
एक 17 साल का 'प्रधानाचार्य' और आज की खोई पीढ़ी: सपनों की कक्षा में अनुपस्थित युवा
1966 में स्टॉकहोम की एक स्कूल असेंबली से लेकर 2025 में परीक्षा हॉल के खाली बेंचों तक, दुनिया भर के नौजवान शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के अनोखे संकट से जूझ रहे हैं।
1966 का स्टॉकहोम। शिक्षक हड़ताल पर हैं और ओस्ट्रा रियल जिम्नेजियम में 17 वर्षीय कार्ल बिल्ट ने खुद को कार्यवाहक प्रधानाचार्य घोषित कर दिया है। पुरानी फिल्म में यह किशोर अपने हमउम्रों की भीड़ को अनुशासित करता दिखता है—'कुछ छात्र दूसरों को भड़का रहे हैं कि स्कूल छोड़ दो, पर कानून कहता है कि हमें स्कूल में रहना है।' आत्मविश्वास से लबरेज वह चेहरा आज के युवाओं के सोशल मीडिया मीम्स से बिल्कुल उलट है, जहाँ एक युवक लंबी बेंच पर बैठा कहता है, 'एआई तुम्हारी नौकरी छीन लेगी'—और मिलता है व्यंग्य भरा जवाब, 'कौन सी नौकरी?'
स्विट्ज़रलैंड से आए आँकड़े इस मीम की तस्दीक करते हैं: जॉबक्लाउड के अनुसार, 2022 में जनरेटिव एआई के आने के बाद से एंट्री-लेवल जॉब के विज्ञापन 32 प्रतिशत कम हो गए हैं। वहीं अर्जेंटीना की प्राइमरी स्कूलों में 2025 की 'अप्रेन्देर' परीक्षा ने रिकॉर्ड 84 प्रतिशत छात्रों की भागीदारी दर्ज की—यह कोरोना महामारी के दौर में पहली कक्षा शुरू करने वाली पीढ़ी है। भाषा में 76.9 प्रतिशत ने संतोषजनक या उन्नत स्तर हासिल किया, जो एक दशक का सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन एक अंतरराष्ट्रीय तुलना चौंकाती है: अर्जेंटीना के सबसे धनी तबके के छात्र भी विकसित देशों के समान आर्थिक स्तर के बच्चों से पीछे हैं।
ढाका बोर्ड ने गत वर्ष उच्च माध्यमिक परीक्षा से गैरहाजिर 36 प्रतिशत छात्रों पर अध्ययन किया तो पाया कि अनुपस्थित लड़कियों में से 41 प्रतिशत की शादी हो चुकी थी—बाल विवाह और गरीबी सबसे बड़ी वजहें। बांग्लादेश का यह आँकड़ा पूरी शिक्षा व्यवस्था के 'व्यावसायीकरण और राजनीतिकरण' की ओर इशारा करता है, जैसा कि स्थानीय संपादकीय में कहा गया। इंडोनेशिया में, 2025-26 के मुफ्त स्वास्थ्य जाँच कार्यक्रम में 70 लाख बच्चों में से लगभग 10 प्रतिशत में चिंता या अवसाद के लक्षण मिले। द लैंसेट की 'ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज' स्टडी बताती है कि 1990 के दशक से मानसिक विकार दोगुने होकर अब एक अरब लोगों को प्रभावित कर रहे हैं, और 15-19 वर्ष की आयु सबसे अधिक संवेदनशील हो गई है, खासकर लड़कियों के लिए।
स्वीडन के स्कूल सुधारों की एक दिलचस्प कहानी है। 2011 के बाद से व्यावसायिक पाठ्यक्रम चुनने वालों की संख्या 39 प्रतिशत पहुँच गई है, जो सर्वाधिक है। हर्नोसैंड का एक छात्र कहता है, 'हर जगह निर्माण चल रहा है, फर्में घूमती रहती हैं... सीधे नौकरी मिलने की पूरी संभावना है।' यह व्यावहारिकता दरअसल एआई द्वारा पारंपरिक शैक्षिक नौकरियों के क्षरण की प्रतिक्रिया है। सेंट गैलन विश्वविद्यालय के शोधकर्ता हैंस रुसिनेक कहते हैं, 'मैं इस पीढ़ी से ईर्ष्या नहीं करता जिसे आज के दौर में श्रम बाजार में प्रवेश करना पड़ रहा है।'
1966 के उस स्कूल प्रांगण में खड़ा कार्ल बिल्ट शायद ही समझ पाता कि छह दशक बाद, उसकी ही तरह के जुझारू किशोर एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहाँ परीक्षा हॉल की खाली बेंचें और थकी हुई आँखों में सिमटे सपने मानो एक खोई हुई पीढ़ी की गवाही दे रहे हैं।
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | −0.30 | critical |
|---|---|---|
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | +0.10 | neutral |
The lack of guarantees for young people is the failure of a state that promises and does not deliver.
Responsibility for youth precarity is attributed to the state, turning a social issue into a political debt.
No mention of individual choices or global dynamics, nor of private initiatives that could mitigate the crisis.
The numbers speak: young people have fewer protections, but this is a long-standing structural phenomenon.
Data are used to de-escalate urgency, normalizing precarity as a historical trend rather than a crisis.
Inequalities within the generation and differences between European countries are not discussed.
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