
न्याय की धीमी रफ्तार: घाना में सजा, केन्या में लंबित मुकदमे, पेरू में फरार आरोपी और ब्रिटेन में यातना के आरोप
संयुक्त राष्ट्र ने ब्रिटेन की अनिश्चितकालीन कारावास प्रणाली पर मनोवैज्ञानिक यातना का आरोप लगाया, वहीं घाना, केन्या और पेरू में बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों में न्याय की रफ्तार धीमी बनी हुई है।
संयुक्त राष्ट्र के तीन विशेष प्रतिवेदकों ने ब्रिटेन में ‘जनसुरक्षा के लिए कारावास’ (आईपीपी) नामक अनिश्चितकालीन सजा प्रणाली की कड़ी आलोचना करते हुए इसे “गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन” और “मनोवैज्ञानिक यातना” बताया है। यूएन के अनुसार, इस प्रणाली के तहत करीब 2,400 कैदी वर्षों से बिना रिहाई की तारीख के जेलों में बंद हैं, जिनमें से कई छोटे अपराधों के लिए सजा काट रहे हैं। थॉमस व्हाइट जैसे कैदी, जिन्हें 14 साल पहले मोबाइल फोन छीनने के लिए आईपीपी सजा मिली थी, मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद अस्पताल से वापस जेल भेजे जाने की पीड़ा झेल रहे हैं।
पश्चिम अफ्रीका में घाना की अदालतों ने हाल के महीनों में बाल यौन शोषण के दो मामलों में त्वरित सजा सुनाई है। वा उच्च न्यायालय ने एक सात वर्षीय बालक के साथ कुकर्म के दोषी 42 वर्षीय व्यक्ति को 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा दी, जबकि लावरा सर्किट कोर्ट ने अपनी 17 वर्षीय बेटी से अनाचार के दोषी को 20 वर्ष की जेल की सजा सुनाई। ऊपरी पश्चिम क्षेत्रीय पुलिस कमान के अनुसार, इन मामलों में पीड़ितों को चिकित्सा और मनोसामाजिक सहायता भी प्रदान की गई। हालांकि, पुलिस ने अभिभावकों से सतर्क रहने और दुर्व्यवहार की तुरंत सूचना देने का आग्रह किया है।
पूर्वी अफ्रीका के केन्या में स्थिति भिन्न है। बुसिया काउंटी में चार वर्षीय बालिका से दुष्कर्म का मामला 2022 से अदालत में लंबित है, जहां 30 से अधिक सुनवाइयों के बावजूद अंतिम निर्णय नहीं आया है। पीड़ित परिवार ने फाइलों के गुम होने, गवाहों को धमकाने और बार-बार स्थगन का आरोप लगाया है। दूसरी ओर, लैटिन अमेरिका में पेरू के अमेजन क्षेत्र में एक छह वर्षीय अवाजुन बालिका के साथ उसके सौतेले पिता द्वारा बलात्कार के बाद आरोपी फरार है। अवाजुन महिला परिषद के अनुसार, पुलिस के पास समुदाय तक पहुंचने के साधन नहीं हैं और पीड़िता को उचित चिकित्सा के लिए आठ घंटे की नदी यात्रा करनी पड़ी।
संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न क्षेत्रीय स्रोतों के अनुसार, ये मामले एक वैश्विक प्रवृत्ति को दर्शाते हैं: कठोर दंड विधान के बावजूद, राज्य संस्थाएं पीड़ितों की सुरक्षा और दोषियों को पकड़ने में विफल हो रही हैं। घाना में पुलिस ने अपराधों की सूचना देने पर जोर दिया है, जबकि केन्या में मामला अभी भी अदालत में है और पेरू में आरोपी की गिरफ्तारी के लिए अभियान जारी है। ब्रिटेन में सरकार पर आईपीपी सजा की समीक्षा का दबाव बढ़ रहा है, लेकिन अभी तक ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
| उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस | +1.00 | aligned |
|---|---|---|
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | −0.80 | critical |
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.70 | critical |
The Ghanaian judicial system acts firmly and swiftly, protecting minors and punishing offenders with exemplary sentences.
Uses multiple concrete convictions and sentences to convey an image of efficient justice, focusing on positive outcomes.
It omits cases of judicial delay and systemic difficulties in other countries, focusing only on swift convictions in Ghana.
The Awajún girl, violated and abandoned, fights for survival while the system betrays her. The report is a cry against injustice.
Personalizes the victim's ordeal and emphasizes geographic and systemic barriers to evoke empathy and outrage.
It omits cases of effective convictions and success stories of the judicial system, focusing on a single failure case.
Thomas White is a victim of the system, sentenced to life imprisonment for a minor crime. His story is an example of judicial cruelty.
Highlights the disproportionate punishment and the indefinite nature of the sentence to frame it as psychological torture.
It omits cases of child abuse and specific challenges of juvenile justice, focusing on a different criminal injustice.
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