
जी7 शिखर सम्मेलन में ट्रंप की कठोर चेतावनी: ईरान समझौता विफल हुआ तो फिर शुरू होंगी बमबारी
अमेरिकी राष्ट्रपति ने 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौता न होने पर सैन्य कार्रवाई की धमकी दी, जबकि चीन ने ईरान की वैध मांगों का समर्थन दोहराया।
फ्रां ीस के एवियां में चल रहे जी7 शिखर सम्मेलन के इतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर अब तक की सबसे कठोर चेतावनी जारी की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि 19 जून को हस्ताक्षरित होने वाला आपसी समझौता ज्ञापन 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते में नहीं बदलता, या ईरान का व्यवहार संतोषजनक नहीं रहा, तो अमेरिकी सेना फिर से बमबारी शुरू कर देगी। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल-फतह अल-सीसी और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता के दौरान भी ट्रंप ने यही रुख दोहराया—"अगर वे ठीक से पेश नहीं आए, तो हम सीधे उनके सिर पर बम गिराएंगे।" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका कभी भी ईरान को परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं देगा।
यह धमकी ऐसे समय आई है जब 15 जून को वाशिंगटन और तेहरान ने युद्धविराम और शांति वार्ता की घोषणा कर दुनिया को चौंका दिया था। दोनों पक्षों ने 19 जून को एक आपसी समझौता ज्ञापन पर आधिकारिक हस्ताक्षर की योजना बनाई है, जिसमें अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस भी शामिल होंगे। ट्रंप ने इस समझौते को "कई कारणों से शानदार" बताया, लेकिन साथ ही यह भी रेखांकित किया कि यह अंतिम दस्तावेज नहीं है और इसके आधार पर प्रतिबंध तुरंत नहीं हटाए जाएंगे। उनके इस रुख ने समझौते की नाजुकता को उजागर कर दिया है—एक ओर कूटनीतिक प्रगति, तो दूसरी ओर सैन्य बल की खुली धमकी।
वैश्विक प्रतिक्रियाओं में भौगोलिक विभाजन साफ झलकता है। चीन ने तुरंत ईरान की "उचित और वैध मांगों" के प्रति अपना समर्थन दोहराया, जो पश्चिमी दबाव के मुकाबले एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र की भूमिका को रेखांकित करता है। वहीं जी7 की मेजबानी कर रहा फ्रांस और अन्य पश्चिमी सहयोगी अमेरिकी रुख के साथ खड़े नजर आए। मिस्र और भारत जैसे उभरते क्षेत्रीय नेताओं की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि हिंद महासागर से लेकर भूमध्य सागर तक हर कोई इस संकट के नतीजों से प्रभावित होगा। भारत के लिए तो खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य का खुला रहना ऊर्जा सुरक्षा का सवाल है, जिसे ट्रंप ने समझौते के बाद पूरी तरह खोलने की बात कही थी।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की आक्रामक भाषा एक ओर वार्ता की मेज पर दबाव बनाने की रणनीति हो सकती है, लेकिन इससे तेहरान में राष्ट्रवादी भावनाएं भड़कने और समझौता पटरी से उतरने का जोखिम भी उतना ही प्रबल है। 60 दिनों की समयसीमा और "अगर मुझे पसंद नहीं आया" जैसे वाक्य एकपक्षीय अमेरिकी शर्तों की ओर इशारा करते हैं, जो किसी भी संप्रभु देश के लिए स्वीकार करना कठिन हो सकता है। दक्षिण एशिया के लिए इसका सीधा अर्थ है—तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और क्षेत्रीय अस्थिरता की आशंका, जो भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसी ऊर्जा-आयात निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को झटका दे सकती है। आने वाले सप्ताहों में सारी निगाहें 19 जून के हस्ताक्षर समारोह और उसके बाद उभरने वाले बारीक प्रिंट पर टिकी रहेंगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ट्रम्प ने धमकी दी कि अगर ईरान अच्छा व्यवहार नहीं करता तो बमबारी फिर से शुरू कर दी जाएगी, और ज्ञापन को अपनी व्यक्तिगत मंजूरी पर निर्भर बना दिया। G7 से दी गई यह चेतावनी एकतरफा ताकत के प्रदर्शन को दर्शाती है जो चिंता पैदा करती है। इसके विपरीत, चीन ईरान की वैध मांगों के प्रति अपने समर्थन को दोहराता है।
ट्रम्प ने ईरान को अंतिम समझौते के लिए 60 दिन का समय दिया, अन्यथा बमबारी फिर से शुरू करने की धमकी दी। उन्होंने जोर देकर कहा कि ज्ञापन अंतिम नहीं है और अगर उन्हें यह पसंद नहीं आया, तो वे ईरान को 'नरक में बमबारी' करने को तैयार हैं। रूसी स्रोत बयान की अल्टीमेटम प्रकृति को रेखांकित करते हैं और युद्धविराम की स्थायित्व पर संदेह व्यक्त करते हैं।
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