
जापान ने ब्याज दर 1% तक बढ़ाई, 31 साल का रिकॉर्ड; ईरान युद्ध के बीच महंगाई पर कसी नकेल
बैंक ऑफ जापान ने मंगलवार को नीतिगत दर 0.75% से बढ़ाकर 1% कर दी, जो सितंबर 1995 के बाद सर्वोच्च स्तर है; गवर्नर की अनुपस्थिति में उप-गवर्नर ने आगे और वृद्धि के संकेत दिए।
जापान के केंद्रीय बैंक ने मंगलवार को एक व्यापक रूप से प्रत्याशित कदम उठाते हुए अपनी अल्पकालिक नीतिगत दर को 0.75 प्रतिशत से बढ़ाकर 1 प्रतिशत कर दिया—यह स्तर पिछली बार सितंबर 1995 में देखा गया था। सात-एक के मत से लिए गए इस फैसले में एकमात्र असहमति ‘डव’ माने जाने वाले बोर्ड सदस्य तोइचिरो असादा की रही। गवर्नर काजुओ उएदा लिवर सिस्ट संक्रमण के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हैं, इसलिए मतदान में शामिल नहीं हुए। उनकी जगह उप-गवर्नर शिनिची उचिदा ने संवाददाता सम्मेलन में स्पष्ट किया कि आर्थिक और मूल्य स्थितियों के अनुरूप ब्याज दरों में बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रहेगा।
यह फैसला जापान के लिए एक ऐतिहासिक सामान्यीकरण की दिशा में तीसरा बड़ा कदम है। दशकों तक कीमतों में गिरावट और आर्थिक ठहराव से जूझने के बाद बैंक ने 2016 से 2024 तक नकारात्मक ब्याज दर बनाए रखी थी। मार्च 2024 में 17 वर्षों में पहली बार दर बढ़ाई गई, फिर दिसंबर 2025 में इसे 0.75% तक ले जाया गया। अब ईरान युद्ध से उपजे ऊर्जा संकट ने यह तीसरी वृद्धि अनिवार्य बना दी। जापान अपनी लगभग समूची तेल-गैस आयात करता है, और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने कंपनियों के बीच लागत हस्तांतरण की रफ्तार बढ़ा दी है। हालांकि अमेरिका-ईरान के बीच शांति समझौते की रूपरेखा तय हो चुकी है, लेकिन बैंक का मानना है कि मध्यम और दीर्घकालिक मुद्रास्फीति अपेक्षाएं 2% लक्ष्य से ऊपर निकल सकती हैं। साथ ही, बैंक ने सरकारी बॉन्ड खरीद में कटौती की मौजूदा रफ्तार—हर तिमाही 200 अरब येन—को अगले मार्च तक बनाए रखने और अप्रैल से इसे धीमा करने की योजना को मंजूरी दी।
यह कदम जापान को वैश्विक केंद्रीय बैंकों की उस कतार में खड़ा करता है जो मुद्रास्फीति से निपटने के लिए सख्त रुख अपना रहे हैं। पिछले सप्ताह यूरोपीय सेंट्रल बैंक ने लगभग तीन वर्षों में पहली बार दरें बढ़ाकर 2.25-2.65% की सीमा में पहुंचा दीं, और इंडोनेशिया के केंद्रीय बैंक ने भी हाल में सख्ती की। इसी सप्ताह अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक होनी है। फिर भी, जापान की 1% दर अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी कम है। बाजार की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही: निक्केई 225 सूचकांक पहली बार 70,000 अंक के पार गया, लेकिन येन डॉलर के मुकाबले मजबूत नहीं हो सका। इसका दक्षिण एशिया के लिए मायने यह है कि येन कैरी ट्रेड—जिसमें निवेशक सस्ते येन में उधार लेकर भारत जैसे उच्च-प्रतिफल वाले बाजारों में लगाते हैं—फिलहाल बाधित नहीं होगा, लेकिन आगे दरें बढ़ने पर पूंजी प्रवाह की दिशा बदल सकती है।
उप-गवर्नर उचिदा ने संकेत दिया कि वैकल्पिक स्रोतों से कच्चे माल की खरीद बढ़ने से अर्थव्यवस्था में भारी मंदी का जोखिम घटा है, लेकिन उपभोक्ता कीमतों में अंतर्निहित मुद्रास्फीति 2% लक्ष्य को पार कर सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि बैंक की असली परीक्षा अब शुरू होती है—क्या वह विकास को धक्का पहुंचाए बिना महंगाई पर लगाम लगा पाएगा? मध्य-पूर्व में अनिश्चितता बनी हुई है, और यदि तेल की कीमतें फिर उछलती हैं तो जापान को और सख्ती करनी पड़ सकती है। भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह घटनाक्रम दोहरी चुनौती लेकर आया है: एक ओर वैश्विक तरलता में कमी का जोखिम, दूसरी ओर जापानी निवेश के प्रवाह में उतार-चढ़ाव। फिलहाल सबकी निगाहें जून के अंत में आने वाले बैंक ऑफ जापान के ताजा मुद्रास्फीति अनुमानों पर टिकी हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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जापान के केंद्रीय बैंक ने 31 साल में पहली बार ब्याज दर 1% तक बढ़ाई, प्रधानमंत्री ताकाइची की इच्छा के विरुद्ध और अमेरिकी दबाव में। इस कदम का उद्देश्य ऊर्जा व्यवधानों और गिरती मुद्रा से उपजी महंगाई से निपटना है, लेकिन इससे राजनीतिक दरारें और टोक्यो की मौद्रिक नीति पर बाहरी प्रभाव उजागर होता है।
जापान ने ब्याज दर 1% तक बढ़ाई, जो 31 साल में सबसे ऊंची है, इसके पीछे ईरान और लेबनान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध से उपजी तेल की बढ़ती कीमतें हैं। यह कदम मध्य पूर्व में ऊर्जा आपूर्ति बाधाओं से वैश्विक महंगाई के झटके को दर्शाता है, जबकि वाशिंगटन और तेहरान के बीच शांति समझौते की घोषणा भी हुई।
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