
कफ सिरप पर डॉक्टरी पर्चा अनिवार्य: बच्चों की मौतों के बाद भारत का सख्त कदम
केंद्र सरकार ने ड्रग्स रूल्स में संशोधन कर सिरप दवाओं की ओवर-द-काउंटर बिक्री पर रोक लगा दी, जिससे ग्रामीण इलाकों में भी लाइसेंसी फार्मेसी से पर्चे पर ही खरीद संभव होगी।
भारत सरकार ने मंगलवार को एक ऐतिहासिक नियामक कदम उठाते हुए कफ सिरप समेत सभी सिरप-आधारित दवाओं की बिना डॉक्टरी पर्चे के बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 1945 के ड्रग्स रूल्स में पांचवां संशोधन अधिसूचित कर ‘सिरप’ शब्द को शेड्यूल के की छूट सूची से हटा दिया, जिसके तहत अब तक कफ सिरप, लोज़ेंज और गोलियां बिना पर्चे बेची जा सकती थीं। यह फैसला मध्य प्रदेश और राजस्थान में पिछले वर्ष दूषित कफ सिरप पीने से 20 से अधिक बच्चों की मौत के मामलों की पृष्ठभूमि में आया है, जिसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी भारत की दवा सुरक्षा नियमन प्रणाली पर गहरी चिंता जताई थी।
नए नियमों के तहत अब उपभोक्ताओं को किसी भी सिरप दवा की खरीद के लिए वैध डॉक्टरी पर्चा दिखाना अनिवार्य होगा। यह बदलाव सिर्फ शहरी मेडिकल स्टोर तक सीमित नहीं है; संशोधन ने ग्रामीण क्षेत्रों में एक हजार से कम आबादी वाले गांवों में भी बिना लाइसेंस के सिरप बिक्री की अनुमति समाप्त कर दी है। अब ऐसे इलाकों में भी सिरप का वितरण और विक्रय केवल लाइसेंस प्राप्त फार्मेसियों के माध्यम से होगा, जो ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 का पूर्ण अनुपालन करती हों। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि यह संशोधन सिरप फॉर्मूलेशन पर नियामकीय निगरानी मजबूत करने और छूट ढांचे को समकालीन सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने के लिए किया गया है।
चिकित्सा जगत ने इस पहल का स्वागत किया है। फोर्टिस अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विवेक जैन का मानना है कि कफ सिरप एक विशिष्ट औषधि है जिसका उपयोग केवल चिकित्सकीय आवश्यकता और सही खुराक पर होना चाहिए। बिना पर्चे के बिक्री से गलत खुराक, अंतर्निहित बीमारी का दमन, अन्य दवाओं के साथ प्रतिक्रिया और किशोरों में आकस्मिक विषाक्तता का खतरा बढ़ जाता था। विशेषज्ञों ने इसे बच्चों की सुरक्षा की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया, जो भविष्य में दूषित या अनुचित सिरप सेवन से होने वाली त्रासदियों को रोक सकता है।
यह नियामक सख्ती दक्षिण एशिया और वैश्विक दवा आपूर्ति श्रृंखला के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत देती है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा निर्यातक है और चीन के साथ मिलकर कई देशों के लिए सक्रिय दवा सामग्री का प्रमुख स्रोत है। ईरान के स्वास्थ्य मंत्री मोहम्मद रज़ा ज़फ़रग़ंदी ने हाल ही में तेहरान में संवाददाताओं को बताया कि समुद्री नाकेबंदी जैसी बाधाओं के बावजूद भारत और चीन से रेल व हवाई मार्गों के जरिए कच्चे माल की आपूर्ति बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है। भारत का यह कड़ा कदम न केवल घरेलू रोगियों की सुरक्षा बढ़ाएगा, बल्कि निर्यात होने वाली सिरप दवाओं की गुणवत्ता पर भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारतीय उत्पादों पर भरोसा पुनर्स्थापित होगा।
आगे की राह चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि लाखों छोटे गांवों में लाइसेंस प्राप्त फार्मेसियों की उपलब्धता सीमित है और पर्चा अनिवार्यता से ग्रामीण मरीजों को समय पर दवा मिलने में कठिनाई हो सकती है। सरकार को अब दवा वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करने, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर टेलीमेडिसिन और ई-प्रिस्क्रिप्शन जैसे विकल्पों को बढ़ावा देने की आवश्यकता होगी। साथ ही, नियामकों को विनिर्माण इकाइयों की निगरानी और गुणवत्ता जांच को और कड़ा करना होगा ताकि दूषित सिरप की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। यह संशोधन भारत की दवा नीति में एक युगांतरकारी बदलाव है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य को व्यावसायिक सुविधा से ऊपर रखने की मंशा को रेखांकित करता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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भारत ने दूषित कफ सिरप से बच्चों की मौत के बाद ओवर-द-काउंटर कफ सिरप की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया और डॉक्टर का पर्चा अनिवार्य कर दिया। डब्ल्यूएचओ ने पहले ही भारत के दवा सुरक्षा नियमों पर गहरी चिंता जताई थी। इस कदम का उद्देश्य आगे की त्रासदियों को रोकना है।
भारत सरकार ने सिरप दवाओं की ओवर-द-काउंटर बिक्री समाप्त करने के लिए दवा नियमों में संशोधन किया और डॉक्टर का पर्चा अनिवार्य कर दिया। यह निर्णय दूषित कफ सिरप से बच्चों की मौतों की श्रृंखला के बाद आया है और डॉक्टरों ने सख्त नियमों का जीवन रक्षक उपाय के रूप में स्वागत किया है।
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