया है, लेकिन वैश्विक प्रतिक्रिया इस दावे को लगभग एकमत से खारिज कर रही है। चार महीने तक चले सैन्य संघर्ष के बाद जो डेढ़ पन्ने का गोपनीय दस्तावेज़ तैयार हुआ है, उसके विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, फिर भी मोटे तौर पर यह स्पष्ट है कि समझौता होर्मुज़ जलडमरूमध्य को टैंकरों के लिए फिर से खोल देगा और दोनों पक्षों को उसी बिंदु पर ले आएगा जहाँ से युद्ध शुरू हुआ था। अमेरिकी मीडिया में इसे 'ट्रंप की हार' करार दिया जा रहा है, जबकि यूरोपीय और रूसी विश्लेषण भी इस युद्ध को बेहद असफल और बिना किसी ठोस राजनीतिक उपलब्धि के समाप्त होता देख रहे हैं।
अमेरिकी घरेलू राजनीति में इस समझौते ने गहरी नाराज़गी पैदा की है। रिपब्लिकन पार्टी के कट्टरपंथी और नव-रूढ़िवादी समर्थक, जिन्होंने युद्ध की शुरुआत का उत्साहपूर्वक स्वागत किया था, अब इसे एक पीछे हटने वाला कदम मान रहे हैं। उनका तर्क है कि प्रशासन ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने या तेहरान पर निर्णायक दबाव बनाने के बजाय केवल एक अस्थायी संघर्षविराम हासिल किया है। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने भी इस समझौते को अमेरिकी शक्ति के प्रदर्शन के बजाय एक चेहरा बचाने वाली वापसी के रूप में चित्रित किया है, जिसमें सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर यह युद्ध किस उद्देश्य से लड़ा गया।
यूरोपीय और रूसी परिप्रेक्ष्य इस धारणा को और पुख्ता करते हैं कि अमेरिका अपने लक्ष्यों में विफल रहा। स्वीडिश मीडिया ने पूरे सैन्य अभियान को 'अत्यंत असफल' बताते हुए रेखांकित किया है कि ईरान ने परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर वही अस्पष्ट आश्वासन दिया है जो पहले भी कई बार दिया जा चुका है, जबकि अमेरिका को ईरान की जब्त संपत्तियों के अरबों डॉलर जारी करने और संभवतः एक नए पुनर्निर्माण कोष में अतिरिक्त भुगतान करने पर सहमत होना पड़ा है। रूसी विश्लेषण सीधे तौर पर सवाल उठाता है कि क्या ट्रंप युद्ध हार गए, क्योंकि अमेरिका न तो कोई राजनीतिक लक्ष्य हासिल कर सका, न ईरान पर प्रभाव के नए साधन जुटा पाया, और न ही क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ सका।
भारत और दक्षिण एशिया के लिए इस घटनाक्रम के मिले-जुले आयाम हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य के खुलने से वैश्विक तेल आपूर्ति को स्थिरता मिलेगी, जो भारत जैसे बड़े आयातक के लिए ऊर्जा सुरक्षा और मूल्य स्थिरता की दृष्टि से राहत की बात है। हालाँकि, अमेरिकी साख को पहुँची क्षति और ईरान को मिली वित्तीय रियायतें क्षेत्रीय भू-राजनीति में नई अनिश्चितता पैदा कर सकती हैं। भारत ने परंपरागत रूप से अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे हैं—चाबहार बंदरगाह विकास से लेकर ईरानी तेल आयात तक—और अब उसे ऐसे माहौल में अपनी कूटनीति को और सावधानी से आगे बढ़ाना होगा जहाँ अमेरिकी प्रतिबद्धताओं पर प्रश्नचिह्न लग चुका है।
आगे की राह साफ नहीं है। अगले साठ दिनों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम के भविष्य पर बातचीत होनी है, लेकिन तेहरान की ओर से अब तक केवल अस्पष्ट वादे ही मिले हैं। यदि यह प्रक्रिया किसी ठोस स्थायी समझौते में नहीं बदलती, तो वर्तमान युद्धविराम महज एक महँगा अंतराल साबित हो सकता है, जिसके बाद तनाव फिर से भड़कने का खतरा बना रहेगा। वैश्विक नजरिया अभी से इस समझौते को अमेरिकी आत्मसमर्पण के रूप में देख रहा है—यह धारणा वाशिंगटन की भविष्य की कूटनीतिक हैसियत को कमजोर कर सकती है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी उसके सहयोगियों के मन में संदेह पैदा कर सकती है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ईरान के साथ गुप्त समझौते की ट्रम्प के अपने रिपब्लिकन सहयोगियों और मीडिया ने कड़ी आलोचना की, जो इसे एक ऐसा समर्पण मानते हैं जो अमेरिकी प्रभाव को कमजोर करता है। ट्रम्प के जीत के दावों के बावजूद, समझौते की गोपनीयता और बताई गई शर्तें चिंता और संदेह पैदा करती हैं, कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि इतना अनुकूल सौदा छिपाया क्यों जा रहा है।
ईरान में युद्ध को एक विनाशकारी विफलता के रूप में चित्रित किया गया है, और ट्रम्प द्वारा प्रचारित शांति समझौता इस बात पर बहुत कम स्पष्टता देता है कि वास्तव में क्या हासिल हुआ। दुनिया यह सोचकर हैरान है कि कैसे एक संघर्ष जिसने कथित तौर पर बंकर-बस्टर बमों से ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को बेअसर कर दिया था, अब एक गुप्त समझौते में बदल गया है जो जितना हासिल करता है उससे अधिक रियायत देता प्रतीत होता है।
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