
व्यंग्य का शतायु: मेल ब्रूक्स और हँसी की वह राजनीति जो सत्ता से टकराती है
मेल ब्रूक्स, जिन्होंने व्यंग्य से हिटलर तक को हँसी का पात्र बनाया, 100 वर्ष के हुए; उनकी कला सिखाती है कि हास्य ही सबसे बड़ा प्रतिरोध है।
एक पार्टी का दृश्य है—मेल ब्रूक्स अपनी एक मशहूर कॉमेडी मोनोलॉग पेश कर रहे हैं, ठहाकों की गूँज के बीच अचानक वह बीच वाक्य में ही चुप हो जाते हैं, फिर बिना कुछ कहे कमरे से बाहर निकल जाते हैं और सीधे पार्टी ही छोड़ देते हैं। वजह? एक पंचलाइन जो उन्हें कभी मिली ही नहीं। यह सिर्फ़ एक सनकी किस्सा नहीं, बल्कि उस कलाकार की रचनात्मक बेचैनी की झलक है जो आज 100 वर्ष का हो गया है। मेलविन जेम्स कामिंस्की उर्फ़ मेल ब्रूक्स, जिन्होंने आधुनिक हास्य की परिभाषा गढ़ी, एक शताब्दी पूरी कर चुके हैं—और उनकी कला का अंदाज़ आज भी उतना ही निडर है जितना 1960 के दशक में था।
1926 में ब्रुकलिन के एक ग़रीब यहूदी परिवार में जन्मे ब्रूक्स ने बचपन में ही पिता खो दिया और महामंदी के दिनों में बड़े हुए। द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिकी सेना में भर्ती होकर यूरोप गए, जहाँ नाज़ी बर्बरता और होलोकॉस्ट की भयावहता को नज़दीक से देखा। युद्ध के बाद उन्होंने हँसाने का पेशा चुना—पहले कैबरे में, फिर टेलीविज़न पर सिड सीज़र के ‘योर शो ऑफ़ शोज़’ के लेखक के रूप में। इसी दौरान उन्होंने अपना वह विश्वास पुख़्ता किया जिसे बाद में बांग्लादेशी मीडिया ने रेखांकित किया: “एक तानाशाह के खिलाफ़ भाषण देकर उसे हराया नहीं जा सकता, लेकिन अगर लोगों को उस पर हँसाया जाए तो उसकी ताकत तोड़ी जा सकती है।” यही सोच उनकी पहली फ़िल्म ‘द प्रोड्यूसर्स’ (1967) की बुनियाद बनी, जिसमें दो ठग निर्माता जानबूझकर हिटलर पर बना संगीतमय नाटक फ्लॉप करना चाहते हैं, लेकिन वह हिट हो जाता है। इस फ़िल्म ने ब्रूक्स को सर्वश्रेष्ठ मूल पटकथा का ऑस्कर दिलाया और व्यंग्य को एक ऐसी धार दी जो हर तानाशाही प्रवृत्ति के लिए चुनौती बन गई।
ब्रूक्स की शैली किसी एक विधा में नहीं बँधती। वे हॉरर (‘यंग फ़्रैंकनस्टाइन’), वेस्टर्न (‘ब्लेज़िंग सैडल्स’), साइंस-फ़िक्शन (‘स्पेसबॉल्स’) और ऐतिहासिक गाथा (‘हिस्ट्री ऑफ़ द वर्ल्ड, पार्ट I’) जैसी स्थापित शैलियों की जड़ें उखाड़ते हैं और हर बार दर्शकों की अपेक्षाओं को उलट देते हैं। मैक्सिको के नाट्य निर्माता एलेजांद्रो गो उन्हें “चार्ली चैपलिन जैसा मनोरंजन उद्योग का विशालकाय” बताते हैं, जबकि उनके सहयोगी गीयेर्मो वीचर्स कहते हैं कि “मेल का अपना एक ख़ास लहज़ा है, वे ऐतिहासिक घटनाओं और क्लासिक कहानियों को लेकर ऐसी कॉमेडी रचते हैं जो कभी किसी का अपमान नहीं करती, बल्कि सोचने पर मजबूर करती है।” यही वजह है कि ब्रूक्स उन चुनिंदा 22 कलाकारों में हैं जिन्होंने एमी, ग्रैमी, ऑस्कर और टोनी—चारों प्रमुख अमेरिकी मनोरंजन पुरस्कार—जीतकर ‘ईगॉट’ का ख़िताब हासिल किया है।
भारत जैसे विविधतापूर्ण और लोकतांत्रिक देश में भी ब्रूक्स की व्यंग्य-परंपरा गूँजती है, जहाँ राजनीतिक हास्य और नुक्कड़ नाटक सत्ता पर प्रहार करते रहे हैं। एक इटालियन साक्षात्कार में उन्होंने कहा था: “मैं 60 की उम्र के बाद मौत के बारे में सोचना छोड़ चुका हूँ। मुझे जीना पसंद है और मैं जितना संभव हो उतना लंबा जीना चाहता हूँ।” सौ साल की उम्र में भी वे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। हाल ही में उन्होंने अपने हज़ारों निजी दस्तावेज़ और तस्वीरें जेम्सटाउन के नेशनल कॉमेडी सेंटर को दान की हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस बात का अध्ययन कर सकें कि हँसी कैसे अँधेरे के ख़िलाफ़ सबसे कारगर हथियार बन सकती है। ब्रूक्स का जीवन-दर्शन शायद उनके अपने ही एक वाक्य में समाया है: “अगर आप हँस सकते हैं, तो कोई आपको मार नहीं सकता।”
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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मेल ब्रूक्स को गोगोल जैसे कलाकार के रूप में देखा गया है जिनकी अतार्किक हास्य कला मानवीय स्थिति की गहराइयों में जाती है। गोगोल की 'डेड सोल्स' के बार-बार संदर्भ उनके भीतर के भावुक अधिकतमवादी को दर्शाते हैं। विश्लेषण से पता चलता है कि पैरोडी के पीछे एक गंभीर साहित्यिक विरासत छिपी है।
मेल ब्रूक्स को अत्याचार के खिलाफ हथियार के रूप में कॉमेडी का उपयोग करने के लिए सराहा जाता है, खासकर हिटलर को हंसी का पात्र बनाकर। यह विश्वास कि व्यंग्य किसी तानाशाह की शक्ति को तोड़ सकता है, प्रतिरोध के एक लचीले रूप के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कहानी उनके शताब्दी करियर को हास्य की राजनीतिक ताकत के सबक के रूप में चित्रित करती है।
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