
फ़ोन की घंटी से डर, पर कम तनख़्वाह नहीं मंज़ूर: नौजवान पेशेवरों का बदलता रवैया
एड्रियन पून के लिए अनजान नंबर की कॉल ‘ब्लाइंड बॉक्स’ खोलने जैसी है, मगर यही पीढ़ी वेतन और करियर को लेकर पहले से कहीं अधिक माँग कर रही है।
एड्रियन पून, एक जेन-ज़ी एचआर कर्मी, नौकरी ढूँढने के दौरान ही फ़ोन उठाने की हिम्मत जुटा पाते हैं। बिज़नेस इनसाइडर को टेक्स्ट मैसेज पर उन्होंने बताया कि अनजान कॉल को वे ‘ब्लाइंड बॉक्स’ मानकर मानसिक रूप से संभालते हैं—अंदर क्या है, पता नहीं। यह घबराहट कोई अकेली नहीं: एक सर्वेक्षण के अनुसार 42% जेन-ज़ी और मिलेनियल फ़ोन कॉल का जवाब नहीं देते, और जवाब देने से पहले 58% रिहर्सल करते हैं। बचाव की यह आदत महँगी पड़ रही है, क्योंकि 78% ने माना कि इससे उनकी कमाई या अवसर प्रभावित हुए हैं।
लेकिन यही पीढ़ी नौकरी की शर्तों पर झुकने को तैयार नहीं। इटली में अल्मालॉरिया की रिपोर्ट बताती है कि अब 66.9% युवा स्नातक 1,500 यूरो मासिक से कम वेतन को अस्वीकार कर देते हैं—2016 में यह आँकड़ा मात्र 24.4% था। एक दशक में रहन-सहन की लागत और मुद्रास्फीति ने उस सीमा को खिसका दिया है जिसे सहन किया जा सके, और स्नातक अपनी डिग्री को ऐसे निवेश की तरह देखने लगे हैं जिसका मुनाफ़ा मिलना ही चाहिए। यह रवैया केवल यूरोप तक सीमित नहीं: ब्राज़ील में वीवर्क-ऑफ़रवाइज़ सर्वेक्षण के अनुसार 65% युवा (जेन-ज़ी) बिना औपचारिक अनुबंध या लाभ वाली नौकरी ठुकरा देते हैं—यह किसी भी आयु वर्ग में सबसे ऊँचा प्रतिशत है। सुरक्षा और औपचारिकता की चाह अब ‘डिजिटल ख़ानाबदोश’ की छवि से टकराती है।
रूसी फ़ोर्ब्स की एक टिप्पणी इन विरोधाभासों को भीतर से दिखाती है: एक आईटी पेशेवर आधे साल से मिड-लेवल का काम कर रहा है, मगर वेतन वृद्धि माँगने का संदेश फ़ोन के नोट्स में ही पड़ा रह जाता है। ‘पहले एक और फ्रेमवर्क सीख लूँ, एक और प्रोजेक्ट पूरा कर लूँ’—यह टालमटोल ‘इम्पोस्टर सिंड्रोम’ और सामाजिक-सांस्कृतिक हिचक से उपजती है, जिसमें वेतन माँगना ‘गुस्ताख़ी’ लग सकता है। फ़िर भी मनोवैज्ञानिक सुझाते हैं कि अपनी कीमत पहचानना उतना ही ज़रूरी है जितना भूख लगने पर खाना।
ये कहानियाँ एक साझा दृश्य गढ़ती हैं: दुनिया भर के युवा पेशेवर एक साथ अधिक आत्मविश्वास और अधिक चिंता के साथ बाज़ार में उतर रहे हैं। इटली के छोटे उद्यमी उन्हें ‘बहुत नख़रे वाला’ कह सकते हैं, पर अल्मालॉरिया के आँकड़े बताते हैं कि पाँच साल बाद स्नातकों की रोज़गार दर 90% पार कर जाती है—इसलिए नहीं कि वे कोई भी काम स्वीकार कर लेते हैं, बल्कि इसलिए कि वे अपनी पढ़ाई से मेल खाने वाला, अर्थपूर्ण काम चाहते हैं। ब्राज़ील में भी लचीलापन अब बिना अनुबंध के मंज़ूर नहीं, और भारत जैसे बाज़ार जहाँ चार पीढ़ियाँ साथ काम कर रही हैं, वहाँ यह बहु-आयामी उम्मीदें प्रबंधकों के लिए नया संतुलन माँग रही हैं।
अंततः एड्रियन पून के ‘ब्लाइंड बॉक्स’ का सहारा याद आता है। एक ऐसी दुनिया में जहाँ डिजिटल संदेश शब्दों को तराशने का समय देते हैं, सीधी बातचीत और सीधी माँग दोनों ही भयावह लग सकती हैं। मगर जो पीढ़ी एक अनजान कॉल को सबसे तनावपूर्ण संचार मानती है—ब्रेकअप या इंटरव्यू से भी बढ़कर—वही अब ‘नहीं’ कहने का साहस भी जुटा रही है। यह विरोधाभास शायद नए कार्य-संसार की सबसे गहरी धड़कन है: हाथ में स्मार्टफ़ोन, मन में सुरक्षा की चाह, और आँखों में ऐसे भविष्य की तलाश जो न तो अंधा विश्वास हो और न ही अंधी घंटी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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Young professionals are increasingly avoiding phone calls, a habit that may be costing them raises and career opportunities. Surveys show that many Gen Zers and millennials script calls or simply don't answer, leading to missed professional advancement.
Italian young graduates are increasingly selective about jobs, refusing salaries below 1,500 euros per month. Employment rates are high, but new hires demand better conditions and proper contracts.
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