
रोसवेल की आंधी के बाद बिखरा मलबा और वो सुबह जब सेना ने ‘उड़न तश्तरी’ पकड़ने का दावा किया
1947 में एक किसान को खेत में मिले अजीबोगरीब टुकड़ों ने दुनिया को एक ऐसी कहानी सौंपी जो आज भी सरकारी दस्तावेज़ों, पर्यटन और सामूहिक कल्पना में जीवित है।
जुलाई 1947 की एक तेज़ आंधी के बाद न्यू मैक्सिको के रोसवेल शहर के पास खेत मालिक विलियम ‘मैक’ ब्रेज़ल को अपनी ज़मीन पर कुछ ऐसे टुकड़े बिखरे मिले जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखे थे—हल्की धातु की पन्नियां, छड़ें और अजीब काग़ज़ जैसा मसाला जो जलता नहीं था। ब्रेज़ल ने यह बात स्थानीय शेरिफ़ को बताई और कुछ ही घंटों में रोसवेल आर्मी एयर फ़ील्ड के अफ़सर मौके पर पहुंच गए। 8 जुलाई 1947 को सेना ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दावा किया कि उसने एक ‘उड़न तश्तरी’ बरामद कर ली है। यह ख़बर अमेरिकी अख़बारों में सुर्ख़ी बनी, लेकिन चौबीस घंटे के भीतर ही सेना ने अपना बयान बदल दिया और कहा कि वह तो महज़ एक मौसमी ग़ुब्बारा था। इसी एक झटके में रोसवेल दुनिया की सबसे बड़ी यूएफ़ओ पहेली का केंद्र बन गया।
उसी साल 24 जून को पायलट केनेथ आर्नल्ड ने वॉशिंगटन राज्य के ऊपर नौ चमकीली वस्तुओं को ‘पानी पर उछलती प्लेटों’ की तरह उड़ते देखा था, जिससे ‘फ़्लाइंग सॉसर’ शब्द आम बोलचाल में आया। रोसवेल की घटना ने इस शब्द को एक स्थायी किवदंती में बदल दिया। दशकों बाद अमेरिकी वायुसेना ने स्पष्ट किया कि वह मलबा दरअसल ‘प्रोजेक्ट मोगुल’ का हिस्सा था—एक गुप्त मिशन जो सोवियत परमाणु परीक्षणों का पता लगाने के लिए ऊंचाई पर भेजे गए ग़ुब्बारों से जुड़ा था। लेकिन तब तक रोसवेल एक सांस्कृतिक प्रतीक बन चुका था। अमेरिकी रक्षा विभाग ने हाल के वर्षों में ‘अनआइडेंटिफ़ाइड एनोमलस फ़िनोमेना’ (यूएपी) शब्द अपनाया और पेंटागन ने पायलटों द्वारा रिकॉर्ड किए गए ऐसे वीडियो की पुष्टि की जिनमें वस्तुएं अज्ञात तकनीक से युद्धाभ्यास करती दिखती हैं।
यह कहानी सिर्फ़ अमेरिका तक सीमित नहीं रही। रोसवेल आज एक पर्यटन स्थल है जहां यूएफ़ओ संग्रहालय, उत्सव और अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस आयोजित होते हैं। लैटिन अमेरिका में ब्राज़ील का वार्जिन्या कांड और अर्जेंटीना का बारिलोचे प्रकरण स्थानीय जनमानस पर उतना ही गहरा असर छोड़ गए जितना रोसवेल ने अमेरिकियों पर छोड़ा। अर्जेंटीना में 2022 के एक सर्वेक्षण के अनुसार 30.7 प्रतिशत आबादी यूएफ़ओ और परग्रही जीवन में विश्वास करती है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 32 प्रतिशत है। भारत समेत दुनिया भर में हर 2 जुलाई को विश्व यूएफ़ओ दिवस पर विज्ञान-कथा फ़िल्मों की मैराथन और सार्वजनिक आकाश-दर्शन जैसे आयोजन इसी सामूहिक जिज्ञासा को आगे बढ़ाते हैं।
हाल ही में ट्रंप प्रशासन ने 72 नए दस्तावेज़ जारी किए जिनमें कोलोराडो स्प्रिंग्स के पांच सैनिकों का 2022 का एक ब्योरा शामिल है। उन्होंने एक ऐसी वस्तु देखी जो ‘शल्कों से ढके आलू’ जैसी लगती थी—सफ़ेद-मलाईदार रंग, अनियमित पैनल और एकदम खामोश। वह वस्तु दो मिनट तक स्थिर रही और फिर अचानक ग़ायब हो गई। किसी के पास फ़ोन न होने के कारण कोई तस्वीर मौजूद नहीं है, सिर्फ़ पेंटागन द्वारा जारी एक डिजिटल पुनर्निर्माण है। एफ़बीआई का अनुमान है कि शायद बर्फ़ पर सूरज की रोशनी पड़ने से ऐसा भ्रम हुआ हो, लेकिन गवाहों ने साफ़ आसमान और किसी विमान या ग़ुब्बारे की ग़ैरमौजूदगी की बात कही।
यह डिजिटल स्केच—एक शल्कीय आलू जो दो मिनट में आसमान से ओझल हो गया—रोसवेल की उसी पुरानी अनिश्चितता को नए रूप में सामने लाता है। सात दशकों से अधिक समय बाद भी सरकारी फ़ाइलें खुल रही हैं, गवाहियां दर्ज हो रही हैं, लेकिन हर व्याख्या के साथ एक नया सवाल जुड़ जाता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
2 संपादकीय समूह · 1 भाषाएँ
The UFO story is reported as a light curiosity, almost an anecdote. The bizarre aspects, like the 'potato with scales', are highlighted without delving into the context of the Pentagon documents. The tone is detached and ironic, reducing the event to a matter of popular culture.
The UFO affair is treated with skepticism, framed as a typically American phenomenon lacking scientific evidence. The need for independent verification is stressed, and the lack of concrete proof is highlighted. The tone is measured, with a hint at political exploitation of the issue.
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