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स्वास्थ्य और विज्ञानसोमवार, 15 जून 2026

बढ़ती उम्र में प्रोटीन की नई पुकार: स्वीडन से लेकर दक्षिण एशिया तक आहार विशेषज्ञों की एक राय

उम्र चाहे तीस की हो या पैंसठ की, त्वचा की जवानी से लेकर मांसपेशियों की मजबूती तक – प्रोटीन और सोच-समझकर चुने गए पोषक तत्व अब हर भौगोलिक सलाह के केंद्र में हैं।

स्वीडन की राष्ट्रीय खाद्य एजेंसी ने हाल ही में 65 साल से ऊपर के लोगों के लिए आहार संबंधी नई सिफारिशें जारी की हैं, जिनमें पहली बार प्रोटीन का सेवन थोड़ा बढ़ाने और 75 वर्ष से अधिक उम्र वालों को विटामिन डी का पूरक लेने की स्पष्ट सलाह दी गई है। स्टॉकहोम की जन-स्वास्थ्य पोषण विशेषज्ञ सुज़ाना कुगलबर्ग का कहना है कि छोटे बदलाव भी बड़ा फ़र्क डालते हैं, क्योंकि नए प्रमाण बताते हैं कि अच्छी खान-पान की आदतें डिमेंशिया के जोखिम को भी कम कर सकती हैं। यह क़दम यूरोप में वृद्धावस्था की पोषण-नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहाँ अब केवल कैलोरी नहीं, बल्कि प्रोटीन की गुणवत्ता और समय पर ज़ोर दिया जा रहा है।

इस वैश्विक सोच की गूँज दक्षिण एशिया से भी सुनाई देती है। बांग्लादेश के प्रोथोम आलो में प्रकाशित विशेषज्ञ सलाह के अनुसार, तीस की उम्र पार करने से पहले ही अगर कुछ आदतें अपना ली जाएँ तो त्वचा लंबे समय तक जवान बनी रह सकती है। इनमें सबसे ऊपर है प्रतिदिन शरीर के प्रति किलोग्राम वज़न पर कम से कम एक ग्राम प्रोटीन लेना, जो न केवल मांसपेशियों को मज़बूत रखता है बल्कि कोलेजन निर्माण के ज़रिए त्वचा की मरम्मत कर उसे मुलायम बनाता है। साथ ही रात की त्वचा-देखभाल में रेटिनॉल या उसके प्राकृतिक विकल्प बाकुचीऑल युक्त सीरम लगाने की सिफारिश की गई है, जो कोशिकाओं का पुनर्निर्माण कर महीन रेखाएँ मिटाते हैं। यह दृष्टिकोण भारतीय उपमहाद्वीप के शहरी युवाओं के लिए ख़ासा प्रासंगिक है, जहाँ प्रोटीन की कमी वाले शाकाहारी भोजन और प्रदूषण का त्वचा पर दोहरा प्रभाव पड़ता है।

लैटिन अमेरिका से आ रही आवाज़ प्रोटीन के चयन को और परिष्कृत करती है। अर्जेंटीना के दीर्घायु विशेषज्ञ डॉ. डेविड सेस्पेडेस इस बात पर ज़ोर देते हैं कि चर्बी घटाने के लिए सभी प्रोटीन एक-समान कारगर नहीं होते। उनका सुझाव है कि उच्च प्रोटीन-घनत्व, भरपूर तृप्ति प्रभाव और सूजन-रोधी गुणों वाले स्रोतों को तरजीह दी जाए, क्योंकि कई खाद्य पदार्थ प्रोटीन के साथ छिपी हुई वसा और कैलोरी भी लाद देते हैं जो ऊर्जा की कमी के लक्ष्य को विफल कर सकती हैं। यह लैटिन अमेरिका के उस बदलते नज़रिए को दर्शाता है जो परंपरागत मांसाहार के बावजूद गुणवत्ता-केंद्रित चयन पर बल दे रहा है।

एशिया के अन्य हिस्सों से भी पूरक आहार और संपूर्ण भोजन को लेकर नए सिरे से सोच उभर रही है। इंडोनेशिया में 30 की उम्र पार कर चुके लोगों के लिए चयापचय की धीमी गति, तनाव और शरीर की घटती पुनर्निर्माण क्षमता को देखते हुए प्राकृतिक चिकित्सक माइकल मरे जैसे विशेषज्ञ पूरकों की भूमिका को रेखांकित कर रहे हैं, हालाँकि वे इसे संतुलित आहार का विकल्प नहीं मानते। इसके विपरीत, ईरान से आए एक नज़रिए में सात ऐसे खाद्य समूहों की पहचान की गई है जो कृत्रिम मल्टीविटामिन की गोलियों की जगह ले सकते हैं। इनमें पालक, केल और चुकंदर जैसी हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ शामिल हैं, जिनमें मौजूद प्राकृतिक फोलेट सप्लीमेंट के सिंथेटिक फोलिक एसिड से बेहतर अवशोषित होता है, साथ ही विटामिन ए, सी, के और फाइबर भी मिलता है। यह पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र की उस पारंपरिक समझ से मेल खाता है जो दवा से पहले रसोई को औषधालय मानती है।

इन सबको एक सूत्र में पिरोएँ तो तस्वीर साफ़ हो जाती है: दुनिया भर में आयु-विशिष्ट पोषण की सोच अब प्रोटीन और अवशोषण-क्षमता के इर्द-गिर्द घूम रही है। चाहे वह स्वीडन के वरिष्ठ नागरिक हों जिनकी भूख कम हो गई है, दक्षिण एशिया के युवा त्वचा की लोच बचाना चाहते हों, या लैटिन अमेरिका के लोग चर्बी से मुक्ति चाह रहे हों – सबके लिए प्रोटीन की मात्रा और गुणवत्ता एक साझा सबक है। भारत जैसे देश में, जहाँ बुज़ुर्गों की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है और शाकाहार का चलन गहरा है, यह वैश्विक रुझान दालों, मिलेट्स और डेयरी उत्पादों की पुनर्खोज का अवसर बन सकता है, साथ ही यह भी सिखाता है कि गोली नहीं, भोजन ही बेहतर दवा है।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 4 भाषाएँ

48%
लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa europea continentaleStampa indiana e sudasiatica
Stampa europea continentale/ nordica
pragmatismodistacco

स्वीडिश खाद्य एजेंसी ने 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए आहार संबंधी सलाह को अद्यतन किया है, जिसमें थोड़ा अधिक प्रोटीन और 75 वर्ष की आयु से विटामिन डी की खुराक लेने की सिफारिश की गई है। सार्वजनिक स्वास्थ्य पोषण विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि छोटे-छोटे बदलाव भी डिमेंशिया के जोखिम को कम कर सकते हैं और कम भूख वाले वृद्धों को शारीरिक क्षमता बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

Stampa indiana e sudasiatica
urgenzapaternalismo

त्वचा विशेषज्ञ और आहार विशेषज्ञ शरीर के प्रति किलोग्राम वजन पर एक ग्राम प्रोटीन का दैनिक सेवन करने की सलाह देते हैं, जो केवल मांसपेशियों के लिए नहीं बल्कि कोलेजन बनाने और त्वचा को चिकनी व चमकदार बनाए रखने के लिए आवश्यक है। उनका आग्रह है कि त्वचा की जवानी और कसाव बनाए रखने के लिए बुढ़ापा रोधी आदतें तीस वर्ष से पहले ही अपना लेनी चाहिए।

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बढ़ती उम्र में प्रोटीन की नई पुकार: स्वीडन से लेकर दक्षिण एशिया तक आहार विशेषज्ञों की एक राय

उम्र चाहे तीस की हो या पैंसठ की, त्वचा की जवानी से लेकर मांसपेशियों की मजबूती तक – प्रोटीन और सोच-समझकर चुने गए पोषक तत्व अब हर भौगोलिक सलाह के केंद्र में हैं।

स्वीडन की राष्ट्रीय खाद्य एजेंसी ने हाल ही में 65 साल से ऊपर के लोगों के लिए आहार संबंधी नई सिफारिशें जारी की हैं, जिनमें पहली बार प्रोटीन का सेवन थोड़ा बढ़ाने और 75 वर्ष से अधिक उम्र वालों को विटामिन डी का पूरक लेने की स्पष्ट सलाह दी गई है। स्टॉकहोम की जन-स्वास्थ्य पोषण विशेषज्ञ सुज़ाना कुगलबर्ग का कहना है कि छोटे बदलाव भी बड़ा फ़र्क डालते हैं, क्योंकि नए प्रमाण बताते हैं कि अच्छी खान-पान की आदतें डिमेंशिया के जोखिम को भी कम कर सकती हैं। यह क़दम यूरोप में वृद्धावस्था की पोषण-नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहाँ अब केवल कैलोरी नहीं, बल्कि प्रोटीन की गुणवत्ता और समय पर ज़ोर दिया जा रहा है।

इस वैश्विक सोच की गूँज दक्षिण एशिया से भी सुनाई देती है। बांग्लादेश के प्रोथोम आलो में प्रकाशित विशेषज्ञ सलाह के अनुसार, तीस की उम्र पार करने से पहले ही अगर कुछ आदतें अपना ली जाएँ तो त्वचा लंबे समय तक जवान बनी रह सकती है। इनमें सबसे ऊपर है प्रतिदिन शरीर के प्रति किलोग्राम वज़न पर कम से कम एक ग्राम प्रोटीन लेना, जो न केवल मांसपेशियों को मज़बूत रखता है बल्कि कोलेजन निर्माण के ज़रिए त्वचा की मरम्मत कर उसे मुलायम बनाता है। साथ ही रात की त्वचा-देखभाल में रेटिनॉल या उसके प्राकृतिक विकल्प बाकुचीऑल युक्त सीरम लगाने की सिफारिश की गई है, जो कोशिकाओं का पुनर्निर्माण कर महीन रेखाएँ मिटाते हैं। यह दृष्टिकोण भारतीय उपमहाद्वीप के शहरी युवाओं के लिए ख़ासा प्रासंगिक है, जहाँ प्रोटीन की कमी वाले शाकाहारी भोजन और प्रदूषण का त्वचा पर दोहरा प्रभाव पड़ता है।

लैटिन अमेरिका से आ रही आवाज़ प्रोटीन के चयन को और परिष्कृत करती है। अर्जेंटीना के दीर्घायु विशेषज्ञ डॉ. डेविड सेस्पेडेस इस बात पर ज़ोर देते हैं कि चर्बी घटाने के लिए सभी प्रोटीन एक-समान कारगर नहीं होते। उनका सुझाव है कि उच्च प्रोटीन-घनत्व, भरपूर तृप्ति प्रभाव और सूजन-रोधी गुणों वाले स्रोतों को तरजीह दी जाए, क्योंकि कई खाद्य पदार्थ प्रोटीन के साथ छिपी हुई वसा और कैलोरी भी लाद देते हैं जो ऊर्जा की कमी के लक्ष्य को विफल कर सकती हैं। यह लैटिन अमेरिका के उस बदलते नज़रिए को दर्शाता है जो परंपरागत मांसाहार के बावजूद गुणवत्ता-केंद्रित चयन पर बल दे रहा है।

एशिया के अन्य हिस्सों से भी पूरक आहार और संपूर्ण भोजन को लेकर नए सिरे से सोच उभर रही है। इंडोनेशिया में 30 की उम्र पार कर चुके लोगों के लिए चयापचय की धीमी गति, तनाव और शरीर की घटती पुनर्निर्माण क्षमता को देखते हुए प्राकृतिक चिकित्सक माइकल मरे जैसे विशेषज्ञ पूरकों की भूमिका को रेखांकित कर रहे हैं, हालाँकि वे इसे संतुलित आहार का विकल्प नहीं मानते। इसके विपरीत, ईरान से आए एक नज़रिए में सात ऐसे खाद्य समूहों की पहचान की गई है जो कृत्रिम मल्टीविटामिन की गोलियों की जगह ले सकते हैं। इनमें पालक, केल और चुकंदर जैसी हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ शामिल हैं, जिनमें मौजूद प्राकृतिक फोलेट सप्लीमेंट के सिंथेटिक फोलिक एसिड से बेहतर अवशोषित होता है, साथ ही विटामिन ए, सी, के और फाइबर भी मिलता है। यह पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र की उस पारंपरिक समझ से मेल खाता है जो दवा से पहले रसोई को औषधालय मानती है।

इन सबको एक सूत्र में पिरोएँ तो तस्वीर साफ़ हो जाती है: दुनिया भर में आयु-विशिष्ट पोषण की सोच अब प्रोटीन और अवशोषण-क्षमता के इर्द-गिर्द घूम रही है। चाहे वह स्वीडन के वरिष्ठ नागरिक हों जिनकी भूख कम हो गई है, दक्षिण एशिया के युवा त्वचा की लोच बचाना चाहते हों, या लैटिन अमेरिका के लोग चर्बी से मुक्ति चाह रहे हों – सबके लिए प्रोटीन की मात्रा और गुणवत्ता एक साझा सबक है। भारत जैसे देश में, जहाँ बुज़ुर्गों की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है और शाकाहार का चलन गहरा है, यह वैश्विक रुझान दालों, मिलेट्स और डेयरी उत्पादों की पुनर्खोज का अवसर बन सकता है, साथ ही यह भी सिखाता है कि गोली नहीं, भोजन ही बेहतर दवा है।

स्रोतों में मतभेद

स्वास्थ्य और विज्ञान · 7 स्रोत · 4 भाषाएँ

48%मध्यम

स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

समर्थक40%
न्यूनत्र60%

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 4 भाषाएँ

लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
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Stampa europea continentale/ nordica
pragmatismodistacco

स्वीडिश खाद्य एजेंसी ने 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए आहार संबंधी सलाह को अद्यतन किया है, जिसमें थोड़ा अधिक प्रोटीन और 75 वर्ष की आयु से विटामिन डी की खुराक लेने की सिफारिश की गई है। सार्वजनिक स्वास्थ्य पोषण विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि छोटे-छोटे बदलाव भी डिमेंशिया के जोखिम को कम कर सकते हैं और कम भूख वाले वृद्धों को शारीरिक क्षमता बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

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urgenzapaternalismo

त्वचा विशेषज्ञ और आहार विशेषज्ञ शरीर के प्रति किलोग्राम वजन पर एक ग्राम प्रोटीन का दैनिक सेवन करने की सलाह देते हैं, जो केवल मांसपेशियों के लिए नहीं बल्कि कोलेजन बनाने और त्वचा को चिकनी व चमकदार बनाए रखने के लिए आवश्यक है। उनका आग्रह है कि त्वचा की जवानी और कसाव बनाए रखने के लिए बुढ़ापा रोधी आदतें तीस वर्ष से पहले ही अपना लेनी चाहिए।

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