
ईरान का सख्त रुख: बैलिस्टिक मिसाइलें केवल दागने के लिए, सौदेबाजी के लिए नहीं
अमेरिका-ईरान युद्धविराम समझौते के बाद तेहरान ने मिसाइल कार्यक्रम को वार्ता से बाहर रखने की घोषणा की, जबकि ट्रंप ने क्षेत्रीय संतुलन का हवाला देते हुए इस पर सहमति जताई।
अमेरिका और ईरान के बीच हस्ताक्षरित एक नए रूपरेखा समझौते ने फरवरी में भड़के क्षेत्रीय युद्ध पर विराम तो लगा दिया, लेकिन इसके साथ ही बैलिस्टिक मिसाइलों को लेकर एक गहरी कूटनीतिक खाई भी उजागर हो गई है। समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होते ही तेहरान ने स्पष्ट कर दिया कि उसका मिसाइल कार्यक्रम किसी भी भावी वार्ता का हिस्सा नहीं होगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने राज्य टेलीविजन पर दिए बयान में कहा, "हमारी मिसाइलें किसी से बातचीत का विषय बनना पसंद नहीं करतीं।" उन्होंने आगे कहा, "ईरानी मिसाइलें केवल दागने के लिए हैं, बातचीत के लिए नहीं।" यह कड़ा रुख उस समझौते के तुरंत बाद सामने आया, जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों में ढील पर विस्तृत वार्ता की रूपरेखा तय की गई है, लेकिन मिसाइल क्षमताओं का कोई जिक्र नहीं है।
दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस में जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल रखने पर सहमति जताई। उन्होंने कहा कि यदि सऊदी अरब, कतर और अन्य पड़ोसी देशों के पास ऐसी क्षमता है, तो ईरान को इससे वंचित रखना अनुचित होगा। ट्रंप ने मिसाइलों के प्रभाव को भी कम करके आंका, उनका कहना था कि "मिसाइलें केवल कुछ स्थानों को नुकसान पहुंचाती हैं।" यह रुख इज़रायल के लिए एक बड़ा झटका है, जो लगातार ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने की मांग करता रहा है। इज़रायल के लिए यह मुद्दा अस्तित्व से जुड़ा है, क्योंकि ईरान की मिसाइलें उसकी सीमा तक पहुंच सकती हैं।
यह समझौता फरवरी 2026 में अमेरिका और इज़रायल के संयुक्त हमलों से शुरू हुए क्षेत्रीय संघर्ष को समाप्त करता है। इसके तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर विस्तृत बातचीत और प्रतिबंधों में ढील का रास्ता खुलता है, लेकिन मिसाइल मुद्दे पर चुप्पी साध ली गई है। यह चुप्पी वाशिंगटन और तेहरान के बीच एक व्यावहारिक समझौते का संकेत देती है: परमाणु मुद्दे पर प्रगति के लिए मिसाइल कार्यक्रम को फिलहाल अलग रखा गया है। हालांकि, यह रणनीति इज़रायल और खाड़ी के कुछ अरब सहयोगियों के लिए चिंता का विषय है, जो ईरान की मिसाइल क्षमता को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा मानते हैं।
दक्षिण एशिया के संदर्भ में, यह घटनाक्रम भारत के लिए मिश्रित संकेत लेकर आया है। एक ओर, पश्चिम एशिया में युद्धविराम से ऊर्जा आपूर्ति और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा को लाभ होगा। दूसरी ओर, ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को मौन स्वीकृति मिलने से क्षेत्रीय हथियारों की होड़ को बढ़ावा मिल सकता है, जिसका असर दक्षिण एशिया के सुरक्षा संतुलन पर भी पड़ सकता है। भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह अपनी कूटनीतिक पहुंच का इस्तेमाल करते हुए ईरान और खाड़ी देशों के बीच विश्वास बहाली की प्रक्रिया को समर्थन दे, ताकि मिसाइल प्रतिस्पर्धा एक नए शीत युद्ध का रूप न ले ले।
आगे की राह में, परमाणु वार्ता की सफलता ही तय करेगी कि मिसाइल मुद्दे पर यह चुप्पी स्थायी होगी या भविष्य में टकराव का कारण बनेगी। तेहरान ने साफ कर दिया है कि उसकी रक्षा क्षमताएं किसी भी प्रक्रिया में चर्चा का विषय नहीं बनेंगी, जबकि ट्रंप प्रशासन फिलहाल तुलनात्मक संतुलन के तर्क से संतुष्ट दिखता है। लेकिन इज़रायल और उसके समर्थकों का दबाव आने वाले महीनों में इस समझौते की बुनियाद को हिला सकता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ट्रम्प अब कहते हैं कि ईरान के पास बैलिस्टिक मिसाइलें होनी चाहिए, जो उनके पहले के कड़े रुख से उलट है। इस बदलाव को बातचीत को आगे बढ़ाने की व्यावहारिक चाल माना जा रहा है, लेकिन इसने अमेरिकी नीति की निरंतरता पर संदेह पैदा कर दिया है।
ट्रम्प ने स्वीकार कर लिया है कि ईरान अपनी बैलिस्टिक मिसाइलें रख सकता है, जिससे इज़राइल निराश होकर 'अपनी उंगलियाँ चबा रहा है'। तेहरान ने दृढ़ता से कहा कि उसकी मिसाइलें केवल दागने के लिए हैं और उन पर कभी बातचीत नहीं होगी, इस समझौते को अपनी रक्षात्मक संप्रभुता की जीत बताया।
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